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क्या किसी आरोपी को एफ़आईआर की कॉपी देने से इनकार किया जा सकता है?

अभियुक्तों को प्रथम सूचना रिपोर्ट यानी एफ़आईआर की कॉपी न देने का एक नया चलन उभर रहा है। पारस नाथ सिंह का तर्क है कि यह स्थापित क़ानून और भारत के संविधान के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों के खिलाफ है।
FIR copy

हाल ही में एक प्रवृत्ति सामने उभर कर आई है, कि जब भी गैरक़ानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), 1967 क़ानून के तहत पहली सूचना रिपोर्ट (एफ़आईआर) दर्ज की जाती है, पुलिस इसकी कॉपी को आरोपी को देने इनकार करने का विकल्प चुनती है।

कुछ मामलों में, आरोपी को पुलिस से कॉपी मिलने से पहले ही एफ़आईआर की कॉपी सोशल मीडिया पर वायरल हो जाती है।

इस प्रवृत्ति का ताजा उदाहरण दिल्ली पुलिस द्वारा संसद सुरक्षा उल्लंघन मामले में आरोपियों के खिलाफ दर्ज़ की गई एफ़आईआर की प्रति साझा करने से इनकार करना है।

एफ़आईआर की प्रति साझा करने को लेकर दिल्ली पुलिस में इतनी अनिच्छा है कि उसने एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश के खिलाफ अपील कर दी, जिसमें निर्देश दिया गया था कि आरोपियों में से एक नीलम देवी को एफ़आईआर की कॉपी तुरंत दी जाए।

यहां तक कि न्यूज़क्लिक के खिलाफ दर्ज़ यूएपीए मामले में भी, एफ़आईआर की कॉपी केवल अदालत के निर्देश पर ही उपलब्ध कराई गई थी, जिसे पुलिस ने दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती नहीं देने का फैसला किया था।

ये दो उदाहरण एकमात्र उदाहरण नहीं हैं जहां पुलिस ने आरोपी व्यक्तियों को एफ़आईआर की कॉपी उपलब्ध कराने में अपने पैर खींचे हैं। 

यूएपीए के तहत आरोपियों का प्रतिनिधित्व करने वाले कई वकील कहते हैं कि जांच एजेंसियां ​​नियमित रूप से उनके मुवक्किलों को एफ़आईआर की कॉपियाँ देने से इनकार कर रही है।

यूथ बार एसोसिएशन मामला

संसद की सुरक्षा उल्लंघन मामले पर वापस आते हुए, दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने 21 दिसंबर को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश डॉ. हरदीप कौर द्वारा पारित उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें दिल्ली पुलिस को आरोपी नीलम को एफ़आईआर की एक कॉपी देने का निर्देश दिया गया था।

एफ़आईआर के खुलासे के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा दिए गए तर्क और न्यायमूर्ति शर्मा ने उनकी सराहना कैसे की, यह बताना महत्वपूर्ण है। सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण बात, दिल्ली पुलिस ने तर्क दिया कि एफ़आईआर संवेदनशील है।

पुलिस ने यह भी तर्क दिया कि आरोपी को एफ़आईआर की कॉपी हासिल करने के लिए यूथ बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित की गई प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

यूथ बार एसोसिएशन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एफ़आईआर की कॉपियाँ  एफ़आईआर दर्ज होने के चौबीस घंटे के भीतर पुलिस की वेबसाइट पर अपलोड की जानी चाहिए ताकि आरोपी या मामले से जुड़ा कोई भी व्यक्ति एफ़आईआर डाउनलोड कर सके और अपनी शिकायतों के निवारण के लिए क़ानून के अनुसार अदालत के सामने उचित आवेदन कर सके।

हालाँकि, अदालत ने इस सामान्य नियम के कुछ अपवाद भी बताए हैं। जब अपराध संवेदनशील होता है, जैसे यौन अपराध, पोकसो (POCSO) अधिनियम के तहत अपराध, या आतंकवाद और उग्रवाद से संबंधित अपराध, तो अदालत ने माना कि सामान्य नियम का पालन करने की जरूरत नहीं है।

अदालत ने कहा कि यदि मामले की संवेदनशील प्रकृति के आधार पर एफ़आईआर की कॉपी नहीं दी जाती है, तो उक्त कार्रवाई से पीड़ित व्यक्ति पुलिस अधीक्षक या उसके समकक्ष अधिकारी को प्रतिवेदन प्रस्तुत कर सकता है, जो बदले में तीन अधिकारियों की एक समिति का गठन करेगा जो उक्त शिकायत से निपटेगी।

इस प्रकार गठित समिति प्रतिवेदन हासिल होने की तारीख से तीन दिनों के भीतर शिकायत का निपटारा करेगी और पीड़ित व्यक्ति को अपने निर्णय के बारे में सूचित करेगी।

ऐसे मामलों में जहां मामले की संवेदनशील प्रकृति को ध्यान में रखते हुए एफ़आईआर की प्रतियां नहीं देने का निर्णय लिया गया है, आरोपी के लिए यह रास्ता खुला होगा कि वह उस अदालत के समक्ष प्रमाणित प्रति देने के लिए आवेदन दायर कर सके, जहां एफ़आईआर भेज दी गई है और संबंधित अदालत द्वारा इसे आवेदन जमा करने के तीन दिन के भीतर उपलब्ध करा दिया जाएगा।

जस्टिस शर्मा ने यूथ बार एसोसिएशन की टिप्पणियों के आधार पर कहा कि संबंधित एफ़आईआर संवेदनशील है क्योंकि इसमें यूएपीए की धारा 16 और 18 लगाई गई हैं।

उन्होंने यह भी पाया कि यूथ बार एसोसिएशन में स्थापित प्रक्रिया का पालन किए बिना आरोपी को एफ़आईआर नहीं दी जा सकती थी।

वह जिस प्रक्रिया का जिक्र कर रही थी वह यह है कि आरोपी को पहले एसएसपी के पास एफ़आईआर की एक प्रति के लिए आवेदन करना चाहिए और यदि फिर भी नहीं दी जाती है, तो संबंधित अदालत में आवेदन करना चाहिए।

दूसरा पहलू 

न्यायमूर्ति शर्मा ने जिस बात पर ध्यान नहीं दिया, वह यह कि उसी फैसले में जोरदार ढंग से कहा गया था कि एक आरोपी आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 207 के तहत निर्धारित समय से पहले ही एफ़आईआर की एक प्रति हासिल करने का हकदार है।

पुलिस रिपोर्ट और अन्य सहायक दस्तावेज हासिल होने पर, संबंधित मजिस्ट्रेट आरोपी की उपस्थिति का समन जारी करता है।

पेश होने पर, सीआरपीसी की धारा 207 अभियुक्त को अभियोजन पक्ष द्वारा भरोसा किए गए कुछ दस्तावेजों की एक प्रति बिना किसी देरी और मुफ्त में देने का आदेश देती है, जिसमें एफ़आईआर और आरोप पत्र भी शामिल होता है। 

इस प्रकार होता यह है कि एक आरोपी 207 सीआरपीसी के तहत शर्त लागू होने से पहले भी एफ़आईआर की एक प्रति पाने का हकदार है।

इसके अलावा, यूथ बार एसोसिएशन के फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि आरोपी उस अदालत से एफ़आईआर की एक प्रति हासिल कर सकता है, जहां एफ़आईआर भेजी गई है, तब,जब उसे एफ़आईआर की 'संवेदनशीलता' का हवाला देते हुए इनकार कर दिया गया है।

इस आशय के मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था: “ऐसे मामलों में जहां मामले की संवेदनशील प्रकृति को ध्यान में रखते हुए एफ़आईआर की प्रतियां नहीं देने का निर्णय लिया गया है, यह आरोपी या उसके अधिकृत प्रतिनिधि या पैरोकार के लिए यह रास्ता खुला होगा कि वे जिस अदालत में एफ़आईआर भेजी गई है, उसके समक्ष प्रमाणित कॉपी के लिए एक आवेदन दायर करना होगा और संबंधित अदालत द्वारा आवेदन जमा करने के तीन दिन से अधिक समय से पहले निपटारा करना होगा।''

शब्द "आवेदन जमा करने के तीन दिन से अधिक समय के भीतर संबंधित अदालत द्वारा इसे काफी तत्परता से प्रदान किया जाएगा" यह स्पष्ट करता है आखिरी में, आरोपी एफ़आईआर की एक प्रति पाने का हकदार है।

एफ़आईआर की कॉपी हासिल करने के आरोपी के अधिकार को प्रक्रियात्मक कठोरता की वेदी पर ख़त्म नहीं किया जा सकता जैसा कि दिल्ली पुलिस चाहती है। दिल्ली उच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक अदालत को यूथ बार एसोसिएशन के फैसले को सही परिप्रेक्ष्य में लागू करना चाहिए था।

जब जिस अदालत को एफ़आईआर भेजी गई थी, उसने आरोपी को एफ़आईआर की एक प्रति प्रदान करना उचित पाया, तो उच्च न्यायालय के लिए आदेश पर रोक लगाने का कोई अच्छा कारण नहीं हो सकता है, खासकर जब, यूथ बार एसोसिएशन के अनुसार, एफ़आईआर अंततः आरोपी को देनी होगी।

मिसाल का कीमत 

दरअसल, सीआरपीसी में स्पष्ट रूप से आरोपी को एफ़आईआर की एक कॉपी देने का प्रावधान नहीं है। हालाँकि, निर्णयों की एक श्रृंखला में, अदालतों ने अभियुक्त को जल्द से जल्द एफ़आईआर की एक कॉपी दिलाने के अधिकार को मान्यता दी है।

1917 में ही, धनपत बनाम सम्राट मामले में पटना उच्च न्यायालय ने माना था कि यह अत्यंत आवश्यक है कि आरोपी व्यक्ति को जल्द से जल्द एफ़आईआर की एक प्रति दी जानी चाहिए ताकि वह क़ानूनी सलाह ले सके।

जीजू लुकोस बनाम केरल राज्य मामले में केरल उच्च न्यायालय ने कहा था कि एफ़आईआर की एक कॉपी या तो संबंधित पुलिस स्टेशन या एसएसपी के कार्यालय से हासिल की जा सकती है या आरोपी द्वारा संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत से भी हासिल की जा सकती है जहां आवेदन करने की तारीख से दो कार्य दिवसों के भीतर रिपोर्ट पहले ही भेजी जा चुकी है।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को क़ानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा कम नहीं किया जा सकता है।

मेनका गांधी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि क़ानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया ही उचित प्रक्रिया है और यह निष्पक्ष, उचित और न्यायोचित होनी चाहिए।

एफ़आईआर दर्ज करने का मुख्य उद्देश्य आपराधिक क़ानून को गति देना है। एफ़आईआर दर्ज़ होने के साथ, एफ़आईआर के खिलाफ क़ानूनी उपचार और प्रत्याशा में गिरफ्तारी या गिरफ्तारी का अधिकार भी पैदा होता है। यदि किसी आरोपी को एफ़आईआर की प्रति देने से इनकार कर दिया जाता है तो वह ऐसे क़ानूनी उपायों के अपने अधिकार का प्रभावी ढंग से प्रयोग नहीं कर सकता है।

संविधान के अनुच्छेद 22(1) में प्रावधान है कि गिरफ्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को ऐसी गिरफ्तारी के आधार के बारे में यथाशीघ्र सूचित किए बिना हिरासत में नहीं लिया जाएगा।

गिरफ्तारी के आधार पर जानकारी देने का तरीका आवश्यक रूप से जताए उद्देश्य की पूर्ति के लिए सार्थक होना चाहिए। एफ़आईआर, जिसमें आरोपियों के खिलाफ आरोपों का सार शामिल है, निस्संदेह एक आरोपी के लिए मजिस्ट्रेट को यह समझाने के लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है कि उसके खिलाफ कोई मामला नहीं है और इसलिए, उनकी रिमांड की आवश्यकता नहीं है।

पुलिस पूछताछ के दौरान भी, किसी व्यक्ति को निश्चित रूप से यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। उन्हें उन पर लगे आरोपों के बारे में बताया जाना चाहिए.' आख़िरकार, हमारे संविधान के तहत, एक अभियुक्त को अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-दोषारोपण के विरुद्ध अधिकार है।

पारस नाथ सिंह भारत के सर्वोच्च न्यायालय में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड हैं।

सौजन्य: द लीफ़लेट 

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