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एक चिट्ठी विकास जी के नाम

तिरछी नज़र: भई, विकास तो होगा ही, और भरपूर होगा। विकास जी की सरकार जो है। यह तो पहाड़ों की ही गलती है कि जब विकास होता है तो दरकने लगते हैं।
joshimath

आदरणीय श्री विकास जी,

जै राम जी की,

मुझे पता है कि आपको यह सम्बोधन पसंद नहीं है। आप तो 'जय श्री राम' सुनना चाहते हैं। 'जय श्री राम' के ही आदी हैं। परन्तु मैं क्या करूं। पता नहीं क्यों, मुझ शाकाहारी को तो वह बिल्कुल भी पसंद नहीं है। मुझे तो उसमें से तब हिंसा की बू आती है जब मैं देखता सुनता हूं कि लोग 'जय श्री राम' न बोलने पर पिटाई कर रहे हैं।

आगे समाचार यह है कि मैं सोचता हूं कि आप देश के इतने विकास में जुटे हैं कि देश को आप पर फख्र होता है। अब देश ने इतनी प्रगति कर ली है कि देश में कोई भी काम हो, कोई भी बात हो, हजारों करोड़ या लाखों करोड़ रुपए में ही होती है। आप बस ऐसे ही, इतने रुपयों में ही धन दौलत बांटते हैं। अजी बांटते क्या हैं, लुटाते हैं। जब से आप आए हैं, हजारों करोड़, लाखों करोड़ रुपए से कम का कोई प्रोजेक्ट ही नहीं होता है। 

अजी साहब, प्रोजेक्ट की बात तो छोड़ो, आपके नेतृत्व में इतना विकास हो गया है कि जो देश का पैसे लेकर भागते हैं, देश छोड़ते हैं, वह पैसा भी हजारों करोड़ में होता है। और जो ऋण माफ किया जाता है, जो ऋण बट्टे खाते में डाला जाता है, वह लाखों करोड़ में होता है। इससे कम कर्ज वालों को न तो भागने दिया जाता है और न ही उनका ऋण बट्टे खाते में डाला जाता है, माफ किया जाता है। इससे कम ऋण वाले लोग देश के विकास में बाधक हैं। वे तो देश का नाम डुबो रहे होते हैं। इसलिए बैंक उन पर पिल पड़ते हैं। 

आदरणीय, आपके सफल नेतृत्व में देश में इतनी समृद्धि छा गई है कि दो चार करोड़ तो सड़कों के गड्ढों में ही पड़े रहते हैं। मतलब दो चार करोड़ खर्च हो जाते हैं और सड़कों के गड्ढे वैसे के वैसे ही पड़े रहते हैं। आपके नेतृत्व में नारियल तक इतने मजबूत हो गए हैं कि नई नवेली बनी सड़क तक को तोड़ डालते हैं, उद्धघाटन के दिन ही उस पर गड्ढा कर देते हैं।  

देश इतना अमीर हो चुका है कि सरकार ऐसे किसी काम के लिए, जो ठेकेदार किसी और से दस बारह लाख में ही करवा देता है, ठेकेदार को दो करोड़ रुपए दे देती है। और सड़क बनाने का खर्च भी बढ़ कर सौ करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर तक पहुंच गया है। सरकार इसीलिए सबसे ज्यादा ध्यान, ऑफकोर्स मंदिर बनाने के काम के बाद, सड़क निर्माण पर दे रही है। 

मान्यवर, मैं आपकी नीति का कायल हूं। एक बार में दो दो लोगों का विकास करने की नीति का। ठीक ही तो है, एक साथ सबका विकास करने लगे तो हो गया विकास। लेकिन मान्यवर, दस वर्ष होने को आ रहे हैं आप उन्हीं दो का विकास करते जा रहे हैं। अब आप किन्हीं और दो को पकड़िए, विकास करने के लिए। उनका तो बहुत विकास हो गया। दस दस वर्ष तक सिर्फ दो ही लोगों का विकास करते रहेंगे तो एक सौ चालीस करोड़ लोगों का विकास करने में तो अरबों खरबों वर्ष लग जाएंगे। मान्यवर, आप लम्बी उम्र पाएं, हजारों वर्ष जिएं। ताउम्र सरकार जी बने रहें और विकास करते रहें। पर आपके अरबों खरबों वर्ष तक जीने की कामना करना तो प्रकृति के साथ अन्याय की बात ही होगी ना।

श्रीमन, जब प्रकृति के साथ अन्याय की बात उठी है तो बहुत से लोग तो विकास को ही प्रकृति के साथ अन्याय मानते हैं। ये ओछे लोग यह मानते हैं कि विकास विनाश है। कुछ भाषा शास्त्री भी यही बताते हैं कि दोनों की मात्राएं समान हैं, दोनों से एक ही प्रकार की ध्वनि निकलती है। जोशीमठ का उदाहरण दे कर भी लोग यही बता रहे हैं। कह रहे हैं कि वहां हो रहे 'विकास' ने ही उसे विनाश तक पहुंचाया है। ये लोग समझते नहीं हैं। कह रहे हैं पहाड़ चौपट होते जा रहे हैं। लोग इस तरह के विकास को विनाश ही बता रहे हैं। आपके सरकार जी बनने से पहले भी बता रहे थे और अब भी बता रहे हैं।

सर जी, आप इन लोगों की बात मत सुनिए। आप तो विकास करते रहिए। पहाड़ों का विकास कीजिए, जंगलों का विकास कीजिए। पहाड़ों पर छह छह लेन की, आठ आठ लेन की चौड़ी चौड़ी सड़कें बनवाईये। इससे हम प्लेन के लोगों को वहां यात्रा करने में आसानी होती है। हमें पतली संकरी घुमावदार सड़कों की आदत नहीं है। जी मिचलाने लगता है और कभी कभी तो उल्टी भी आ जाती है। इसके अलावा वहां बड़ी बड़ी परियोजनाएं भी लगाईये। उनसे हमें बिजली मिलती है। हमारे घरों के एसी उसी से चलते हैं। और अब तो हमारी इलैक्ट्रिक कारें भी उसी से चार्ज होगी। हमारे शहरों का पर्यावरण ठीक होगा। जंगलों का, पहाड़ों का पर्यावरण बिगड़ेगा तो बिगड़े, हमें क्या? 

अब जोशीमठ की ही बात लो। लोग वहां बसे ही क्यों। ठीक है, हजार, डेढ़ हजार साल पहले बसे थे पर क्या उन्हें पता नहीं था कि जब विकास होगा तो विनाश होगा। अगर उन्हें नहीं पता था कि ऐसा और इतना विकास होगा तो उनकी ही गलती है। भई, विकास तो होगा ही, और भरपूर होगा। विकास जी की सरकार जो है। यह तो पहाड़ों की ही गलती है कि जब विकास होता है तो दरकने लगते हैं। और जंगलों की भी गलती है कि जब वहां विकास होता है तो कटने लगते हैं। इसमें सरकारों की क्या ग़लती। विकास करने वालों की क्या ग़लती, उन्हें तो विकास करना है, अंधाधुंध करना है।

पहाड़ों की तो बन आई है। करोड़ों वर्ष हो गए हैं बने हुए। क्या पहले किसी ने विकास करने की सोची थी। जो भी कुछ विकास हो रहा है पिछले पचास साठ वर्षों में ही हुआ है और अब पिछले आठ नौ वर्ष में तो और भी अधिक हुआ है। हमारे पूर्वजों ने क्या किया? रहने चले गए। चलने फिरने के लिए पगडंडियां बना लीं। दो चार मंदिर बना लिए। अब हो रहा है असली विकास। लेकिन पहाड़ इसे सहने के लिए तैयार ही नहीं हैं।

विकास जी, आप तो सारे पहाड़ों को प्लेन ही बना दीजिए। ऐसे ही सारे जंगलों को भी कटवा डालिए। वहां भी बड़ी बड़ी इंडस्ट्री लगाइए। पहाड़ और जंगल, सबका विकास कीजिए। जो ऐसे विकास को विनाश कहते हैं उनकी मत सुनिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक देश विकास में डूबा हो, न कहीं पहाड़ हों और न ही कहीं जंगल, तो देश कितना अच्छा लगेगा, कितना विकसित लगेगा। हमारी कार भी सारे में सौ, सवा सौ की स्पीड से दौड़ेगी और आपकी वंदे भारत ट्रेन भी। 

आपका अपना,

एक आम नागरिक

(लेखक पेशे से चिकित्सक हैं।)

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