Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

ग्राउंड रिपोर्ट : ‘बनारस वुड कार्विंग’ आख़िर क्यों ख़त्म होने की कगार पर?

"बारीक नक़्क़ाशी के काम में 250-300 रुपये मिलते हैं, इससे ज़्यादा नहीं मिल पाता है। हर चीज़ की महंगाई बढ़ गई, लेकिन वुड कार्विंग के काम के पैसे नहीं बढ़े।"
Wood Carving

दुनिया की सांस्कृतिक राजधानी कहा जाने वाला बनारस सिर्फ़ अक्खड़पन और फक्कड़पन के लिए ही मशहूर नहीं, यह ऐतिहासिक शहर बेजान लकड़ियों में जान फूंकने का महारथी भी रहा है। पहले हाथी के दांत पर ख़ूबसूरत डिज़ाइन बनाए जाते थे, फिर इस हुनर का जादू चंदन की लकड़ियों पर छा गया। बनारस के फनकार अब कैमा (हल्दू) की लकड़ियों पर अपने अद्भुत कौशल से कलाकृतियां उकेर रहे हैं। लेकिन लकड़ी पर कारीगरी करने की यह लोकप्रिय कला भी अब धीरे-धीरे मर रही है। दरअसल, बेजान लकड़ियों में जान फूंकने की बिसरती कला और असंगठित कलाकारों के हक़ की बात राजनीतिक गलियारों तक पहुंचने से पहले ही मौन हो जाती है।

‘बनारस वुड कार्विंग’ के नाम से मशहूर कलाकृत्रियां इस शहर की शान हैं, लेकिन नई पीढ़ी इस काम से दूर भाग रही है। लकड़ी को छीलकर अलंकृत करने या मूर्ति बनाने को अंग्रेज़ी में कार्विंग कहते हैं। जिस कला को बनारस ने सैकड़ों साल से आगे बढ़ाया, उस काम को अब कोई नहीं करना चाहता है। कोरोना संकट के बाद से लकड़ियों पर नक्काशी करने वाले फनकार परेशान हैं। करोमा गांव में लकड़ियों पर नक्काशी उकेरने की कला सिर्फ़ इसलिए ज़िंदा है क्योंकि बनारस में करोमा गांव के फनकार इस ख़त्म हो चुके कारोबार से आज भी उम्मीद की आस बांधे हुए हैं। बनारस में चार सौ से ज़्यादा शिल्पी वुड कार्विंग से जुड़े हैं, जो लकड़ियों को ऐसा आकार देते हैं कि हर देखने वाले की नज़र ठहर जाती हैं।

मुंह मोड़ रही नई पीढ़ी

वाराणसी और बाबतपुर एयरपोर्ट के बीच स्थित हरहुआ कस्बे के नज़दीक बसे करोमा गांव की विश्वकर्मा बस्ती में आज भी हर घर में लकड़ियों पर नक्काशी उकेरने का कारोबार होता है। वुड कार्विंग के फनकार अमित कुमार विश्वकर्मा कहते हैं, "कैमा की लकड़ियों से बुद्ध की मूर्ति, अशोक स्तंभ, पेपरवेट, फूलदान, कलमदान, छड़ी, पाउडर बाक्स, लैंप, चिलम और तमाम जानवरों की आकृतियां बनती हैं। लकड़ी से सजावटी सामान भी बनाए जाते हैं। नई पीढ़ी इस काम को करने के लिए कतई तैयार नहीं है, क्योंकि इसमें मेहनत ही नहीं, बल्कि पेशेंस (धैर्य) की भी ज़्यादा ज़रूरत पड़ती है।"

लकड़ियों पर नक्काशी उकेरते हुए अपने जीवन के कई दशक गुज़ारने वाली प्रेमा विश्वकर्मा से जब हमारी मुलाकात हुई तब वह अपने कारखाने में सम्राट अशोक की लाट पर चित्र उकेरने का बारीक काम कर रही थीं। उन्होंने न्यूज़क्लिक से कहा, "दिन-रात मेहनत करने के बाद भी बच्चों की अच्छी परवरिश करने के लिए पैसे नसीब नहीं होते। हमें पता है कि जितनी मेहनत हम इसपर लगाएंगे, उस हिसाब से हमें मेहनताना नहीं मिलेगा। प्रतिस्पर्धा के दौर में इस कला का महत्व नहीं रह गया है। दशकों से वुड कार्विंग का बारीक काम करने की वजह से अब आंखों की रौशनी ने भी तमाम कलाकारों का साथ छोड़ना शुरू कर दिया है।"

उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बेस्ट शिल्पी का अवार्ड जीतने वाली प्रेमा कहती हैं, "करोमा गांव के लोगों ने वुड कार्विंग की कला सीखी नहीं, क़ुदरत ने बख्शी है। मुग़ल बादशाहों के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत में हमारी कला ज़्यादा परवान चढ़ी। ब्रिटिश काल में हाथी दांत दक्षिण अफ्रीका से आते थे जिन्हें नक्काशी के बाद विदेश भेज दिया जाता था। हाथी दांत पर प्रतिबंध के बाद चंदन की लकड़ियों पर यह काम शुरू हुआ और जब इस पर भी प्रतिबंध लग गया तो कैमा की लकड़ियों पर नक्काशी होने लगी।

लकड़ियों पर नाज़ुक हाथों से की जाने वाली नक्काशी देखने में ख़ूबसूरत होती है। इसलिए आज भी इसे जो देखता है, सीखने बैठ जाता है। कल का यह शौक आज सैकड़ों लोगों की रोज़ी-रोटी है। सिर्फ़ करोमा ही नहीं, हरहुआ इलाके के दासेपुर, अहरक, बेरवां, हथिवार के अलावा बनारस शहर के लहरतारा में भी वुड कार्विंग का यही काम होता है। दिन भर काम करने के बाद मजूरी मिलती है तीन-चार सौ रुपये। जितनी मेहनत, मैं लकड़ियों पर नक्काशी उकेरने में करूंगी, उस हिसाब से यह पैसा नाकाफ़ी है। आमतौर पर हर धंधे में मज़दूरी बढ़ती है, लेकिन वुड कार्विंग में घट रही है। पहले नक्काशी से जितनी मज़दूरी मिलती थी, उतने में अब समूचा माल बिकता है। ग़ौर कीजिए, ऐसे में ज़िंदगी आखिर कैसे कटेगी?"

 बनारस में वुड कार्विंग के जिस हुनर को देखकर लोग हैरान रह जाते हैं और जिसे बनाने में कारीगर बहुत मेहनत करते हैं, उनका कहना है कि वो बेहाल हैं और उन्हें मेहनत के लिए चंद रुपये मिलते हैं, जबकि बड़े कारोबारी इसी धंधे से करोड़ों रुपये में खेल रहे हैं। कारीगर बताते हैं कि लकड़ियों पर बारीक से बारीक नक्काशी करने के बाद उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा तीन सौ रुपये ही मिलते हैं।

'सरकारें बदली, पर हालात नहीं'

करोमा की पुष्पा देवी अपने पति के साथ पूरे दिन वुड कार्विंग के धंधे में जुटी रहती हैं। इनके चार बच्चे हैं, जिनके लिए दो वक्त की रोटी का इंतज़ाम करने में इन्हें रोज़ मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। पुष्पा कहती हैं, "कोरोना के बाद से ज़िंदगी बेकार हो गई है। कैमा की जो लकड़ी पहले तीन सौ रुपये वर्ग फीट में मिल जाया करती थी, अब उसका दाम 1200 रुपये हो गया है। पहले जितनी मजूरी मिलती थी, इस समय उससे कम पर हमारी कलाकृतियां बिक रही हैं। साल बीते और सरकारें बदली, लेकिन हमें मिलने वाले मेहनताने में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई। कोरोना के दौर के बाद हालात ऐसे हैं कि हम कम से कम पैसे में भी काम करने पर राज़ी हो जाते हैं। अब तो हालात और भी ख़राब हो गए हैं। चालू काम सौ-पचास रुपये लेकर बनाना पड़ता है, जबकि बारीक नक्काशी के काम में 250-300 रुपये मिलते हैं और इससे ज़्यादा नहीं मिल पाता है। हर चीज़ की महंगाई बढ़ गई, लेकिन वुड कार्विंग के काम के पैसे नहीं बढ़े। लॉकडाउन के बाद करोमा गांव में बहुत से कारीगर बेरोज़गार हो गए हैं।"

वाराणसी में हस्त शिल्पकला के असिस्टेंट डायरेक्टर अब्दुल्ला कहते हैं, "वुड कार्विंग के कारीगरों को सरकार की तरफ़ से कई तरह की सुविधाएं मुहैया कराई जा रही हैं। सरकार की ओर से वक़्त-वक़्त पर ट्रेनिंग दी जाती है और काम बढ़ाने के लिए ऋण भी दिया जाता है। आने वाले वक़्त में अधिक से अधिक कारीगरों को लाभ देने की कोशिश होगी। जागरूकता की कमी की वजह से सरकार की स्कीम का लाभ कारीगरों तक नहीं पहुंच पाता है। वुड कार्विंग असंगठित क्षेत्र है। तमाम कारीगर किसी और के लिए काम कर रहे होते हैं, ऐसे में न्यूनतम मेहनताना तय करना मुश्किल होता है। जहां तक कारीगरों की आंखों की रौशनी की समस्या का सवाल है, उन्हें आयुष्मान कार्ड बनवाना चाहिए, जिससे उन्हें मुफ़्त इलाज मिल सके। पीएम के लोकल फॉर वोकल के नारे का मकसद उन विशिष्ट शिल्प कलाओं और उत्पादों को प्रोत्साहित करना है जो देश में कहीं और उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें बढ़ावा दिया जाए। वुड कार्विंग भी जीआई टैग यानी जिओग्राफिकल इंडिकेशन (भौगोलिक पहचान पट्टिका) धारक हैं। यह वह उत्पाद हैं जिनसे किसी जगह की पहचान होती है।"

कैमा की लकड़ियों पर ख़ूबसूरत नक्काशी उकेरने के महारथी किशुन विश्वकर्मा कहते हैं, "हम अपने बच्चों को यह हुनर नहीं सिखाएंगे। करोमा गांव में पहले हर कोई यह काम करता दिख जाता था, अब नई पीढ़ी इससे मुंह मोड़ रही है। वुड कार्विंग से अच्छा तो दिहाड़ी मज़दूरी है। बुनकरों की तरह हमें भी सस्ती बिजली की दरकार है। सस्ती बिजली और मेहनताने का मुद्दा कई बार उठाया गया, फिर भी स्थिति नहीं सुधरी बल्कि सारा फ़ायदा बीच वाले ले जाते हैं। अगर कोई काम दो सौ का है तो बिचौलिये सौ रुपये रुपये ले लेते हैं, जबकि कारीगर को महज़ 80 रुपये ही दिए जाते हैं। कारीगरों को सुविधाएं देने की बातें तो हर बार होती हैं, लेकिन ज़मीन पर कभी नहीं उतरतीं। हमें कई मर्तबा भरोसा दिलाया गया कि हमारा भी शिल्प कार्ड बनाया जाएगा जिससे कारीगर के तौर पर हमारी पहचान होगी और कई सरकारी योजनाओं का लाभ मिलेगा। मगर अफसोस, हमें आज तक किसी तरह का कोई लाभ नहीं मिला।"

दशरथ की पत्नी सीता विश्वकर्मा वुड कार्विंग के साथ अपना समूचा घर संभालती हैं। बच्चों की परवरिश से लेकर भोजन बनाने तक का काम भी इनके ज़िम्मे ही है। वह कहती हैं, "हम चाहे जितनी भी मेहनत कर लें, मुश्किल से सौ-पचास रुपये ही नसीब होते हैं। मैं चार पैसों की कमाई भी खोना नहीं चाहतीं, इसलिए ये काम नहीं छोड़ रही हूं। सरकारी राशन ज़रूर मिला, लेकिन कभी राशन था तो पकाने के लिए ईंधन नहीं,वहीं कभी गैस सिलेंडर था तो चावल नहीं।"

फनकारों के मुद्दे

वुड कार्विंग के कारीगरों की मांग है कि उनके लिए बेहतर योजना बने और ऐसे सेंटर बनाए जाएं जहां स्थायी काम मिले और वाज़िब मेहनताना भी। कलाकृतियों में चूड़ी काटने का काम करने वाले प्रकाश विश्वकर्मा की पत्नी निशा कहती हैं, "किसी नेता से उम्मीद नहीं है। चुनाव जीतने के बाद वो हमारे जैसे कारीगरों को भूल जाते हैं। चुनावी सीज़न में सभी दलों के नेता बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन सरकार में आने के बाद वही नेता कहते हैं कि अभी क़ानून बन रहा है, अभी आदेश होगा, लेकिन वो आदेश आते-आते दूसरा चुनाव आ जाता है। फिर दोबारा वही वादे। आज तक किसी सरकार ने वुड कार्विंग के कारीगरों के लिए ऐसी कोई योजना नहीं बनाई जिसके तहत कारीगरों का हेल्थ कार्ड बन जाए, उनका बीमा बन जाए, उनकी ख़त्म होती आंख की रौशनी के लिए स्वास्थ्य सुविधा मिले, आज तक कोई फ़ायदा नहीं हुआ है।"

बनारस में वुड कार्विंग का इतिहास क़रीब ढाई सौ साल से भी ज़्यादा पुराना है। शुरू से ही यह असंगठित क्षेत्र तक सीमित रहा, इसलिए इसमें शोषण की गुंजाइश बनी रही। फिर भी यह कला ख़त्म नहीं हुई। दूर-दूर तक पैर पसार चुके बनारस शहर की आबादी 38 लाख से ज़्यादा है और बाबतपुर के बहुत आगे तक यह शहर आबाद हो चुका है। इस बीच शहर की तेज़ रफ़्तार में लकड़ियों पर ख़ूबसूरत नक्काशी उकेरने का हुनर दफ़न होता चला गया। तमाम मुश्किलों के बावजूद प्रेमशंकर विश्वकर्मा, चंद्र प्रकाश विश्वकर्मा, संतोष, राजेश, महेश प्रसाद, संदीप विश्वकर्मा, राजेश विश्वकर्मा वुड कार्विंग को लेकर खासे उत्साहित हैं।

वुड कार्विंग के कारीगर अशोक शर्मा दावा करते हैं, "साल 1902 में मेरे दादा रामदौर शर्मा ने करोमा गांव में वुड कार्विंग की कला में जान फूंकी थी। उन्होंने बनारस और रामनगर के कारीगरों को जुटाया और हाथी दांत पर ख़ूबसूरत नक्काशी से दुनिया भर का दिल जीता। विदेशों में आज भी लोग करोमा की वुड कार्विंग के दीवाने हैं और हमारी कला को याद करते हैं। अकसर भूले-भटके कद्रदान बेहतरीन कलाकृतियों की तलाश में यहां आते ज़रूर हैं, लेकिन ज़्यादातर लोगों को मायूसी ही हाथ लगती है।"

अशोक यह भी बताते हैं, "मौजूदा समय में लकड़ियों पर नक्काशी उकेरने के लिए चपटी और गोल रुखानियों के अलावा छुरी का इस्तेमाल किया जाता है। काठ की मुंगरी (हथौड़ा) भी प्रयोग में लाई जाती है। बारीक काम में रुखानी को ठोंका नहीं जाता। केवल एक हाथ की गदोरी (हथेली) में दबाया जाता है और दूसरे हाथ की अंगुलियों से उसके अग्र को नियंत्रित किया जाता है। हमें उम्मीद है कि मोदी सरकार किसी न किसी दिन हमारी कला की सुध ज़रूर लेगी। इस उम्मीद के साथ हमनें यह आस भी बांध रखी है कि अगर सरकार करोमा गांव में कोई फैक्ट्री खोल दे तो सजावटी सामानों का कारोबार फिर से ऊंचाइयों पर पहुंच जाएगा। सैकड़ों लोगों का रोज़गार बहाल होगा और ख़त्म हो चुकी ये कला एक बार फिर से अपनी पुरानी पहचान को न सिर्फ़ देश में बल्कि दुनिया में कायम कर सकेगी।"

सुर्खियां बटोर रहा करोमा

बनारस के वुड कार्विंग की कारीगरी शुरू से ही दिलकश रही है। हस्तशिल्पियों का हुनर भी ऐसा निराला है कि दूर दराज़ के कद्रदानों ने इसे सराहा और इसकी बदौलत सैकड़ों घरों के लोगों को रोज़गार मिला। बनारस शहर के पश्चिम में स्थित हरहुआ कस्बे के नज़दीक करोमा गांव आज भी सुर्खियां बटोरता आ रहा है। वुड कार्विंग के फनकार दासेपुर के रमेश विश्वकर्मा, अहरक के मुन्ना और हथिवार के जंगी प्रसाद को लगता है कि कोरोना के संकटकाल के बाद बनारस में लकड़ियों पर नक्काशी उकेरने का कारोबार तेज़ी से ख़त्म होता जा रहा है। किसी भी कलाकृति को बनाने के लिए विशेषज्ञ शिल्पियों की अलग-अलग टीमें काम करती हैं। कोई कार्विंग करता है तो कोई पॉलिश और कुछ लोग मूर्तियों अथवा कलाकृतियों को जोड़ने के फनकार होते हैं। विदेशी कस्टमर्स के घटने की वजह से बनारस में वुड कार्विंग के तमाम शो-रूम बंद हो गए हैं। करोमा गांव के कई फनकारों ने नक्काशी उकेरने की कला छोड़कर मजूरी करनी शुरू कर दी है। कुछ लोग रिक्शा चला रहे हैं तो कुछ शिल्पी अपनी आजीविका चलाने के लिए ईंट-गारे का काम करने लगे हैं।

हालांकि वुड कार्विंग के काम से जुड़े संदीप विश्वकर्मा जैसे युवा फनकारों को अभी भी इस शिल्पकला से गहरा लगाव है। वह कहते हैं, "हमारी ख्वाहिश है कि सरकार इस ऐतिहासिक धरोहर बचाने के लिए आगे आए और इस शिल्प कला को फिर से खड़ा करने में मदद करे।"

संदीप बताते हैं, "राष्‍ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की पहल पर श्री विश्वकर्मा वुड कार्विंग प्रोड्यूशर कंपनी लिमिटेड बनाई गई है, जिससे क़रीब 235 शिल्पी जुड़ चुके हैं। बेजान लकड़ी में जान फूंकने की बिसरती कला को ज़िंदा रखने के लिए शिल्पियों को मालिक बनाया जा रहा है। बोर्ड ऑफ डायरेक्‍टर्स का गठन कर दिया गया है। ख़ास बात यह है कि वाराणसी के शिल्पियों की यह पहली कंपनी है जो कच्‍चे माल की खरीद से लेकर निर्माण, विपणन व निर्यात तक की ज़िम्मेदारी खुद संभालेगी। मुनाफ़ा सीधे शिल्पियों के खाते में जाएगा। शिल्पियों की अपनी कंपनी के ज़रिए वुड कार्विंग उद्योग को नई ऊंचाई मिलने के साथ कारीगरों की तकदीर बदलने की उम्मीद है। करोमा गांव में वुड कार्विंग कंपनी का मुख्यालय बनाया जाएगा। यहां क्लस्टर बनाने का भी प्रस्‍ताव है, जिससे नई पीढ़ी को नक्काशी की कला सीखने का मौका मिलेगा।"

मास्‍टर शिल्‍पी व स्‍टेट अवॉर्डी प्रेमशंकर विश्वकर्मा कहते हैं, "बुद्धिष्ट देशों के अलावा यूरोप में लॉर्ड बुद्धा की विभिन्‍न मुद्राओं वाली मूर्तियों के साथ-साथ, एक ही लकड़ी में हाथी के ऊपर कई हाथी, ख़ूबसूरत स्मोकिंग पाइप, तिरंगे के साथ पेन स्‍टैंड, अशोक पिलर, इंटीरियर डेकोरेशन से जुड़ी चीज़ों की ज़बरदस्त डिमांड है। अब शिल्‍पियों की अपनी कंपनी से डूबते उद्योग को संजीवनी मिलने की आस बंधी है। करोमा गांव में वुड कार्विंग कंपनी का मुख्यालय बनाए जाने पर शिल्पियों को कच्‍चा माल उचित मूल्‍य पर एक जगह मिलेगा। साथ ही बुनकरों की तरह बिजली बिल में छूट मिलने का मार्ग प्रशस्‍त होगा। वुड कार्विंग के लिए शिल्पियों को अत्‍याधुनिक मशीनें मिल सकेंगी। क्लस्टर में अच्‍छे डिज़ाइनर व मास्‍टर शिल्‍पी प्रशिक्षण देंगे। ऑनलाइन मार्केटिंग से ‘ब्रैंड वाराणसी’ को नया बाज़ार मिल सकेगा।"

जीआई विशेषज्ञ और पद्मश्री डॉ. रजनीकांत कहते हैं, "साल 2022 में वुड कार्विंग जीआई टैग (ग्राफिकल इंडीकेशन) में सूचीबद्ध हो चुका है। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय बाजार का लाभ और सरकारी सुविधाओं से बहुत कुछ बदलाव आना तय है। फिलहाल बनारस की नक्काशी कला की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। वुड कार्विंग उत्पाद से मुनाफ़ा कमाना है तो मेलों और प्रदर्शनियों में अपने प्रोडक्ट्स को ले जाना पड़ेगा। मोदी सरकार ने हस्तशिल्पियों के उत्पादों पर 40 लाख रुपये की जीएसटी छूट दे रखी है। बनारस में प्रेम शंकर विश्वकर्मा, चंद्रप्रकाश विश्वकर्मा, ओमप्रकाश शर्मा, घनश्याम, प्रेमा विश्वकर्मा, गणेश प्रसाद समेत कई शिल्पियों को उत्तर प्रदेश सरकार सम्मानित कर चुकी है। वुड कार्विंग के अच्छे कलाकार अच्छी कमाई कर रहे हैं। थाईलैंड, जापान, कोरिया, जर्मनी में बुद्ध की मूर्तियों की ज़बरदस्त डिमांड है। दिल्ली, जयपुर के अलावा बनारस के सारनाथ व विश्वनाथ गली में जितने भी देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं, वो करोमा की नक्काशी कला पर ज़रूर फिदा हो जाते हैं। चाहे वो बुद्ध की मूर्तियां हों या अशोका की लाट, हर कोई इसे अपने साथ याद के तौर पर ले जाना चाहता है।"

(लेखक बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest