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2024 और BSP: आकाश का आना और दानिश को निकाला जाना आख़िर क्या गुल खिलाएगा!

“अगर मायावती स्वयं बीएसपी के पतन को रोकने में सक्षम नहीं हैं, तो अनुभवहीन आकाश, जो ज़मीन के नेता भी नहीं हैं, के लिए यह एक कठिन चुनौती होगी।”
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ऐसे समय में जब बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, पार्टी अध्यक्ष मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना उत्तराधिकारी बनाया है। आकाश के नाम की घोषणा उस समय में हुई है जब बीएसपी ने पिछले एक दशक से अधिक से उत्तर प्रदेश में एक चुनाव भी नहीं जीता है। 

विदेश से पढ़ाई कर के भारत लौटे आनंद के लिए पार्टी को दोबारा “पूर्वरूप” में दोबारा लाना एक बड़ी चुनौती होगी। बीएसपी ने 2007 के बाद से कोई चुनाव नहीं जीता है। अगर चुनावी नतीजों पर नज़र डालें तो मायावती के नेतृत्व में 2012 से लगातार बीएसपी का वोट शेयर भी गिर रहा है और विधानसभा में सीटें घटती जा रही हैं। 

कहा जा रहा है कि 28 वर्षीय आकाश के लिए  कांशीराम द्वारा दलितों के उद्धार के लिए 1984 में स्थापित की गई राजनितिक पार्टी को संभालना आसन नहीं है। क्योंकि उनके पास ज़मीन पर काम करने और आंदोलनों में सह-भागिता का कोई अनुभव नहीं है। इसके अलावा आनंद के नाम की घोषणा के बाद से उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यामंत्री मायावती पर परिवार-वाद का आरोप भी लग रहा है। 

नोएडा में हुई शुरुआती शिक्षा के बाद, लंदन से “मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन” (एमबीए) की डिग्री लेकर लौटे आकाश को बीएसपी प्रमुख मायावती ने 10 दिसंबर को लखनऊ में अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। आकाश मायावती के भतीजे हैं और उनके भाई आनंद कुमार के बेटे हैं। इसी साल मार्च में मायावती ने उनकी शादी बहुत धूमधाम से अपनी  पार्टी के ही वरिष्ठ नेता अशोक सिद्धार्थ की बेटी प्रज्ञा सिद्धार्थ से कराई थी।

मायावती ने रविवार को पार्टी पदाधिकारियों की बैठक में औपचारिक रूप से आकाश के नाम का ऐलान किया। हालाँकि जिस तरह मायावती ने आकाश का पार्टी में प्रवेश कराया और उनको उनको आगे बढ़ाया, इससे यह चर्चा पहले ही शुरू हो गई थी कि वह ही बीएसपी सुप्रीमो के उत्तराधिकारी होंगे।

पूर्व मुख्यमंत्री ने अपनी  पार्टी पदाधिकारियों से कहा  कि वे आकाश के साथ मिलकर काम करें और उनके  अधिक से अधिक कार्यक्रम करवाएं। हालाँकि फ़िलहाल मायावती का यह निर्देश यूपी-उत्तराखंड के अलावा दूसरे राज्यों के पदाधिकारियों के लिए है।

आकाश पहली बार 2017 में सार्वजनिक मंचों पर नज़र आए थे जब उनको बीएसपी सुप्रीमो के साथ सहारनपुर में एक सभा के दौरान देखा गया था। जिसके बाद मायावती ने लखनऊ में एक बैठक के दौरान उनका परिचय कराया था। इसके बाद से आकाश का क़द बीएसपी में धीरे-धीरे बढ़ता गया और उनको 2020 में पार्टी का राष्ट्रीय “को-ऑर्डिनेटर” बनाया गया। आकाश को 2022 के विधानसभा चुनाव के लिए युवाओं को पार्टी से जोड़ने की ज़िम्मेदारी दी गई थी। 

हाल में हुए चार राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना के विधानसभा चुनाव का ज़िम्मा  मायावती ने आकाश को ही सौंपा था। उन्होंने मध्य प्रदेश और राजस्थान में कई सभाएं और पद यात्राएं कीं थी। राज्यों के विधानसभा चुनाव खत्म होते ही वह एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर बीएसपी संगठन को मज़बूत करने में जुट गए हैं। बीएसपी दावा करती है कि आकाश पहले भी राज्यों में संगठन को मज़बूत करने का काम कर रहे थे। 

हालंकि इन  राज्यों में आकाश का कोई ख़ास असर देखने को नहीं मिला। राजस्थान में बीएसपी ने 184 सीटों वाली विधानसभा में से केवल दो पर 1.82 प्रतिशत वोट शेयर के साथ जीत हासिल की, जबकि 2018 के चुनावों में, बीएसपी ने राज्य में छह सीटें जीतीं और 4.03 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। 

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना में, पार्टी एक भी सीट जीतने में विफल रही और यहां तक कि 2018 की तुलना में बहुत कम वोट मिले। मध्य प्रदेश में 2018 में दो सीटें जीतकर 5 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे। लेकिन इस बार बीएसपी को वहां केवल 3.40 वोट मिला है। बीएसपी को छत्तीसगढ़ में 2.05 प्रतिशत, तेलंगाना में 1.37 प्रतिशत वोट मिले, जो 2018 की तुलना में ख़राब प्रदर्शन है।

उत्तर प्रदेश में बीएसपी ने  2007 के विधानसभा चुनावों में 403 सीटों  में 206 सीटें जीतकर अपने दम पर सरकार बनाई थी। लेकिन अब विधानसभा चुनावों 2023 में उसके पास एक अकेला विधायक है। उस समय  2007 में बीएसपी को  30.43% वोट मिले, जबकि 2022 के विधानसभा चुनाव में उसे केवल 12.88% वोट मिले।

इसी आधार पर कहा जा रहा है कि आकाश की पारी की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब बीएसपी ने अपना लगभग 60% वोट शेयर खो दिया है। बीएसपी के कमज़ोर होने के कई कारण माने जाते हैं, जिसमें 2007 में मुख्यमंत्री बनने के बाद से अब तक, मायावती का ज़मीन पर सक्रिय न होना प्रमुख है। इसके अलावा कहा जाता है कि मायावती केवल सोशल मीडिया “एक्स” पूर्व में ट्विटर तक सिमित हो गई हैं, जिसके कारण बीएसपी के कार्यकर्ता का जुड़ाव पार्टी से टूट सा गया है।

माना जा रहा है कि मायावती का सत्तारूढ़ भारतीय जनता  पार्टी के प्रति नरम रवैया और उनका सत्तारूढ़ पार्टी की हिंदुत्ववादी, दलित विरोधी और जनविरोधी नीतियों की आलोचना से बचना, बीएसपी को महंगा पड़ा रहा  है। एक समय था जब बीएसपी को भाजपा और कांग्रेस के सामने एक “राष्ट्रीय विकल्प” माना जाने लगा था। लेकिन उत्तर प्रदेश के 2012 विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी से उसकी हार के बाद से बीएसपी समर्थन में तेज़ी से गिरावट देखी जा रही है।

हालाँकि इस सब के बीच  बीएसपी को सबसे बड़ा नुक़सान नरेंद्र  मोदी की राष्ट्रीय राजनीति में आने के बाद 2014 में हुआ है। आम चुनाव 2014 में उत्तर  प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में  बीएसपी को एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं हुई थी। जबकि लोकसभा चुनाव 2009 में उसने देश की  543 सीटों वाली संसद में 21 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिसमें 20 सीटें  केवल उत्तर प्रदेश  से जीती थीं।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि ग़ैर-जाटव दलित का झुकाव बीजेपी की तरफ बढ़ने ने मायावती को बड़ा नुकसान पहुचाया है।

मायावती ने आकाश के नाम की घोषणा उस वक़्त की है, जब बीएसपी के विरुद्ध अमरोहा से लोकसभा सांसद दानिश अली को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में निलंबित किये जाने को लेकर, मुसलमानों में नाराज़गी है।

दानिश अली के निलंबन के विशिष्ट कारण अभी भी उपलब्ध नहीं हैं। हालाँकि संसदीय आचार समिति की सिफारिशों के बाद, तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित सांसद महुआ मोइत्रा को समर्थन देने के ठीक एक दिन बाद दानिश अली  का निलंबन आया।

शुक्रवार, 8 दिसंबर को दानिश  अली ने मोइत्रा के निष्कासन के खिलाफ संसद के बाहर व्यक्तिगत विरोध प्रदर्शन किया था। उन्होंने अपने गले में एक तख्ती लटका रखी थी जिस पर लिखा था, "पीड़ित को अपराधी मत बनाओ"। उन्होंने मीडिया से कहा था कि “मैंने यह (पोस्टर) इसलिए लगाया है क्योंकि समिति ने अपनी सिफारिश में मेरा भी उल्लेख किया है… क्योंकि मैं उन्हें न्याय दिलाना चाहता हूं। उन्हें मौका नहीं दिया गया…”

बीएसपी की तरफ एक बयान आया था जिसमे कहा गया था, “आपको पार्टी की नीतियों, विचारधारा और अनुशासन के खिलाफ बयानों या कार्यों के खिलाफ कई बार चेतावनी दी गई थी। लेकिन, इसके बावजूद आप लगातार पार्टी के खिलाफ काम कर रहे हैं। इसी पत्र के आखिर में लिखा था, पार्टी ने आपको (दानिश अली) तत्काल प्रभाव से निलंबित करने का निर्णय लिया है।”

दानिश अली जो अक्सर मुस्लिम मुद्दों पर संसद में मुखर रहते हैं, उस समय भी सुर्ख़ियों में आए थे जब “दक्षिण दिल्ली” से भाजपा सांसद बिधूड़ी ने लोकसभा में बेहद अभद्र भाषा में उन्हें अपशब्द कहे थे। दानिश अली ने चंद्रयान 3 मिशन पर लोकसभा में बहस के दौरान बिधूड़ी द्वारा उनके संबंध में की गई टिप्पणियों पर कार्रवाई के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से संपर्क किया था। हालाँकि  अब  बिधूड़ी ने दानिश से इस मामले में मांफी मांग ली है।

आकश ने  इस वर्ष जयपुर में आज़ाद समाज पार्टी का नेतृत्व करने वाले चंद्रशेखर आज़ाद की तंज करते हुए उनका नाम लिए बिना उन्हें 'छोटे-मोटे लोग' कहा था । सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय की 13 दिवसीय संकल्प यात्रा के बाद एक सभा को संबोधित करते हुए आकाश ने कहा था, "बहुत से लोग नीले झंडे के साथ घूम रहे हैं, लेकिन “हाथी के निशान वाला” नीला झंडा ही एकमात्र है जो आपका (लोगों, बसपा समर्थकों) का है।"

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में पिछले दो विधानसभा और संसदीय चुनावों से स्पष्ट समर्थन आधार में गिरावट के बीच आकाश के सामने बीएसपी  को एक बार फिर से  फिर से मजबूती से स्थापित करना  चुनौतीपूर्ण काम होगा। माना जा रहा है कि बीएसपी  अब जातीय गठबंधन बनाने  की ताकत पिछले एक दशक में कमज़ोर पड़ गई है।

दलित अधिकारों के लिए सक्रिय रहने वाले श्रवण कुमार निराला कहते हैं कि बहनजी (मायावती) एक ऐसे आंदोलन से उभरीं जिसने दलितों को उनकी मतदान शक्ति के बारे में जागरुक किया था। अगर मायावती स्वयं बीएसपी के पतन को रोकने में सक्षम नहीं हैं, तो अनुभवहीन आकाश, जो ज़मीन के नेता भी नहीं हैं, के लिए यह  एक कठिन चुनौती होगी।

निराला मानते हैं कि आकाश जैसे राजनीतिक उत्तराधिकारियों के साथ समस्या यह है कि उनके मूल मतदाता आधार, (जैसे बीएसपी  के लिए दलित वोटर) का एक बड़ा हिस्सा उन्हें “अभिजात वर्ग” के रूप में सोचता और देखता है, जिससे राजनीति में अधिक ऊंचाई हासिल करना उनके लिए  मुश्किल हो जाता है। 

पूर्वी उत्तर प्रदेश के रहने वाले निराला का कहना है क्योंकि आकाश ने कभी ज़मीन पर काम नहीं किया है और किसी आन्दोलन में उपस्थित नहीं रहे हैं इस लिए यह कठिन है की वह दिल से “बहुजन आन्दोलन” से जुड़ सकेंगे या नहीं।

वह मानते हैं यह ज़रूरी नहीं है कि दलित समाज उनको (आकाश) को अपना नेता माने। हालाँकि निराला, आज़ाद समाज पार्टी के चंद्रशेखर को भी स्थापित दलित नेता नहीं मानते है। वह कहते हैं चंद्रशेखर दलित विरोधी घटनाओं पर तो मुखरता से बोलते हैं, लेकिन वह  आजतक दलित अधिकारों के लिए कोई आन्दोलन नहीं खड़ा कर सके हैं।

आखिर में उन्होंने कहा की दलितों में यह बात आम हो चली है कि बहनजी वही करती है जो बीजेपी कहती है, और सत्ता से सवाल करने के बदले, वह विपक्ष से सवाल करती हैं।

दलित चिन्तक रविकांत चन्दन कहते हैं कि आकाश ज़मीन से हुए जुड़े नहीं है  और कभी बीएसपी के मिशन का हिस्सा नहीं रहे हैं। वह कहते उनकी योग्यता केवल  इतनी है की वह मायावती के भतीजे हैं। प्रोफेसर चन्दन मानते हैं कि आकाश को राजनीति में लाने का यह कारण हो सकता है कि जो दलित युवा चंद्रशेखर के साथ जुड़ रहे हैं उसको वापस बीएसपी की तरफ लाया जा सके। क्योंकि मायावती मानती हैं कि पुरानी पीढ़ी अभी भी बीएसपी के प्रति निष्ठावान है।

वह मानते हैं कि सफलता के लिए आकाश को पहले  स्वयं को झोपड़ियों में रहने वाले दलितों से जोड़ना पड़ेगा, जबकि  विदेश से पढ़ कर आये एक युवा नेता के लिए एक बड़ी चुनौती है।

दलित चिन्तक कहते हैं, अब केवल बाबा साहब भीमराव आंबेडकर की तस्वीर पर मालार्पण करने से काम नहीं चलेगा यह तो बीजेपी भी करती है, दलित नेता उसी को स्वीकार करेगें जो उनके अधिकारों के लिए लडेगा और विचारधारा का समर्थक होगा। प्रो. चन्दन यह भी कहते हैं कि इस घोषणा को ऐसे भी देखा जा रहा है कि मायावती ने अपने आधार वोट को स्वतंत्र कर दिया है अब वह जहां चाहे जा सकता है।

प्रसिद्ध पत्रकार हुसैन अफ़सर कहते हैं कि बीएसपी सुप्रीमो ने मुस्लिम सांसद दानिश अली, जो सदन में मुस्लिम उत्पीड़न के विरुद्ध मुखरता से आवाज़ उठाते हैं, उसको निकाल कर बड़ी सियासी ग़लती की है। दानिश अली लोकसभा चुनाव 2024 में बीएसपी का मुस्लिम चेहरा हो सकते थे और इसका फ़ायदा भी पार्टी को मिलता। लेकिन जब दानिश अली को समर्थन की ज़रूरत थी उस समय मायावती ने उनको पार्टी से निकलकर ग़लत फ़ैसला किया है। इस से मुसलमानों  में बीएसपी भरी नाराज़गी है।

एक उर्दू अखबार के संपादक हुसैन अफ़सर आगे कहते हैं, जब मुसलमानों के ज़ख्मों पर मरहम लगाने की ज़रूरत थी उस समय मायावती ने उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़क दिया है। वह कहते हैं उनको विश्वास है कि मायावती हर  फैसला बीजेपी से पूछ कर करती हैं। जिसका नतीजा उनको अगले चुनाव में भुगतना पड़ सकता है।

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