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जीडीपी वृद्धि तो हुई, मगर निजी और सरकारी उपभोग ख़र्च में हुई गिरावट

इसका मतलब यह है कि उपभोग ख़र्च बहुत धीमी गति से बढ़ रहा है।
GDP growth
प्रतीकात्मक तस्वीर। PTI

सरकार द्वारा जारी किए गई नवीनतम सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की संख्या ने सरकारी हलकों और समर्थक अर्थशास्त्रियों के बीच एक तरह के जश्न मनाने की लहर पैदा कर दी है। 2023-24 की दूसरी तिमाही के आंकड़ों से पता चलता है कि इस दौरान जीडीपी वृद्धि 7.6 प्रतिशत दर्ज की गई है। पहली तिमाही में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि को जोड़ते हुए, चालू वित्तीय वर्ष की पहली छमाही में यह 7.7 प्रतिशत की अच्छी वृद्धि दर्शाई गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इन आंकड़ों की सराहना करते हुए कहा कि ये "भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था और पिछले 10 वर्षों में किए गए परिवर्तनकारी सुधारों का प्रतिबिंब हैं"।

हालाँकि, आंकड़ों के बारीकी से जांच करने पर पता चलता है कि अर्थव्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं है। अधिक चिंता की बात यह है कि इस बारे में सरकारी नीति-निर्माताओं का उदासीन रवैया रहा है। हर कोई ऐसे व्यवहार कर रहा है जैसे कि केवल 7.6 प्रतिशत की  आर्थिक वृद्धि ही सभी आर्थिक समस्याओं का समाधान है। लेकिन विस्तृत तस्वीर वास्तव में क्या दर्शाती हैं? आइए इस पर एक नजर डालते हैं। 

उपभोग पीआर ख़र्च बहुत धीमी गति से बढ़ रहा है

इस वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) में, स्थिर कीमतों पर निजी अंतिम उपभोग ख़र्च (पीएफसीई) में मामूली 3.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई। पीएफसीई सभी निजी संस्थाओं द्वारा किए गए सभी ख़र्चों का योग होता है जिसमें देश के सभी परिवारों के साथ-साथ सभी व्यवसाय या उद्यम भी शामिल होते हैं। यह सकल घरेलू उत्पाद द्वारा मापे गए देश के कुल उत्पादन के सबसे महत्वपूर्ण घटकों में से एक है और सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 57 प्रतिशत होता है। जब लोग सामान या सेवाएँ खरीदने के लिए अधिक ख़र्च करेंगे तभी आर्थिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी। यदि लोग पर्याप्त ख़र्च नहीं कर पाएंगे तो अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती है। तो, पीएफसीई लोगों की आय और क्रय शक्ति का एक बढ़िया माप है। यदि यह केवल छोटी वृद्धि से बढ़ रहा है तो इसका मतलब केवल यह हो सकता है कि आर्थिक विकास के लिए मुख्य प्रेरक कारकों में से एक पिछड़ रहा है।

उपभोग ख़र्च में इस कमजोर वृद्धि को संदर्भ में रखने के लिए, नीचे दिए गए चार्ट पर एक नजर डालें जो पिछले पांच वर्षों में पीएफसीई की तिमाही वृद्धि को ट्रैक करता है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा संकलित आंकड़ों से लिया गया है।

कोविड-19 महामारी के दौरान उपभोग ख़र्च में गिरावट आई और फिर आधार प्रभाव से प्रेरित होकर 2021-22 में वापस उछाल आया। ऐसा तब होता है जब साल-दर-साल तुलना की जाती है - कम आधार वर्ष वाले मूल्य से उच्च प्रतिशत की वृद्धि होती है। हालाँकि, पिछले साल से, उपभोग ख़र्च लगातार उस स्तर तक गिर गया था जो महामारी से पहले की तुलना में भी कम है। पिछले वित्तीय वर्ष की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर 2022) में यह घटकर मात्र 2.2 प्रतिशत रह गया था, जो पिछली तिमाही में थोड़ा बढ़कर 2.8 प्रतिशत हो गया था। चालू वर्ष की पहली तिमाही में उपभोग ख़र्च बढ़कर 6 प्रतिशत हुआ लेकिन दूसरी तिमाही में यह फिर से गिरकर 3.1 प्रतिशत पर आ गया था। स्पष्ट रूप से, इसे स्वस्थ स्तर पर बनाए रखने के लिए कुछ भी नहीं है - कुछ प्रणालीगत कारण है कि लोग पर्याप्त ख़र्च नहीं कर रहे हैं। कोई भी अर्थशास्त्री आपको बताएगा कि इसका कारण स्पष्ट रूप से हमें घूर रहा है - लोगों के पास ख़र्च करने के लिए पर्याप्त आय नहीं है। वे अल्प आय में किसी तरह गुजारा कर रहे हैं, जिसे दो गंभीर रूप से खतरनाक कारकों: मुद्रास्फीति और बेरोजगारी द्वारा और भी कम किया जा रहा है। इन्हें सीधे जीडीपी आंकड़ों में मापा और प्रतिबिंबित नहीं किया जाएगा, लेकिन उपभोग ख़र्च वृद्धि के निरंतर निम्न स्तर में उनकी छाया स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

मंदी में खेती का उत्पादन

सरकार इस बात का विस्तृत डेटा भी उपलब्ध कराती है कि कौन सा क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद और उसकी वृद्धि में कितना योगदान दे रहा है। इस पर नजर डालने से एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आता है: चालू वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) में कृषि का योगदान केवल 1.2 प्रतिशत बढ़ा है। हालाँकि पिछले कुछ समय से कृषि योगदान में वृद्धि 2.5 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है, लेकिन नवीनतम संख्याएँ इसकी आधी हैं।

इसलिए, विनिर्माण (13.9 प्रतिशत) और निर्माण (13.3 प्रतिशत), साथ ही खनन और उत्खनन और बिजली, पानी और अन्य उपयोगिताओं में वृद्धि की कुछ बहुत अच्छी संख्या के बावजूद - दोनों लगभग 10 प्रतिशत हैं – इसलिए सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि को कृषि ने नीचे खींच लिया गया है।

नीति निर्माताओं को इसकी चिंता इसलिए होनी चाहिए क्योंकि देश में रोजगार का सबसे बड़ा साधन कृषि है और देश की लगभग दो-तिहाई आबादी कृषि से जुड़ी हुई है। इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में कम वृद्धि से संकेत मिलता है कि आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को बेहतर आय का आनंद नहीं मिलेगा और न ही खेती में रोजगार के अवसर उपलब्ध होने की संभावना है।

सरकारी ख़र्च में भी गिरावट

ऐसी स्थिति में जहां निजी उपभोग ख़र्च स्थिर है या कम वृद्धि दिखा रहा है, आर्थिक गतिविधि बढ़ाने और लोगों को कुछ राहत प्रदान करने का एकमात्र तरीका सरकारी ख़र्च बढ़ाना है। हालाँकि, नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि न केवल ऐसा नहीं हो रहा है, बल्कि वास्तव में, जीडीपी के हिस्से के रूप में सरकारी ख़र्च में गिरावट आई है।

पहली तिमाही में, सरकारी निश्चित उपभोग ख़र्च (जीएफसीई) जो वित्तीय/राजकोषीय ख़र्च को मापता है, सकल घरेलू उत्पाद का 10.1 प्रतिशत था लेकिन दूसरी तिमाही में यह घटकर सकल घरेलू उत्पाद का 8.9 प्रतिशत हो गया था। पिछले कुछ वर्षों में, यह प्रवृत्ति दिखाई दी  है - कुछ तिमाहियों में मामूली वृद्धि देखी गई है जबकि अन्य में गिरावट देखी गई है। इसे सरकारी ख़र्च को कम करने की नीति के अलावा और कोई तरीका नहीं है, जिसे अक्सर नवउदारवादी भाषा में 'वित्तीय/राजकोषीय विवेक' नामक गुण के रूप में वर्णित किया जाता है। विवेकपूर्ण होने की बात तो दूर, यह दृष्टिकोण लोगों के बड़े वर्ग के बीच निरंतर दुख और अभाव के लिए अकेले ही जिम्मेदार है।

यह पूछा जा सकता है कि सरकार आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए मुफ्त राशन आपूर्ति जैसी तमाम योजनाएं जो चला रही है, उनका क्या? सरकार का अपना डेटा – जिसे ऊपर दिया गया है - पुष्टि करता है कि इन योजनाओं पर ख़र्च सरकार द्वारा किए जाने वाले ख़र्च का एक छोटा सा हिस्सा है। यही कारण है कि तमाम योजनाओं के बावजूद जीडीपी के हिस्से के रूप में सरकारी ख़र्च में गिरावट आई है। साथ ही, यह भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि योजनाओं की ये घोषणाएँ तदर्थ उपाय हैं जो अक्सर राजनीतिक/चुनावी विचारों से प्रेरित होती हैं। उदाहरण के लिए, मुफ्त 5 किलोग्राम खाद्यान्न योजना पिछले साल एक सरकारी निर्णय द्वारा औपचारिक रूप से समाप्त कर दी गई थी, लेकिन बाद में विधानसभा चुनावों और उसके बाद के आम चुनावों के मद्देनजर इसे फिर से शुरू किया गया है। हालांकि ऐसी योजनाएं निस्संदेह कई लोगों के लिए बहुत जरूरी राहत के रूप में आती हैं, आय और नौकरियों के संकट को सुधारने के लिए सरकारी कार्रवाई की संभावना को अभी भी पूरी तरह से संबोधित नहीं किया जा रहा है।

इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Good GDP Growth? Yes, But Family Spending Is Weak

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