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उदयपुर: जरूरत आत्मावलोकन की है, भड़कावे की नहीं

ऐसे समय में जब आवश्यकता आत्मावलोकन की है, उन्माद की आग पर छींटे मारने की है, तब इसे भड़काने की कोशिशें की जा रही हैं।  इसके खिलाफ सिर्फ सजग रहना ही काफी नहीं है - सजग बनाये रखना भी जरूरी है। 
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'प्रतीकात्मक फ़ोटो'

उदयपुर के बाद अमरावती में हुई कथित नफरती हत्या हालाँकि अभी पैसे की उधारी और लेनदेन के विवाद सहित कई पहलू जांच के दायरे में हैं लेकिन उसके अभियुक्त की वहाँ की सांसद नवनीत राणा और उनके विधायक पति रवि राणा के साथ रिश्ते उजागर हो गए हैं। ये राणा दंपत्ति वे ही हैं जिन्होंने शिवसेना प्रमुख के निवास मातोश्री पर जाकर हनुमान चालीसा पढ़ने की घोषणा की थी और उसके जरिये उन्माद का तूमार खड़ा करना चाहा था।

अखबारों ने तस्वीरें छापकर बताया है कि अमरावती के दवा व्यापारी उमेश कोल्हे की हत्या का अभियुक्त शेख इरफ़ान 2019 के लोकसभा चुनाव में इन्हीं नवनीत राणा के लिए काम कर रहा था। राणा दंपत्ति के औपचारिक खण्डन के बाद जैसा कि ऐसे मामलों में इन दिनों रिवाज बन गया है, मामला महाराष्ट्र पुलिस से छीनकर एनआईए ने अपने हाथ में ले लिया है।  

इस जांच का नतीजा क्या होगा यह कहने की आवश्यकता नहीं है?  बहरहाल यह रिश्तेदारी नयी नहीं है। इसके पहले उदयपुर के कन्हैयालाल की बर्बरतापूर्वक हत्या के खुद वीडियो बनाने वाले अपराधियों के भाजपा कनेक्शन पहले ही सार्वजनिक हो चुके हैं। बजाय किसी गंभीर आत्मावलोकन के इन वारदातों को आधार बनाकर भाजपा और उसके सरपरस्त संघ परिवार ने साम्प्रदायिकता की नफरती मुहिम को और तेज करने का काम शुरू कर दिया है।  

दिल्ली में विश्व हिन्दू परिषद और एबीवीपी ने उदयपुर और अमरावती हत्याकांड के विरोध में मंडी हाउस से जंतर मंतर तक यात्रा निकाली। मजेदार बात यह है कि तजिंदर पाल सिंह बग्गा और कपिल मिश्रा जैसे ख्यात नफरती नेताओं की भागीदारी वाले इस प्रदर्शन को "संविधान संकल्प मार्च" का नाम दिया गया।

'देश संविधान से चलेगा, शरीयत या जिहाद से नहीं' का नारा बुलंद किया गया। इसी के साथ  "हिंदुओं को निशाना बनाने वाले बख्शे नहीं जाएंगे" जैसी हुंकार भरी  हाहाकारी घोषणाएं भी की गयीं।  राजस्थान के चूरू शहर में हुआ विहिप का ऐसा ही विरोध प्रदर्शन कहने को मौन तथा सांकेतिक था लेकिन इस दौरान "संत समाज" की अगुवाई में सामूहिक हनुमान चालीसा का पाठ करने के साथ-साथ "देश में गृह युद्ध जैसी स्थिति बन जाने" की चेतावनी भी दे दी गयी।

हरियाणा की विहिप इनके आवाहनों को और ज्यादा ठोस रूप देने की दिशा में आगे बढ़ी।  उसने "हथियार हासिल करने में मदद देने" का भी एलान कर दिया। हिन्दुओं के लिए हेल्पलाइन के नम्बर भी जारी कर दिए।यह सब स्थानीय स्तर पर की जा रही फुटकर पहलकदमियां नहीं हैं।यह एक बड़े थोक प्रोजेक्ट का हिस्सा है ; यह बात इन्ही के बीच झुंझनू में हुई आरएसएस की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रांत प्रचारक बैठक के बाद संघ के प्रवक्ता की प्रेसवार्ता से साफ़ हो गया।

इस पत्रकार वार्ता में संघ प्रवक्ता सुनील आंबेकर ने " उदयपुर घटना की निंदा"  करते हुए माना कि  "ऐसी घटनाएं न समाज हित में हैं और न ही देशहित में हैं" लेकिन इसी सांस में बाद जिम्मेदारी का सारा ठीकरा मुसलमानों और बुद्धिजीवियों पर रख दिया। यह मानते हुए कि "कुछ मुसलमान संगठनो तथा बुद्धिजीवियों ने इसकी निंदा की है" आरएसएस प्रवक्ता ने "मुसलमानों को भी इसकी मजम्मत करनी चाहिए कि सारे मुस्लिम समाज को सामने आकर इसका विरोध करना चाहिए"  जैसी  मांग उठाते हुए यह संकेत देने की कोशिश कि जैसे कोई ऐसा भी है जिसने उदयपुर काण्ड या ऐसी जघन्यता का समर्थन किया हो, उसे सही बताया हो।

वक्तव्यों में इस तरह की गुंजाइशें छोड़कर अल्पसंख्यक समुदाय और असहमत भारतीयों को निशाना बनाये रखना संघ की कार्यशैली का ख़ास हिस्सा है। यह "करें गली में क़त्ल बैठ चौराहे पर रोयें" सिंड्रोम है, जिसमें इस कुटुंब को पूरी महारत हासिल है। जबकि ठीक इससे उलट काम खुद यही  ब्रिगेड लगातार तेज से तेजतर किये जा रही है।  

एक तरफ भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा को प्रवक्ता पद से हटाने के एलान और "सभी धर्मों की समानता और आदर" के बयान जारी कर रही है, वहीँ दूसरी तरफ उसका पूरा गिरोह और आईटी सैल नूपुर की महानता को बताने और उसके साथ हुए "अन्याय" को गिनाने में लगा है। अब इस काम में कुछ बड़े और मझोले भाजपा नेता भी जुट गए हैं।  इतना ही नहीं  इस बीच कभी इस या उस पोस्टर या किसी छुटभैय्ये के बेतुके बयान के बहाने  नफरत की हांडी के नीचे की आंच तेज बनाये रखी जा रही है।

नीयत क्या है यह इनकी एक दूसरे की संगति में जारी हरकतों से पता चल जाता है।  एक तरफ संविधान संकल्प मार्च हो रहा है, जनतांत्रिक तरीके से विरोध के बोलवचन बोले जा रहे हैं दूसरी तरफ संविधान सम्मत रास्तों , क़ानून के राज को बहाल कर उसे पुख्ता करने, सरकारी तंत्र और क़ानून व्यवस्था के  विधिसम्मत उपायों को उठाने की बजाय उससे बाहर उग्रता की गिरोहबन्दी, उन्मादियों की  हथियारबन्दी के खुले आव्हान किये जा रहे हैं। इसे सिर्फ कुछ उतावले, उन्माद-एडिक्ट मनोरोगियों का प्रलाप बताकर खारिज या अनदेखा नहीं किया जा सकता। यह अत्यंत खतरनाक और उतना ही विनाशकारी प्रोजेक्ट है - राष्ट्र का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैनिकीकरण का संघी प्रोजेक्ट जिसे  खुद सरकार चलाने वाले सरकार के ही संरक्षण में लाने की कोशिश कर रहे हैं। दुनिया का इतिहास गवाह है कि  हिटलर और मुसोलिनी के "तूफानी दस्तों" से बरास्ते अलकायदा, आईएस से होते हुए बोको हरम तक इस तरह की मिसालें जब जब देखी गई हैं तब तब विनाश ही हुए हैं।

यह नया और हिंसक नैरेटिव नई भाषा और नए मुहावरे भी गढ़ रहा है - नए प्रतीकों और पुराने प्रतीक चिन्हों के नए रूपों की मांग कर रहा है।  अशोक के चार सिंहों वाले राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह के साथ की गयी फूहड़ता और उसे स्थापित करने के तरीके की घोर असंवैधानिकता इसी का ताजातरीन उदाहरण है।  इसलिए न विहिप के प्रदर्शन कोई अलग थलग कार्यवाही है ना हीं संघ के बयान सन्दर्भ से हटकर हैं।  उनकी पारस्परिक पूरकता है जो आने वाले दिनों की आशंकाओं के संकेत हैं।

ऐसे समय में जब आवश्यकता आत्मावलोकन की है, उन्माद की आग पर छींटे मारने की है, तब इसे भड़काने की कोशिशें की जा रही हैं।  इसके खिलाफ सिर्फ सजग रहना ही काफी नहीं है - सजग बनाये रखना भी जरूरी है। इसका निदान, आंकलन और विश्लेषण दर्ज करना पर्याप्त नहीं इसका समाधान और प्रत्याख्यान भी आवश्यक है।

(लेखक लोकजतन पत्रिका के संपादक हैं और अखिल भारतीय किसानसभा के संयुक्त सचिव हैं।)

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