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यह कहना छलावा है कि जब सरकारी कंपनियां बुरे हालत से गुज़रती हैं तो करदाताओं का पैसा डूबता है!

प्राइवेटाइजेशन के समर्थकों का तर्क होता है कि जब सरकारी कंपनियां डूबती हैं तो करदाताओं का पैसा डूबता है। जबकि असलियत यह है कि जब प्राइवेट कंपनियां डूबती हैं तो करदाताओं के साथ बैंक में रखें आम लोगों का पैसा भी डूबता है।
Public and Private
प्रतीकात्मक तस्वीर।

सरकार के समर्थकों के जरिए यह तर्क दिया जाता है कि पब्लिक सेक्टर यूनिट यानी कि सार्वजनिक कंपनियां बहुत अधिक घाटे में चल रही है। इन घाटों की भरपाई करदाताओं के पैसों से किया जाता है। इसलिए इनका निजीकरण कर देना चाहिए।

यह ऐसा तर्क है जिसका इस्तेमाल निजीकरण के समर्थक लोग खूब करते हैं। अपने मकसद को जायज बताने के लिए तर्क रखना चाहिए। लेकिन तोड़ मरोड़ कर नहीं। आधा अधूरा नहीं। ऐसा नहीं जो पहली मर्तबा तो ठीक लगे लेकिन अगर पूरे संदर्भ में सोचा जाए तो गलत लगे।

लेबल लगाकर सच्चाई से दूर रखने का चलन हमारे समाज में बहुत अधिक है। मुख्यधारा की बहस में हमेशा यह लेबल लगा दी जाती है कि सरकारी कंपनियां घाटे में चलती हैं। उन्हें बेच देना चाहिए। जिसका आम लोगों के बीच निष्कर्ष यह निकलता है की मुनाफा कमाने की काबिलियत केवल प्राइवेट कंपनियों के पास होती है।

अगर इस लेबल को तोड़कर सच तक पहुंचने की कोशिश की जाए तो इस तरह सोचना होगा कि प्राइवेट हो या पब्लिक कंपनी। दोनों जगह इंसान काम करते हैं। दोनों जगह कुशल कामगार सैलरी पर काम करते हैं। दोनों जगह मुनाफा और घाटे की संभावना बनती है। दोनों जगह बेहतर प्रबंधकीय कौशल अपनाकर लाभ की तरफ बढ़ा जा सकता है और नुकसान को कम किया जा सकता है। अंतर केवल इतना होता है कि जब सरकार के हाथ में कंपनी होती है तो वह उन कायदे कानूनों का उल्लंघन नहीं कर सकती जो जनकल्याण से जुड़ी हुई होती हैं। जैसे लेबर लॉ को अपनाना, कंपनी में काम कर रहे सभी कामगारों को गरिमा पूर्ण सैलरी देना। जबकि निजी करण में मुनाफे की चिंता अधिक होती है। इसलिए ना न्यूनतम सैलरी पर ध्यान दिया जाता है। न सामाजिक न्याय से जुड़े आरक्षण जैसे औजारों का इस्तेमाल किया जाता है। न लेबर लॉ को तवज्जो दी जाती है। मकसद केवल मुनाफा कमाना होता है। ऐसे में कंपनी में शीर्ष पदों पर मौजूद कुछ लोगों के सिवाय सब के शोषण की संभावना बनती है।

यानी अगर आंकड़े कुछ न भी कहे फिर भी पूरे संदर्भ में अगर यह सारी बातें रखी जाए तो कोई भी समझदार इंसान सरकारी कंपनी में काम करना पसंद करेगा। या ऐसी व्यवस्था में काम करना पसंद करेगा जहां काम करने वाले लोगों के हक न मारे जाएं। और काम ऐसा किया जाए जिसकी जरूरत समाज को हो।

इस संदर्भ के बाद अब सरकार के समर्थकों द्वारा सरकारी कंपनियों को बेचे जाने के लिए दिए जाने वाले इस तर्क को देखते हैं कि सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही है। 

इसमें कोई दो राय नहीं कि एक कंपनी होने के नाते घाटा और मुनाफा सहना पड़ सकता है। इसलिए कंपनी को खारिज करने के लिए यह तर्क देना ही गलत है। असल तर्क यह होना चाहिए कि अगर एक कंपनी घाटे में है तो वह व्यवस्थाएं अपनाई जाए ताकि वह घाटे की स्थिति से बाहर निकल पाए। क्योंकि कंपनी के तहत बनने वाली संरचना में ही सबको काम करना होगा। भले कंपनी का मालिकाना हक सरकार के पास हो या किसी प्राइवेट व्यक्ति के पास। 

इस आधारभूत समझ के बाद अगर आंकड़े देखे जाएं तो तथ्य है कि संसद के पटल पर पेश हुई कैग रिपोर्ट के मुताबिक 100 सरकारी कंपनियों और निगमों ने 2018-19 के दौरान कुल 71,857 करोड़ रुपये के लाभांश की घोषणा की है।

इसमें से केंद्र सरकार को 36,709 करोड़ रुपये का लाभांश मिला। यह सभी सरकारी कंपनियों और निगमों में किये गये भारत सरकार के 4,00,909 करोड़ रुपये के कुल निवेश पर 9.16 फ़ीसदी प्रतिफल के बराबर है।

कहने का मतलब यह है अगर यह राय बनाकर पेश की जाती है कि सरकारी कंपनियां घाटे में चल रही है तो यह राय तथ्य के आधार पर पूरी तरह से गलत राय कहलाएगी। लेबल लगाकर सच खारिज करने की रणनीति कहलाएगी। जिसमें सरकार बहुत माहिर होती है।

अब बात करते हैं आयकर वाले तर्क पर। मौजूदा समय का यह चलन हो गया है किसान प्रोटेस्ट कर रहे हैं तो सरकार की तरफ से तर्क आता है कि टैक्स का पैसा बर्बाद हो रहा है। यूनिवर्सिटी में बच्चे प्रोटेस्ट कर रहे हैं तो मिडिल क्लास की तरफ से तर्क आता है कि हमारे टैक्स का पैसा बर्बाद हो रहा है। ठीक इसी तरह से यह तर्क है कि सरकारी कंपनियां घाटे में जा रही है और इन घाटे की भरपाई लोगों के टैक्स के पैसे से की जा रही है। 

आयकर देने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। 31 मार्च 2020 को खत्म हुए वित्तीय वर्ष (2019-20) में कुल 5.95 करोड़ लोगों ने इनकम टैक्स फाइल किया था। लेकिन इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे थे जिन्होंने टैक्स के रूप में कोई रकम सरकार को नहीं दी थी। इनमें से सिर्फ 1/4 यानी करीब 1.46 करोड़ लोगों ने टैक्स के रूप में कोई रकम चुकाई थी।

यानी 135 करोड़ की आबादी में महज डेढ़ करोड़ से भी कम लोग इनकम टैक्स देते हैं। पिछले 5 साल का औसत निकाल कर देखा गया तो पता चला कि केंद्र सरकार के कुल खर्चे का महज 13 फ़ीसदी हिस्सा इनकम टैक्स से आता है। यानी कि सरकार अपने खर्चे के लिए इनकम टैक्स के अलावा दूसरे तरह के टैक्स पर निर्भर है। वैसे टैक्स जिसका भुगतान मजदूरी करके रोटी का जुगाड़ करने वाले से लेकर बहुत मोटी तनख्वाह पर काम करने वाले सरकारी कर्मचारी सब करते हैं।

इन सबके बावजूद अगर टैक्स वाले  तर्क को सही तरीके से पेश किया जाए तो तर्क ऐसा होगा कि चूंकि सरकार को टैक्स का भुगतान सभी करते हैं इसलिए सरकार की तरफ से ऐसे कदम उठाने चाहिए जिसका फायदा सबको मिले। यानी यूनिवर्सिटी में शिक्षा सस्ती हो। सस्ते में इलाज हो। ताकि गरीब से गरीब इंसान भी अपनी जिंदगी में सरकार की अहमियत समझ पाए।

अर्थशास्त्री देवेंद्र शर्मा लिखते हैं कि जब प्राइवेट सेक्टर बुरी हालत से गुजरता है तब भी करदाताओं का पैसा ही डूबता है। साल 2014 के बाद अब तक तकरीबन 8 लाख करोड रुपए का डूबा हुआ कर्जा बैंक अकाउंट से हटाया जा चुका है। रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का अनुमान है कि आने वाले समय में यह दोगुना हो सकता है। बहुत सारे आर्थिक विश्लेषक तो यहां तक कहते हैं कि बैंकों का बहुत अधिक कर्जा डूबा है। बैंक सही आंकड़े नहीं दे रहे हैं। इस बार के बजट में इन सब पर पर्दा डालने के लिए बैड बैंक बनाने का एलान भी किया जा चुका है।

देवेंद्र शर्मा इस पूरी प्रक्रिया को एक लाइन में लिखते हैं कि "वी हेव सोसिलिज्म फॉर कॉरपोरेट एंड कैपटिलजम फॉर फार्मर” मतलब कि हमारी सरकार ने कारपोरेट घराने के लिए समाजवाद और किसानों के लिए पूंजीवाद अपनाया हुआ है।

वित्तीय वर्ष 2009-10 में कुल टैक्स रेवेन्यू का करीब 40% कॉर्पोरेशन टैक्स से आता था। वित्तीय वर्ष 2021-22 में इसके घटकर कुल टैक्स रेवेन्यू का करीब 25% हो जाने का अनुमान है। इसकी बड़ी वजहों में से एक 2019 में सरकार की ओर से कॉर्पोरेट टैक्स में की गई भारी कटौती भी है। निजी कंपनियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार उन्हें टैक्स की भी छूट देती है। कहने का मतलब यह है कि एक करदाता के तौर पर निजी कंपनियों को जितना कर देना चाहिए सरकार उनसे उतना कर नहीं लेती है। उन्हें टैक्स की छूट देती है। लेकिन फिर भी वह बहुत बड़े घाटे में जाती हैं। आम जनता का बैंकों में जमा किया गया पैसा निजी कंपनियों में निवेश के तौर पर लगता है। सरकार, पूंजीपति और नौकरशाही की गठजोड़ की वजह से सारे तरह के नियमों को ताक पर रखकर पैसा निजी कंपनियों में लगता है। और अचानक से पता चलता है की विजय माल्या की कंपनी का दिवाला निकल गया। नीरव मोदी देश छोड़कर भाग गया। यस बैंक बर्बाद हो गया। लोगों का पैसा डूब गया।

प्रोफेसर प्रभात पटनायक तो यह साफ तर्क देते हैं कि जब पूंजी बैंक से ही लेनी है तो सरकार बैंक से पूंजी लेकर कंपनी क्यों न चलाएं। ऐसी स्थिति में अगर पैसा डूबता भी है तो सरकार की संप्रभुता की वजह से जनता को पैसा मिलने की पूरी संभावना रहती है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो सब प्राइवेट करने के लिए सरकार इसलिए उतारू नहीं है कि इससे वह हो पाएगा जो होना चाहिए। बल्कि इसलिए उतारू है ताकि पैसा कमाने वालों के पास पैसा कमाने का बड़ा जरिया हो और सरकार को चुनाव लड़ने और जीतने के लिए बड़ा पैसा मिल सके।

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