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यूपीः हलाल प्रमाणन प्रतिबंध, मंशा क्या है?

उत्तर प्रदेश सरकार का ये फ़ैसला धार्मिक असहिष्णुता से प्रेरित तो है ही बल्कि व्यवसाय पर इसका ख़राब असर पड़ सकता है। अगर आप इसे सिर्फ़ मुसलमानों तक ही सीमित करके देख रहे हैं, तो आप ग़लत हैं।
Halal
फ़ोटो साभार : रॉयटर्स

उत्तर प्रदेश सरकार ने 18 नंबवर 2023 को उत्तर प्रदेश राज्य की सीमा में हलाल सर्टिफाइड उत्पादों की बिक्री, भंडारण और वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि जो उत्पाद निर्यात किए जाते हैं, उन पर ये प्रतिबंध लागू नहीं होगा। सरकार का कहना है कि ये उत्पादों के प्रमाणन की एक समांतार व्यवस्था है और भ्रम की स्थिति पैदा करती है। लेकिन क्या इसमें कोई सच्चाई है या फिर ये निर्णय सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और इस्लामोफोबिया से प्रेरित है?

आइये, पड़ताल करते हैं। सबसे पहले समझते हैं कि हलाल और हलाल प्रमाणन क्या है, कैसे काम करता है और क्यों जरूरी है?

हलाल प्रमाणन क्या है?

हलाल के बारे में ये गलत धारणा है कि ये सिर्फ मांस तक ही सीमित है। जबकि सच्चाई ये है कि मांस मात्र एक उत्पाद है, इसके दायरे में रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले बहुत सारे उत्पाद आते हैं। जैसे मेडिसन, कॉस्मैटिक्स, फूड ऑयल, शक्कर, कॉफी, बेकरी प्रोडक्ट, डेयरी उत्पाद आदि।

आसान शब्दों में, हलाल का अर्थ है “जायज” यानी इस्लाम में जिसकी अनुमति है और हराम का अर्थ है जिसकी अनुमति नहीं है। इसलिये ये सुनिश्चित करने के लिए कि उत्पाद में इस तरह के किसी पदार्थ की मिलावट नहीं है जो हराम है और उसे बनाने की विधि भी जायज है, हलाल प्रामणन की आवश्यकता पड़ती है। यानी उत्पाद हलाल सर्टीफाइड है या नहीं, ये देखकर ग्राहक फैसला कर सकता है कि उसे इस उत्पाद का इस्तेमाल करना है या नहीं।

उदाहरण के तौर पर सूअर के मांस और उत्पादों को इस्लाम में हराम माना गया है यानी उसके इस्तेमाल की अनुमति नहीं है। जबकि बहुत सारे ऐसे उत्पाद हैं जिन्हें बनाने में सूअर की चर्बी का इस्तेमाल किया जाता है। इस प्रकार अगर उत्पाद हलाल सर्टिफाइड है तो एक तरह की गारंटी है कि इसमें सूअर की चर्बी का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

भारत में हलाल सर्टिफिकेशन को लेकर कोई सरकारी व्यवस्था नहीं है, लेकिन बहुत सारे देशों में सरकार खुद हलाल सर्टिफिकेशन का प्रबंध करती है। भारत में ये काम अलग-अलग संस्थाओं के द्वारा किया जाता है, जो हलाल सर्टिफिकेशन के ग्लोबल स्टंडर्ड के मुताबिक काम करती है। ये संस्थाएं कंपनियों का निरीक्षण करती हैं, पदार्थों की गुणवत्ता और मिलावट की जांच करती है और स्टाफ की ट्रेनिंग का भी प्रबंध करती है। ये देखती है कि उत्पाद हाइजीनिक हो और नॉन-टॉक्सिक हो। ये संस्थाएं भारत सरकार के नियमों के हिसाब से काम करती हैं।

प्रतिबंध के पक्ष में सरकार का तर्क

17 नवंबर, 2023 को शैलेंद्र कुमार शर्मा नाम के एक व्यक्ति के द्वारा हलाल प्रमाणन जारी करने वाली तीन संस्थाओं के खिलाफ लखनऊ में एफआइआर दर्ज कराई गई। एफआईआर में हलाल प्रमाणन जारी करने वाली संस्थाओं पर आरोप लगाया कि ये संस्थाएं मानकों का पालन नहीं कर रही हैं, धार्मिक भावनाओं का दोहन कर रही हैं और आतंकी गतिविधियों को फंडिंग कर रही है। इसके अगले ही दिन पूरी सरकार हरकत में आ गई। हलाल को यूपी की सीमा में प्रतिबंधित कर दिया गया।

हम जानते हैं कि कितने ही गंभीर मामलों में पुलिस एफ़आईआर तक दर्ज नहीं करती या कितने ही मामलों में पीड़ित थाने में मामला दर्ज तो कराते हैं लेकिन कार्रवाई होने में महीनों निकल जाते हैं, न्याय मिलना तो दूर की बात है। लेकिन इस मामले में यूपी सरकार ने एक दिन बाद ही त्वरित कार्रवाई शुरु कर दी। धड़ाधड़ छापेमारी होने लगी। ऐसा लग रहा है कि सरकार बस एफ़आईआर का इंतजार ही कर रही थी या एफ़आईआर कराने की व्यवस्था कर रही थी।

एक बात यह भी सोचने वाली है कि अगर हमारे देश में सरकारी तौर पर हलाल सर्टिफिकेशन की व्यवस्था नहीं है तो इसका उपाय यह नहीं है कि हलाल सर्टिफिकेशन वाले उत्पादों को ही बैन कर दिया जाए, बल्कि इसके लिए नियम-क़ायदे बनाने की ज़रूरत है।

हलाल सर्टिफिकेशन क्यों ज़रूरी है?

सबसे पहली बात तो ये है कि उपभोक्ता को ये पता होना चाहिए कि वो जिस उत्पाद को खरीदना चाहता है उस उत्पाद में क्या-क्या है और किस तरह बनाया गया है? आपने गौर किया होगा कि बहुत सारे खाद्य पदार्थों के पैकेट पर हरे या लाल रंग की एक बिंदी बनी होती है। हरे रंग की बिंदी का अर्थ होता है कि उत्पाद शाकाहारी है और लाल रंग की बिंदी का अर्थ होता है कि उत्पाद मांसाहारी है। भारत में अलग-अलग फूड कल्चर और मान्यताओं के लोग रहते हैं, इसलिए उत्पाद के बारे में इस तरह की जानकारियां होना जरूरी है। ताकि आप फैसला कर पाएं कि आपको इस उत्पाद का इस्तेमाल करना है या नहीं? अन्यथा आपको धोखा हो सकता है, अगर गलती से शाकाहारी व्यक्ति मांसाहारी उत्पाद खाले, तो इसका मन पर सदमा लगता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। यानी हर उत्पाद पर इस तरह की ज्यादा से ज्यादा जानकारियां होनी चाहिए कि सभी धर्मों, मान्यताओं और फूड कल्चर के लोग पहले से ही उस उत्पाद के बारे में जान पाएं। इसे सिर्फ इस्लाम तक ही सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि किसी भी धर्म या समुदाय के साथ ऐसी स्थिति हो सकती है।

भारत विविधताओं से भरपूर देश है, तो ऐसा भी हो सकता है कि अलग-अलग समुदायों की मान्यताओं में विरोधाभास हो। इसलिये उत्पादों के बारे में सभी जानकारियां पहले से ही होनी चाहिए और प्रमाणन की व्यवस्था होनी चाहिए।

क्या फ़ैसला सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से प्रेरित?

उत्तर प्रदेश सरकार का ये फैसला धार्मिक असहिष्णुता से प्रेरित तो है ही बल्कि व्यवसाय पर इसका खराब असर पड़ सकता है। अगर आप इसे सिर्फ मुसलमानों तक ही सीमित करके देख रहे हैं, तो आप गलत हैं। अडानी समूह, रिलायंस, टाटा से लेकर हिमालय आदि तक के उत्पादों को हलाल सर्टिफिकेशन की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि विदेशों में हलाल सर्टिफाइड उत्पादों की मांग काफी ज्यादा है और ऐसा नहीं है कि सिर्फ मुसलमान ही हलाल सर्टिफाइड उत्पादों का प्रयोग करते हैं। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार ने अभी निर्यातित उत्पादों पर हलाल सर्टिफिकेशन पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। तो फिर उत्तर प्रदेश की जनता के साथ ये दोगला व्यवहार क्यों? जबकि मुस्लिम आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश पहले सात राज्यों में शुमार होता है। मुस्लिम आबादी के लिहाज से उत्तर प्रदेश छठे नंबर पर है और उत्तर प्रदेश की 19% आबादी मुस्लिम है। यानी अब ये 19% आबादी जरूरत का सामन कहां से खरीदेगी? क्योंकि उत्तर प्रदेश में तो अधिकारी दुकानों और शॉपिंग माल पर छापे मारने लगे हैं और कार्रवाई करने लगे हैं। क्या उत्तर प्रदेश के मेनुफैक्चरर्स औऱ व्यवसायी इस फैसले से प्रभावित नहीं होंगे? उत्तर प्रदेश में हलाल प्रमाणन पर प्रतिबंध एक गलत फैसला है। ऐसा लगता है कि योगी सरकार का ये फैसला सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और इस्लामोफोबिया से प्रेरित है। ऐसा ही एक क़दम सरकार द्वारा ध्वनि प्रदूषण के नाम पर धार्मिक स्थलों से लाउडस्पीकर हटाने को लेकर एक बार फिर उठाया गया है, जिसमें अभी तक की ख़बरों के मुताबिक सबसे ज़्यादा मस्जिदों को ही निशाना बनाया गया है।

कुल मिलाकर एक बार फिर यूपी में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल खेला जा रहा है। समझा जा सकता है कि भाजपा चुनाव प्रचार में इसका इस्तेमाल करेगी और राजनीतिक माइलेज लेने की कोशिश रहेगी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं ट्रेनर हैं। आप सरकारी योजनाओं से संबंधित दावों और वायरल संदेशों की पड़ताल भी करते हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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