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समर्थन के अभाव में बढ़ रहा 'कोविड विधवाओं' का संकट

कोविड-19 की वजह से विधवा हुईं महाराष्ट्र की ग्रामीण महिलाओं के बयानात से उनके संकट और भेदभाव, शोषण और लांछन की सच्चाई ज़ाहिर होती है।
समर्थन के अभाव में बढ़ रहा 'कोविड विधवाओं' का संकट

कोविड-19 महामारी की वजह से भारत में 30,000 से ज़्यादा बच्चे अनाथ हुए हैं और कई महिलाएं विधवा हो गई हैं। केंद्र सरकार ने विधवा हुई महिलाओं का आंकड़ा जारी नहीं किया है। मगर डराने वाली बात यह है कि हमारे आसपास कई लोग अपने चाहने वालों को खो रहे हैं।

अभी तक किसानों, एचआईवी/एड्स मरीज़ों, सैनिकों की विधवाओं और उनके अधिकारों के मद्देनज़र काम किये जा रहे थे। हम महाराष्ट्र के किसानों की विधवाओं, उत्तर प्रदेश में वृंदावन की विधवाओं, पश्चिम बंगाल में शेर के हमलों में मरे लोगों की विधवाओं, कश्मीर की आधी-विधवाओं के बारे में जानते हैं। अब इस दर्दनाक सूची में 'कोविड विधवाओं' की एक नई श्रेणी जुड़ गई है।

लॉकडाउन के दौरान, राहत कार्य के लिए महाराष्ट्र के औरंगाबाद, जालना और अहमदनगर ज़िलों में किये गए दौरे में कोविड-19 की वजह से विधवा हुई महिलाओं का संकट सामने आया। यहाँ उनके अनुभवों और महामारी से पैदा हुए संकट वह कैसे जूझ रही हैं, का ज़िक्र किया गया है।

कुल 17 महिलाओं ने कोविड-19 से अपने पतियों को खोने के दर्द का ज़िक्र किया। इसमें से 15 महिलाओं की उम्र 25-45 वर्ष के बीच थी और 2 महिलाओं की उम्र 45 साल से ज़्यादा थी। इनमें से ज़्यादातर बहुत कम पढ़ी-लिखी थीं, मगर 2 ग्रेजुएट भी थीं। यह महिलाएं अपने परिवार को चलाने के लिए, घरेलू कामकाज, खेत मज़दूरी और कुछ प्राइवेट सेक्टर में काम करती हैं। इन महिलाओं को पिछले साल लॉकडाउन में बंद हुआ काम वापस नहीं मिला है।

वर्षा की कठिनाई

अप्रैल में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान वर्षा के पति की मृत्यु हो गई। उनकी शादी को 15 साल हो गए थे। उनके परिवार में सास-ससुर और एक बेटा हैं। वर्षा के पति और वह ख़ुद एक प्राइवेट कंपनी में काम करते थे। वर्षा की नौकरी पिछले साल के लॉकडाउन में चली गई थी, जो अभी तक वापस नहीं मिली है। पांच साल पहले एक रूम-किचन का फ़्लैट (एक कमरा-रसोई) ख़रीदा गया था। परिवार किसी तरह से बीमार ससुर के चिकित्सा ख़र्च के साथ-साथ होम लोन की किस्तों का भुगतान, बेटे की शिक्षा ऑनलाइन शुरू होने के बाद से मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट पर अतिरिक्त ख़र्च की ज़िम्मेदारियां निभा रहा था। उनके पति की कंपनी ने लॉकडाउन के दौरान वेतन में कटौती की थी, जिसकी वजह से आर्थिक तंगी काफ़ी बढ़ गई थी। मगर जब उनके पति को बुखार हुआ और वह कोविड पॉज़िटिव हुए, तब चीज़ें और बिगड़ गईं।

दो दिन की जद्दोजहद के बाद वर्षा के पति को एक अस्पताल में बेड मिला। मगर उनकी अगले दिन मौत हो गई। वर्षा कहती हैं कि उसी दिन से उनकी परेशानियां शुरू हुईं। उन्होंने न्यूज़क्लिक को बताया : "मुझे कॉर्पोरेशन से फ़ोन आया, और मैं और बेटा अंतिम संस्कार के लिए गए। हम दोनों की रिपोर्ट नेगेटिव आई थी। मेरे सास-ससुर की रिपोर्ट जब तक नहीं आई थी, मैं काफ़ी चिंतित थी मगर उनकी रिपोर्ट भी नेगेटिव ही आई। श्मशान घाट का दृश्य मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी। हम घर आये, पड़ोसियों ने हमारी मदद की। मुझे दिलासा दी जा रही थी। हमारे कोई रिश्तेदार उस वक़्त घर नहीं आ पाए। वह बस फ़ोन कर के जानकारी लेते थे। 15 दिन-3 हफ़्ते बाद मेरे देवर घर आए। उस समय मुझे बहुत बड़ा सदमा लगा। मेरे देवर घर के अंदर नहीं आए। मैं उनसे दरवाज़े पर खड़ी होकर बात कर रही थी। इसी बीच मेरे सास-ससुर ने अपना सामान लिया और उनके साथ जाने लगे। जब मैंने पूछा कि वह क्या कर रहे हैं तब उन्होंने कहा, 'तुम्हारी वजह से हमारा बेटा मर गया, उसे कोरोना नहीं था। उसे अस्पताल भेजा गया इसलिये उसकी मौत हो गई।'"

सास-ससुर उनके देवर के साथ चले गए, यह कहते हुए कि वह अब वर्षा के साथ नहीं रह सकते। हालांकि, वर्षा के पति कंपनी में ही संक्रमित हुए थे। वर्षा ने कहा कि वह तो अपने सास-ससुर से मदद की उम्मीद कर रही थीं। उन्होंने कहा, "मेरे पति के बाद मेरे पास नौकरी ढूंढने के अलावा कोई और चारा नहीं है। मेरा बेटा अभी दसवीं में है। उसकी पढ़ाई बची है। मैंने सोचा था जब मैं काम पर जाऊंगी, मेरे सास-ससुर उसका ख़याल रख लेंगे। मगर अब वह चले गए हैं, तो घर में मैं और मेरा बेटा ही बचे हैं। 8 दिन पहले, मेरा देवर घर आया था। मैंने मन ही मन सोचा कि आख़िरकार यह हमारे बारे में पूछने आया है, मगर है मेरा भ्रम था। उसने मुझसे कहा कि यह घर उसके भाई का है। और उसके जाने के बाद यह उसके माँ-बाप का होगा। इसलिये मैं यह घर छोड़ कर जल्द से जल्द चली जाऊं।"

जबकि पति की मौत के बाद इस घर पर वर्षा का अधिकार है। उन्होंने कहा, "मेरे पति की मौत के एक महीने के अंदर यह सब हुआ है। मैं अपने बेटे की पढ़ाई, होम लोन और नौकरी को लेकर परेशान हूँ। सबसे बड़ा सवाल यही है कि मैं कैसे जियूंगी।"

रमाबाई : परिवार ने ही अकेला छोड़ दिया

70 साल की रमाबाई का परिवार बड़ा है। उनकी 5 बेटियां, 5 दामाद, 3 पौत्र दामाद, 1 बेटा और एक बहु, 1 पोता और 1 पौत्र वधु सब एक ही शहर में रहते हैं। रमा के पति 80 साल के थे और उन्हें बुढापे की बीमारियों के साथ-साथ हाई ब्लड प्रेशर की शिकायत रहती थी। मार्च में कोविड संक्रमित होने के 8 दिन के अंदर उनकी मृत्यु हो गई। उनके बेटे और बहू की रिपोर्ट भी पॉज़िटिव आई थी। रमाबाई और उनके पोते ने उनके पति का अंतिम संस्कार किया। उन्होंने अपना दुख ज़ाहिर करते हुए कहा, "हमारा परिवार इतना बड़ा है कि अगर परिवार में शादी होती है तो परिवार के सदस्यों की संख्या ही 150 लोगों की होती है। लेकिन तीन महीने हो गए जब उन्हें पता चला कि उनका (उनके पति का) निधन कोरोना के कारण हुआ है, और कोई हमें देखने नहीं आया है। जो रिश्तेदार मिलने आते हैं, वे हमारे घर का पानी पीने से भी कतराते हैं। वे हमें दरवाजे पर मिलते हैं। बेटियां फ़ोन करती हैं। वे हमसे मिलने तभी आ सकती हैं जब दामाद उन्हें लाएंगे। सब कुछ अच्छा हो तो सब आते हैं। मानव जीवन के बारे में बहुत अनिश्चितता है।

बेघर हुईं सोनाली

35 साल की उम्र में सोनाली ने अपने पति को कोविड-19 से खो दिया। वह, उनका बेटा और उनके पति किराए के मकान में रह रहे थे। पति की मौत के बाद मकान मालिक ने इस साल लॉकडाउन के दौरान एक महीने का किराया नहीं मांगा लेकिन ज़ोर देकर कहा कि वह अगले महीने किराया दें। चूंकि वह किराया नहीं दे सकती थीं, मकान मालिक ने उन्हें अपना सामान छोड़ने और अपने बेटे के साथ घर ख़ाली करने के लिए मजबूर किया। उसने उनसे कहा कि वह किराया चुकाने के बाद अपना सामान वापस ले जाएं। सोनाली दूसरे राज्य की रहने वाली हैं और रोज़गार की तलाश में अपना गांव छोड़ कर गई हैं। हालाँकि वह अभी अपने दोस्त के घर पर अस्थायी रूप से रह रही हैं जिसने उसे आश्रय दिया था, लेकिन मुख्य सवाल यह है कि सोनाली अपने और अपने बच्चे के लिए भोजन, कपड़े और रहने की बुनियादी ज़रूरतों को कैसे पूरा कर पाएंगी।

मानसी : यौन शोषण का मामला?

30 साल की मानसी के पति की कोविड-19 से मृत्यु हो गई। वह अपने 1 साल के बेटे के साथ अपने सास-ससुर के साथ रहती हैं। मानसी की सास ने उनका काफ़ी समर्थन किया है मगर मानसी अपने पति को खोने, एक साल के बेटे को पालने और नौकरी ढूंढने की चिंता की वजह से काफ़ी परेशान हैं। इसके साथ ही, उन्हें अपने ससुर की वजह से अजीब तरह के उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है। उनके ससुर ने घटिया चुटकुले मारने शुरू कर दिए, कैंची से उनके कपड़े काट दिए। और अगर वह कोई और कपड़े पहनतीं, तो वह उन्हें फटे कपड़े पहनने को मजबूर करता था, और उन्हें गालियां देता था। जब मानसी की सास ने इसका विरोध तो उसने उन्हें भी मारा और प्रताड़ित किया। उन्होंने कहा कि जब कोई पड़ोसी आता, तब वह अच्छे से व्यवहार करने लगता था।

मानसी की सास ने अपने पति के ख़िलाफ़ पुलिस रिपोर्ट दर्ज कराने का फ़ैसला लिया। जब दोनों महिलाएं पुलिस थाने गईं, तो कथित तौर पर पुलिस ने सास की बात नहीं मानी और यह कहा कि उनका अपनी इस बुढ़ापे में अपनी बहू का शोषण कैसे कर सकता है। कथित तौर पर पुलिस ने मानसी को भी आवाज़ नहीं उठाने दी और उन्हीं पर इल्ज़ाम लगाया कि वह अपने ससुर के साथ ग़लत व्यवहार करती हैं। आख़िरकार, एक संगठन की मदद से यह मामला दर्ज करवाया गया।

आशाबाई : अपनों ने ही पराया कर दिया

इसी तरह के अनुभव ग्रामीण इलाक़ों की महिलाओं ने भी साझा किए। 65 साल की आशाबाई के पति की कोविड पॉज़िटिव होने के 15 दिन बाद मृत्यु हो गई। उनके बड़े परिवार में 3 बेटे, बहु और उनके बच्चे हैं। जबकि परिवार के सब लोग नेगेटिव थे, और जो संपर्क में आये वो भी नेगेटिव ही रहे, इसके बावजूद आशाबाई के पति की मौत के बाद घर का माहौल बदल गया।

अपने आंसू पोंछते हुए आशाबाई ने कहा, "मुझे एक कमरे में रखा गया था। मेरे बेटे कहने लगे कि अन्ना(उनके पिता) की वजह से वह भी कोरोना संक्रमित हो सकते हैं। मेरे बेटों ने कहा 'तुम्हारा जीवन तो बीत चुका है, मगर हमारा जीवन अभी बचा है'। मेरे पोतों को मेरे पास नहीं आने दिया जाता था।" उन्होंने कहा कि यह सब उनके पति की मौत के 1 महीने बाद ही हो रहा था। उन्होंने कहा, "दूसरे महीने में, मेरे बेटों ने मुझे खेत के पास छोड़ दिया। मुझे कहा कि यहाँ रहूं और खेत में जो चाहे वह करूँ।" उन्होंने बताया कि वह 6 महीने से अकेली रह रही हैं।

अरुणा : संघर्ष जारी है

32 साल की अरुणा अपनी पति की मौत के बाद अपने 6 साल के बेटे के साथ जीवनयापन की कोशिश में लगी हुई हैं। उनके परिवार ने हाल ही में गांव में  2 कमरे का घर बनवाया था। अरुणा ने बताया कि उनके पति को पहले बुखार आया था जिसके बाद उन्होंने कोविड का टेस्ट करवाया। 4 दिन बाद ख़बर आई कि रिपोर्ट पॉज़िटिव आई है।

उन्होंने कहा, "हम गांव के अस्पताल में गए। वहाँ उन्हें भर्ती कराने की कोई सुविधा नहीं थी। 2 दिन बाद तालुका के गांव में मेरे देवर ने एक प्राइवेट अस्पताल में बेड का इंतज़ाम किया और मेरे पति को भर्ती करवाया गया। मैंने अपने बेटे को अपनी माँ के पास भेज दिया। मेरी सास घर पर थीं। मैं भी पॉज़िटिव थी मगर मुझे कोई लक्षण नहीं थे।" उन्होंने बताया कि वह बहुत परेशान थीं क्योंकि अस्पताल में बेड मिलना बहुत मुश्किल था। वह घर में ही क्वारन्टीन हो गईं और इलाज शुरू कर दिया।

उन्होंने कहा, "मेरे देवर मेरे पति के लिए इधर-उधर भागदौड़ कर रहे थे। उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं था। उनका ऑक्सीजन लेवल कम हो रहा था। उन्हें औरंगाबाद शिफ़्ट किया गया। वहाँ भी बेड मिलना बहुत मुश्किल था। उन्हें देर रात को बेड तो मिल गया मगर हमें सुबह फ़ोन आया कि मेरे पति की मृत्यु हो गई है।"

अरुणा ने आगे कहा, "मैं अपने बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतित हूं। मेरे पति आयुर्वेदिक उपचार केंद्र में काम करते थे जहां मुझे नौकरी मिल गई। इसलिए, अब तक, मैं थोड़ा कम चिंतित हूं क्योंकि मेरे पास नौकरी है।" उन्होंने राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड-19 के बारे में प्रचलित लांछन की भी बात की। उन्होंने कहा, "हमारे गांव में इस बीमारी को लेकर कई भ्रांतियां हैं। पड़ोसी हमसे बात करने से बचते हैं। रिश्तेदार बिछड़ गए हैं। यह निराशाजनक है लेकिन मैं अपने बेटे को देखती हूं और फिर से काम करना शुरू कर दूंगी।" 

कोविड के कारण विधवा हुई महिलाओं को रोज़गार, खाद्य सुरक्षा योजना लागू करने और अपने बच्चों की परवरिश के लिए सरकारी मदद की ज़रूरत है। साथ ही, महिलाओं के लिए यह सुनिश्चित किया जाए कि वे स्पष्ट रूप से अपनी मातृ और वैवाहिक संपत्तियों पर सभी अधिकार प्राप्त करे सकें। असम, ओडिशा, बिहार और राजस्थान सहित कुछ राज्य सरकारों ने विधवाओं के लिए वित्तीय मदद की घोषणा की है। केंद्र और अन्य राज्य सरकारों को भी इस तरह के ठोस फ़ैसले लेने की ज़रूरत है। हालाँकि, कोविड विधवाओं को न केवल सरकारी लाभ दिया जाना चाहिए, बल्कि उन्हें मातृक और वैवाहिक परिवारों से संपत्ति का हिस्सा भी मिलना चाहिए। साथ ही इन महिलाओं को रोज़गार के अवसर उपलब्ध कराने की भी ज़रूरत है।

हमारे देश में, ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में महिलाओं के लिए शिक्षा की कमी, रूढ़िवादी सोच का असर, नज़रअंदाज़ी, लिंगभेद और पितृसत्तात्मक संस्कृति बहुत ज़्यादा है। इसलिए समाज में महिलाओं के मुद्दे और कोविड विधवाओं के मुद्दे परेशान करने वाले हैं। एक विधवा जो लड़ाई इस पितृसत्तात्मक समाज से लड़ती है, वह महामारी के दौरान और भी परेशान करने वाली है।

इस बीच, इन महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। साथ ही उनके बच्चों की परेशानी, उनके आर्थिक, सामाजिक, भावनात्मक मुद्दे और यौन शोषण से उनकी ज़िंदगी पर काफ़ी प्रभाव पड़ रहा है। महिलाओं का उनके मातृक और पैतृक परिवारों में मज़ाक़ उड़ाया जाना, संपत्ति और भूमि अधिकार छीन लेना, बच्चों से अलग रहने पर मजबूर करने, दुख भरा बुढ़ापा गुज़ारना, यह सब कोविड की वजह से और बढ़ गया है।

यहाँ महिलाओं के जिन मुद्दों को रखा गया है, उनसे यही ज़ाहिर होता है कि ज़्यादातर महिलाएं अपने घरों में ही सुरक्षित नहीं हैं। महाराष्ट्र राज्य सरकार को सिंगल विमेंस पॉलिसी का प्रारंभिक ड्राफ़्ट जमा किये हुए 2 साल बीत चुके हैं। सिंगल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए इसे लागू करना अब और ज़रूरी हो गया है।

नोट : इस लेख में महिलाओं की पहचान सुरक्षित रखने के लिए उनके नाम बदल दिए गए हैं।

(लेखिका कमेटी ऑन सिंगल विमेंस पॉलिसी की राज्य समन्वयक हैं।)

इस लेख को मूल अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक पर क्लिक करें।

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