Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

भारत महिला सशक्तिकरण और जेंडर समानता में काफ़ी पीछे, संसद से लेकर श्रम तक औरतों की भागिदारी कम !

महिलाओं को समान अवसर तो कम मिलते ही हैं, इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार के उच्च पदों पर भी महिलाओं के लिए काफ़ी असमानता दिखाई देती है।
gender
फ़ोटो साभार : SheThePeople

"भारत महिला विकास से महिला नेतृत्व वाले विकास की ओर तेजी से बदलाव देख रहा है, हमने अपने माननीय प्रधानमंत्री के नेतृत्व में अपनी रणनीति में एक बहु-आयामी दृष्टिकोण विकसित किया है।"

ये भाषण बीते साल केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने संयुक्त राष्ट्र आयोग (यूएनसीएसडब्ल्यू) के 66वें सत्र को संबोधित करते हुए दिया था। उन्होंने ये भी कहा था कि भारत सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक मोर्चे पर महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण में सबसे आगे रहा है। इसी साल स्मृति ईरानी ने विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) के ‘वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक’ आकलन पर भी सवाल उठाया था, जिसमें लैंगिक समानता के मामले में भारत को 135वें स्थान पर रखा गया था। हालांकि मंत्री साहिबा के दावों से इतर देश की जमीनी सच्चाई अब रिपोर्ट्स के साथ ही आक्रोश में भी आसानी से नज़र आ जाती है।

स्वतंत्रता दिवस पर लाल किला के प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस महिला सम्मान और सशक्तिकरण की बात कही वो उसी दिन बिलकीस बानो के अपराधियों की रिहाई के साथ खोखली साबित हो गई। आज एक बार फिर मणिपुर में महिलाओं की दुर्दशा को लेकर देश पीेएम मोदी और मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह से सवाल पूछ रहा है, हालांकि कई बीजेपी नेता और मंत्री आज भी देश में महिलाओं की बेहतर स्थिति के दावे करते जरा भी हिचक नहीं रहे हैं। ऐसे में यूनाइटेड नेशन डेवलपमेंट प्रोग्राम (यूएनडीपी) और यूएन वीमेन की नई रिपोर्ट "द पाथ्स टू इक्वल" ने कई चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए हैं।

भारत को पिछड़े देशों की सूची में शामिल

रिपोर्ट को देखें, तो महिला सशक्तीकरण सूचकांक (डब्ल्यूईआई) और वैश्विक लैंगिक समानता सूचकांक (जीजीपीआई) से जुड़े आंकड़ों में भारत को पिछड़े देशों की सूची में रखा गया है। जीजीपीआई यानी वैश्विक लिंग समानता सूचकांक में संसद में महिलाओं की भागीदारी का आंकलन किया गया है। जिसके मुताबिक 2023 के दौरान संसद में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 14.72 फीसदी थी वहीं स्थानीय सरकार में उनकी हिस्सेदारी 44.4 फीसदी दर्ज की गई। हालांकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राष्ट्रपति के रूप एक महिला का चुनाव महिला सशक्तिकरण की गाथा का एक अंश है। जो दर्शाता है कि समाज जागरूक हो रहा है। लेकिन अभी भी इस क्षेत्र में काफी कुछ किया जाना बाकी है।

इसी तरह यदि शिक्षा की बात करें तो जहां 2022 में केवल 24.9 फीसदी महिलाओं ने माध्यमिक या उच्चतर शिक्षा हासिल की थी वहीं पुरुषों में यह आंकड़ा 38.6 फीसदी दर्ज किया गया। इसी तरह यदि 2012 से 2022 के आंकड़ों को देखें तो केवल 15.9 फीसदी महिलाएं ही मैनेजर पदों पर थी। यानी शिक्षा और रोज़गार के उच्च पदों पर भी महिलाओं के लिए काफी असमानता दिखाई देती है।

रिपोर्ट में श्रमबल का भी जिक्र है, जिसके अनुसार हमारे देश में विवाहित महिलाएं या जिनका छह वर्ष से कम उम्र का बच्चा है उनकी श्रम बल में भागीदारी 27.1 फीसदी दर्ज की गई। इसी तरह 2018 में करीब 18 फीसदी महिलाएं और लड़कियां अपने साथी द्वारा शारीरिक या यौन हिंसा का शिकार बनी थी। वहीं 2012 से 2022 के बीच 43.53 फीसदी युवा बच्चियां शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से वंचित रह गई थी।

आधी आबादी को नहीं मिलते पूरे अवसर

यदि वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी आंकड़ों को देखें तो भारत की कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी 48.4 फीसदी है। ऐसे में यदि इन महिलाओं को समान अवसर नहीं मिलते तो ये पूरे समाज की विफलता है। यदि महिलाओं को भी देश की प्रगति में हिस्सेदार बनाया जाए तो उससे देश कहीं ज्यादा तरक्की की ओर अग्रसर होगा। डब्ल्यूईआई इंडेक्स में भारत को 0.52 अंक और जीजीपीआई इंडेक्स में 0.56 अंक दिए गए हैं। इस सूची में भारत के साथ उसके पड़ोसी देश पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका भी शामिल हैं।

वैसे देश-विदेश में महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा के तमाम दावे खोखले ही नजर आते हैं। यूएनडीपी और यूएन वीमेन की रिपोर्ट की मानें तो, केवल एक प्रतिशत महिलाएं ही उच्च लैंगिक समानता, महिला सशक्तिकरण वाले देशों में रहती हैं यानी बाकी 99 प्रतिशत महिलाएं आज भी ऐसे देशों में रहती हैं जहां जेंडर असमानता, यौन हिंसा और शिक्षा, स्वास्थ्य-रोजगार तक उनकी पहुंच कम है। इस रिपोर्ट के मायने तब और बढ़ जाते हैं जब महिलाओं के विकास, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता, सामर्थ्य की दिशा में हुई प्रगति का आकलन दो सूचकांकों के जरिए किया गया हो। यह दोनों महिला सशक्तिकरण सूचकांक (डब्ल्यूईआई) और वैश्विक लिंग समानता सूचकांक (जीजीपीआई) अलग-अलग होते हुए भी एक दूसरे के पूरक हैं।

गौरतलब है कि हाल ही में जारी विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की वार्षिक लैंगिक अंतराल रिपोर्ट, 2023 में भी भारत को 146 देशों में 127वां स्थान मिला था। इस रिपोर्ट में बीते साल के मुकाबले हम 8 स्थान ऊपर जरूर आ गए लेकिन कई छोटे देशों से अभी भी पीछे रहे। यहां दक्षिण एशिया में बांग्लादेश 72.2 प्रतिशत लैंगिक बराबरी के साथ 59वें स्थान पर था, जबकि श्रीलंका और नेपाल सहित 5 देश भारत से ऊपर थे।

बहरहाल, मौजूदा समय में सरकार भले ही बेटी बचाओ और महिलाओं की सुरक्षा के दावे करती हो लेकिन ज़मीनी वास्तविकता रिपोर्ट देश में जेंडर गैप की गंभीरता को दिखाती है। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या सरकार इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाएगी या इसे भी नज़रअंदाज़ कर सच्चाई से मुंह मोड़ती रहेगी।

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest