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“अंतिम जोहार”: नहीं रहे आदिवासी अधिकारों की मुखर आवाज़ डॉ. करमा!

“आदिवासी समाज के लिए आपके योगदान को झारखंड के इतिहास में आने वाली कई पीढ़ियों तक याद किया जाएगा।”
डॉ. करमा

“ये राज्य बहुत पिछड़ा है, इसमें तो कोई शक नहीं। एक सदी तक तो हमने सहन किया ही है, झारखंड अलग राज्य बनने के बाद भी 22 वर्षों तक हमने काफ़ी कुछ सहन किया है। 1932 का खतियान हमारा आधार है।” - ऐसी खरी और तर्कपूर्ण बातें हर सभा-मंचों से कहने वाले जाने-माने मानवशास्त्री व आदिवासी-सामाजिक चिंतक डॉ. करमा उरांव अब इस दुनिया में नहीं रहे।

झारखंड राज्य गठन के अगुवा आंदोलनकारी, बुद्धिजीवी, वरिष्ठ शिक्षाविद व जन सामाजिक एक्टिविस्ट कहे जाने वाले 72 वर्षीय डॉ. करमा उरांव का निधन 14 मई हो गया। वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और चार दिन पहले उन्हें राजधानी रांची के इरबा स्थित मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां आईसीयू में इलाज के दौरान रविवार (14 मई) की सुबह उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके आकस्मिक निधन से झारखंडी व आदिवासी समाज में हर तरफ भारी शोक की लहर दौड़ गई है।

उनकी सामाजिक और जन लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब मेदांता अस्पताल से उनका पार्थिव शरीर रांची के मोरहाबादी स्थित उनके निवास स्थल पर लाया गया तो विभिन्न सामाजिक दायरों के सैंकड़ों शोकाकुल लोग पहले से ही वहां पहुंचे हुए थे। उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हज़ारों की तादाद सहज ही इस बात का सुबूत थी कि डॉ. करमा उरांव को कितनी व्यापक सामाजिक मान्यता हासिल थी।
 
सोमवार (15 मई) को उनके निवास स्थल से आदिवासी रीति-रिवाज के साथ अंतिम यात्रा निकाली गई। मोरहाबादी के एदलहातू स्थित ‘मसना’ (आदिवासी श्मशान स्थल) में उनका अंतिम संस्कार किया गया जिसमें उनके आंदोलनकारी सहकर्मियों समेत विभिन्न राजनैतिक दलों, आदिवासी व सामाजिक जनसंगठनों के लोग ‘डॉ. करमा उरांव अमर रहें’ के नारे लगाते हुए शामिल हुए।

प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने उनके निधन को व्यक्तिगत क्षति बताते हुए शोक व्यक्त किया और कहा कि आदिवासी उत्थान के प्रति सजग रहने वाले और चिंतन करने वाले डॉ. करमा उरांव से कई विषयों पर उन्हें मार्गदर्शन मिलता था।
                               
प्रदेश के सभी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों व नेताओं ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए उनके निधन को झारखंड राज्य के लिए अपूरणीय क्षति बताया है। इसके अलावा आदिवासी समाज और उसके संगठनों ने इसे समुदाय के अभी के संकटपूर्ण समय में एक गहरा आघात बताया है जिसकी अभिव्यक्ति सोशल मीडिया में पोस्ट-संदेशों के माध्यम से लगातार देखी जा सकती है।
  
आदिवासी महिला सामाजिक कार्यकर्ता रायमनी मुंडा ने उनकी महान शख्सियत को याद करते हुए कहा, “अंतिम जोहार, डॉ. करमा सर! आदिवासी समाज के लिए आपके योगदान को झारखंड के इतिहास में आने वाली कई पीढ़ियों तक याद किया जाएगा। आपने जीवनपर्यंत आदिवासी समाज के लिए सबसे आगे बढ़कर काम किया और हमारे सच्चे मार्गदर्शक बने रहे। आप हमारे आदिवासी समाज का आईना थे। आप आदिवासी युवा पीढ़ी को ये सीख देकर गए हैं कि आदिवासी अगर चाहे तो कोई भी मुक़ाम हासिल कर सकता है, जैसा आपने किया है। आपके साथ सामाजिक आंदोलनों का बिताया हुआ हर पल जीवन भर याद रहेगा।”

कहा जाता है कि झारखंड के लोकप्रिय त्यौहार ‘करमा परब’ के दिन ही जन्म होने के कारण उनका नामकरण ‘करमा’ हुआ था। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. करमा उरांव मानवशास्त्र विषय के काफी विख्यात शिक्षाविद रहे। सामाजिक मानवशास्त्र के अकादमिक जगत में उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पर काफी मान्यता हासिल थी। उन्हें यूके, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, इटली व ऑस्ट्रेलिया समेत 24 से भी अधिक देशों के विश्वविद्यालयों व शिक्षण संस्थानों के शैक्षिक-अध्यापन कार्यक्रमों में हमेशा बुलाया जाता रहा है। सामाजिक मानवशास्त्र विषय पर लिखी उनकी कई पुस्तकों को अकादमिक जगत में आज भी काफी महत्व दिया जाता है।

साल 1979 में रांची स्थित रामलखन सिंह कॉलेज में मानवशास्त्र के व्याख्याता के तौर पर अध्यापन कार्य शुरू करने वाले डॉ. करमा उरांव लंबे समय तक रांची विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर मानवशास्त्र के विभागाध्यक्ष रहे। बाद में वह विश्वविद्यालय डीन की जवाबदेही निभाने के अलावा एकीकृत बिहार के समय बीपीएससी के भी सदस्य रहे। उन्हें झारखंडी ज्ञान का Encyclopedia भी कहा जाता है।

झारखंड राज्य गठन आंदोलन के बौद्धिक नेतृत्वकर्ताओं में डॉ. रामदयाल मुंडा व डॉ. बीपी केसरी सरीखे वरिष्ठ शिक्षाविदों की टीम में डॉ. करमा उरांव भी एक प्रमुख नाम रहे जिन्होंने 90 के दशक में झारखंड आंदोलन की आवाज़ तत्कालीन केंद्र की दिल्ली सरकार तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

साल 2000 में झारखंड राज्य के गठन उपरांत राज्य में बनने वाली सरकारों और उनकी भूमिकाओं पर काफी पैनी नज़र रखते हुए कई बार उन्होंने सरकारों की तीखी आलोचना की और जन अभियानों का भी सक्रियतापूर्वक नेतृत्व किया। इसके अलावा उन्होंने मौजूदा हेमंत सोरेन सरकार की भी कई बार मुखर आलोचना की लेकिन जब ‘1932, खतियान आधारित स्थानीयता नीति’ बनाई गई तो उन्होंने खुलकर सरकार व मुख्यमंत्री का ज़ोरदार समर्थन भी किया।

हाल के वक़्त में वे आदिवासी समुदाय के लिए स्वतंत्र धार्मिक कोड (सरना कोड), 1932 के खतियान आधारित स्थानीयता-नियोजन नीति व झारखंडी भाषा-संस्कृति के सम्यक विकास जैसे महत्वपूर्ण सवालों को लेकर लगातार सड़कों पर सक्रीय रहे। विशेष रूप से उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों में पांचवी अनुसूची को सख्ती के साथ लागू किए जाने तथा सीएनटी एक्ट व पेसा कानूनों के ज़मीन पर ठोस अनुपालन के लिए निरंतर सरकार व शासन को आड़े हाथों लिया। इसके अलावा उन्होंने झारखंडी जनता के मुद्दों को लेकर होने वाले सभी सामाजिक जन अभियानों में खुद शामिल होकर उसका मार्गदर्शन करने का अहम कार्य किया।

झारखंड प्रदेश के आदिवासी व मूलनिवासी समुदाय का शायद ही कोई ऐसा जन अभियान हो जिसमें शामिल होकर उन्होंने नेतृत्व न किया हो। प्रदेश की कोई भी सरकार व उसके मुख्यमंत्री, मंत्री, नेता, नौकरशाह आदि डॉ. करमा की तीखी आलोचनाओं से नहीं बच सके।

डॉ. करमा उरांव एक बार भाजपा की टिकट पर चुनाव ज़रूर लड़े लेकिन जल्द ही उससे उनका मोहभंग हो गया। इसके बाद वे किसी भी सत्ताधारी राजनीतिक दल से न तो सक्रिय तौर पर जुड़े और न ही उससे कोई गहरा रिश्ता रखा। जीवन के अंतिम क्षणों तक वे आदिवासी व झारखंडी जनता के अधिकारों व सवालों के मुखर अगुवा की भूमिका निभाते हुए निरंतर ज़मीनी रूप से सक्रीय रहे।

झारखंड की आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास का सवाल हमेशा उनके लिए एक महत्वपूर्ण एजेंडा बना रहा। वे रांची विश्वविद्यालय के ‘जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा विभाग’ को ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ बनाने पर हमेशा ज़ोर देते रहे, ताकि राज्य में पढ़ाई जा रही भाषाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल सके।

सामाजिक-सांस्कृतिक एक्टिविस्ट जेवियर कुजूर के अनुसार, “झारखंड प्रदेश आज जिस जटिल राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक झंझावातों का सामना कर रहा है, डॉ. करमा उरांव इसे लेकर निरंतर सक्रिय चिंतक की भूमिका निभाते हुए ज़मीनी समाधान के लिए पूरी उर्जा से प्रयासरत रहे। विशेषकर हाल के वक़्त में जिस तेज़ी से 'विभाजनकारी और कॉर्पोरेटपरस्त राजनीति' अपनी केंद्रीय सत्ता-शक्ति से झारखंड प्रदेश को अपनी विनाशकारी प्रयोगशाला बनाने पर तुली हुई है, ऐसे में डॉ. करमा उरांव जैसे जन पक्षधर, सामाजिक सक्रीय चिंतक और बौद्धिक आंदोलनकारी की कमी निरंतर खलती रहेगी।”

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