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MSP की लीगल गारंटी मिलने से पर्यावरण को नुक़सान नहीं बल्कि फ़ायदा पहुंचेगा !

क्यों यह तर्क झूठ के प्रचार की तरह है कि MSP की लीगल गारंटी मिलने से पर्यावरण को नुक़सान पहुंचेगा?
Agriculture
Image courtesy : The Hindu Business Line

क्या आपने कभी सुना है कि मास्टर को वाजिब सैलरी देने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा? कंपनी के मैनेजर को वाजिब सैलरी देने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा? डॉक्टर और वकील को उचित फीस देने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा? अगर आपने यह नहीं सुना तो यह तो जरूर ही सुना होगा कि MSP की लीगल गारंटी देने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा।

सरकार, भाजपा समर्थक प्रवक्ता और टीवी के अधिकतर एंकर यही खेल खेल रहे हैं। लोगों के बीच में भ्रम का ऐसा सवाल उछाल रहे हैं जो तार्किकता की बुनियाद पर ही सही नहीं है। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन मौजूदा समय के महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन पर्यावरण और किसी को अपनी मेहनत वाजिब हक देना बिल्कुल दो अलग-अलग मुद्दे हैं। इन्हें एक में पिरोकर यह तो कहा जा सकता है कि उचित मेहनताना ना देने पर लोगों का जीवन स्तर नहीं सुधरेगा, वह पर्यावरण जैसे मुद्दे पर ध्यान नहीं देंगे लेकिन यह नहीं जा सकता कि उचित मेहनताना नहीं दिया जाए नहीं तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा। लेकिन किसानों के साथ यह खेल खेला जा रहा है। वह अपने साथ होने वाले शोषण से बचने के लिए अपनी मेहनत की वाजिब कीमत के तौर पर MSPकी लीगल गारंटी मांग रहे हैं, उन्हें उनका हक देने की बजाय पलट कर यह कहा जा रहा है कि एमएसपी की लीगल गारंटी देने पर पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा।

असल बात तो यह है कि पंजाब में धान की खेती बहुत अधिक मात्रा में होती है। पानी का जलस्तर नीचे चला गया है। इसी तरह से गन्ने की बुआई उत्तर प्रदेश और बिहार में बहुत अधिक होती है, किसान दूसरी फसलों के अलावा गन्ने की फसल अधिक बोते हैं। इसकी वजह से भी जलस्तर नीचे चला गया है। इन परेशानियों का जायज जवाब देने की बजाय झूठ के दम पर राजनीति करने वालों ने यह फैलाना शुरू कर दिया है कि एमएसपी की लीगल गारंटी देने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा।

कृषि अर्थशास्त्री प्रोफेसर सुखपाल सिंह न्यूज़क्लिक के साथ एक इंटरव्यू में कहते हैं कि पंजाब और हरियाणा में गेहूं और धान जोखिम भरी फसलें नहीं हैं। गेहूं और धान दोनों का उत्पादन और मार्केट सुनिश्चित है। ये दो कारक हैं जो किसानों को गेहूं और धान की तुलना में या उससे भी अधिक लाभदायक फसलों की ओर बढ़ने से रोकते हैं। मोनोकल्चर खेती ने जल स्तर को कम कर दिया है, मिट्टी की उर्वरता को कम कर दिया है और पराली जलाने की वजह से प्रदूषण का कारण बन गया है। अगर धान और गेहूं की उपज ही कृषि बाजार में सही दाम पर बिक पा रही है तो किसान कैसे कपास जैसे जोखिम वाले फसल को उगा पाएगा? पंजाब में जलस्तर की कमी और पर्यावरण को होने वाले नुकसान से बचने के लिए विविधतापूर्ण खेती ही जवाब है। लेकिन यह तब तक नहीं होगी जब तक धान और गेहूं की तरह दूसरी फसलों पर भी एमएसपी नहीं मिलेगी और इनका बाजार सुनिश्चित नहीं होगा। सरकार 23 फसलों पर एमएसपी की घोषणा करती है लेकिन मिलता केवल धान और गेहूं पर है। वह भी कृषि उपज का महज 6 प्रतिशत। जब तक सभी फसलों यानी कि धान, गेहूं, दाल, तिलहन इन सब पर एमएसपी नहीं मिलेगी तब तक पंजाब की पर्यावरण की परेशानी का हल नहीं निकलेगा।

इसका मतलब यह है कि पर्यावरण की परेशानी का हल एमएसपी की लीगल गारंटी ना देने से कभी नहीं निकलने वाला है। बल्कि एमएसपी की लीगल गारंटी देने पर ही किसान ज्वार, बाजरा, कपास और कई तरह की दाल उपजाने के लिए प्रोत्साहित होंगे। इसलिए एमएसपी की लीगल गारंटी देने से पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचेगा।

कृषि अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा अपने ढेर सारे लेखों में यह समझा चुके हैं कि किसानों की आमदनी बढ़ने पर ही वह पर्यावरण सम्मत फैसले ले पाएंगे। अगर उनकी आमदनी नहीं बढ़ेगी तो पर्यावरण सम्मत फैसले नहीं लेंगे। इसलिए भारत में एमएसपी की लीगल गारंटी ही कृषि से होने वाले पर्यावरण की परेशानी का हल है। अगर किसानों को यह दिखेगा कि धान और गन्ने के अलावा दूसरी फसल पर भी एमएसपी मिल जाएगी और उनकी लागत पूरी हो जाएगी साथ ही थोड़ा-बहुत मुनाफा भी हो जाएगा, तो वह क्यों केवल धान और गन्ने की खेती करेंगे?

अब कृषि और जलवायु परिवर्तन के सवाल को थोड़ा मौलिक ढंग से सोचते हैं। हम कार की बजाए बस में चलेंगे तो जिंदा रह सकते हैं। एयर कंडीशन की बजाय पंखे की हवा खा कर भी जिंदा रह सकते हैं। लेकिन बिना अनाज के हम जिंदा नहीं रह सकते हैं। अनाज है तो हमारा शरीर है। हमारा शरीर है तभी दुनिया की दूसरी चीजें हैं। समय के साथ-साथ दुनिया की आबादी बढ़ी है। इसलिए अनाज की मांग भी बढ़ रही है और बढ़ेगी। इस थ्योरी से अलग कोई दूसरी ऐसी थ्योरी नहीं हो सकती जहां पर अनाज केंद्र बिंदु न हो।

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इसलिए खाद्य सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है। आजादी से लेकर अब तक भारत की आबादी में तकरीबन 3.5 गुना का इजाफा हुआ है। इसी तरह आने वाले समय में भी इजाफा होगा। एक अनुमान के मुताबिक साल 2050 तक दुनिया की आबादी 9 बिलियन हो जाएगी। इतनी बड़ी आबादी के लिए भरपेट भोजन का इंतजाम करना सबसे महत्वपूर्ण सवाल होगा। इसलिए कृषि क्षेत्र को तो कभी नकारा नहीं जा सकता है।

यह नहीं, कहा जा सकता कि कृषि क्षेत्र से बड़ी मात्रा में कार्बन एमिशन होता है, इसलिए कृषि के कामों को छोड़ दिया जाए। कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी कटौती कृषि क्षेत्र में नहीं होगी। जहां पर भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन का महज 14% कार्बन उत्सर्जन होता है। बल्कि कार्बन उत्सर्जन की कटौती एनर्जी सेक्टर में होगी, जहां पर भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन का तकरीबन 40% कार्बन उत्सर्जन होता है। यहीं पर सबसे अधिक कार्बन उत्सर्जन होता है। इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का नंबर आता है। पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के लिहाज से कार्बन एमिशन की चुनौती को देखते हुए प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्थाएं एनर्जी सेक्टर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और ट्रांसपोर्टेशन सेक्टर में सबसे अधिक होगी, ना कि कृषि क्षेत्र में।

कृषि क्षेत्र हमेशा भोजन का इंतजाम करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण रहेगा। जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए फसलों की विविधता पर जोर दिया जा सकता है। ऐसी फसलों को लगाने पर जोर दिया जा सकता है जो जलवायु परिवर्तन का सामना कर सकें। इन सबके लिए किसानों को कृषि क्षेत्र से निकालना कभी जायज कदम नहीं कहलाएगा।बल्कि जायज कदम तो यह होगा कि किसानों की आमदनी बढ़ाई जाए। ताकि वह पर्यावरण सम्मत फैसले, जीवन और खेती को अपना पाएं।

हाल ही में फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन की रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया की तकरीबन 42 फ़ीसदी आबादी कुपोषण से जूझ रही है। ढंग का खाना खाने में असमर्थ है। द स्टेट ऑफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड की साल 2020 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की आबादी का 14 प्रतिशत (18.92 करोड़ लोग) हिस्सा अब भी कुपोषित है और कुपोषण के मामले में 117 देशों की सूची में भारत 102वें पायदान पर है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स (जीएचआई) की 2020 की रिपोर्ट में 107 देशों की सूची में भारत को 94वें स्थान पर रखा गया है।

यह आंकड़े भी यह बता रहे हैं कि कृषि क्षेत्र से किसानों को बाहर निकालने की नहीं बल्कि कृषि क्षेत्र को प्रबंधित करने की जरूरत है। कृषि क्षेत्र में प्रबंधन की भारी कमी है। भारत का अनाज अफ्रीका के किसी भूखे इंसान के काम आ सकता है। बिहार के किसी भूखे परिवार के काम आ सकता है। लेकिन यह सब तभी होगा जब पूंजीवादी व्यवस्थाएं गरीब लोगों को उनकी मेहनत का वाजिब हक देंगी। केवल अपना फायदा नहीं देखेंगी।

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अगर पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर फायदे की चाहत से ज्यादा जनकल्याण को महत्व दिया जाता तो कभी झूठ नहीं फैलाया जाता कि एमएसपी की लीगल गारंटी देने से पर्यावरण को नुकसान पहुंचेगा बल्कि यह सच फैलाने की कोशिश की जाती कि एमएसपी की लीगल गारंटी देना बहुत जरूरी है नहीं तो अव्यवस्थित और कुप्रबंध कृषि की वजह से पर्यावरण को बेवजह का नुकसान होता रहेगा।

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