झारखंड: “सरना-सनातन-डिलिस्टिंग” विवाद: कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना?
“आदिवासी वनवासी नहीं, आदिवासी प्रकृति पूजक हैं, वे मंदिरों में पूजा नहीं करते हैं…”- देश की प्रथम नागरिक और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के इस बयान ने एक नयी सियासी सरगर्मी पैदा कर दी है। ख़बरों के अनुसार कुछ दिन पूर्व मध्य प्रदेश के बैतूल में एक सामाजिक संगठन द्वारा आयोजित वृहत कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने दो-टूक अंदाज़ में ये बात कही। साथ ही आदिवासी समाज को लेकर और भी कई महत्वपूर्ण बातें रखी।
त्वरित प्रतिक्रिया के तहत मध्य प्रदेश के सत्ताधारी और विपक्षी दलों के बयानबाजी-घमासान के रूप में तो छिड़ ही गयी, जल्द ही इस विवाद की आंच झारखंड प्रदेश में भी पहुँच गयी। जिससे झारखंड में आदिवासी और आदिवासियत को लेकर पहले से चल रहे विवादों का सियासी तापमान और अधिक बढ़ गया है।
ज्ञात हो कि इन दिनों झारखंड राज्य में आदिवासी समाज को टारगेट कर “सरना-सनातन और डिलिस्टिंग विवाद” पूरे ज़ोर-शोर से चलाया जा रहा है। जो हाल ही में उस समय और अधिक तीखा व उत्तेजनापूर्ण हो गया जब केंद्र की सरकार में काबिज़ शीर्ष राजनीतिक पार्टी द्वारा अपनी पूरी मिशनरी झोंक कर देश भर से जुटाए गए “तथाकथित आदिवासियों” को लेकर दिल्ली में “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” का आयोजन किया गया था। जिसे मुख्य रूप से संबोधित करते हुए पार्टी नेता और देश के गृहमंत्री ने आदिवासियों को “वनवासी” कहकर संबोधित किया।
स्वाभाविक था की इसकी त्वरित प्रतिक्रया होनी थी। झारखंड प्रदेश के कई आदिवासी संगठनों और एक्टिविस्ट के अलावा भाजपा विरोधी राजनितिक दलों के कार्यकर्त्ताओं ने राजधानी रांची समेत राज्य के कई स्थानों पर ‘विरोध मार्च’ निकाला और गृहमंत्री का पुतला जलाकर अपना विरोध प्रदर्शित किया।

“सरना-सनातन और डिलिस्टिंग” को लेकर जारी विवाद क्रम में अब एक और संवेदनशील विवाद का मुद्दा “परिसीमन” के आने से मामला और भी उत्तेजक बनता जा रहा है। क्योंकि अबतक देश में जनसंख्या को आधार बनाकर संसदीय और विधान सभा क्षेत्रों का जो परिसीमन किये जाने का मामला रहा, मौजूदा केंद्र की सरकार द्वारा इसकी आड़ में “चुनाव आयोग” को आगे करके न सिर्फ विरोधी वोटों को बिखेर देने का काम हो रहा है बल्कि इसके जरिये अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिए सबकुछ तहस-नहस किया जा रहा है। इसका ताज़ा उदाहरण असम है, जहां विपक्षी दलों के वोटरों को पूरी तरह से बिखेर दिया गया।
चिंता की बात है कि ऐसे अत्यंत संवेदनशील मसले पर आदिवासी समुदायों के स्थापित बौद्धिक जन व आदिवासी विषय को लेकर लिखने-पढ़ने वाला कतिपय स्थापित झारखंडी लेखक-रचनाकार व कवि-कलाकारगण जाने क्यों अभी तक मौन हैं। जबकि प्रदेश के भाजपा विरोधी और इंडिया गठबंधन के राजीनीतिक दलों व कई सामाजिक जनसंगठनों-एक्टिविस्ट के बयानबाजी-घमासान तेज़ हो गए हैं।
उधर, झारखंड में जारी एसआईआर को लेकर भी काफी अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है। आदिवासी बाहुल्य इलाकों में कई जगहों से लोगों के नाम काटे जाने की ख़बरों से ये आशंका व्यक्त की जा रही है कि “चुनाव आयोग” के जरिये झारखंड में भी पश्चिम बंगाल वाला खेला न कर दिया जाय। क्योंकि यहाँ तो आदिवासी क्षेत्रों में पुश्तैनी रूप से बसे अनेक आदिवासी परिवारों के पास ज़मीन का कोई कागज़ नहीं है।

देश में जनगणना का काम तेज़ी से चलाया जा रहा और झारखंड के आदिवासियों के समक्ष गंभीर संकट है कि “धर्म” के कॉलम में वे क्या लिखें। प्रदेश के आदिवासी संगठनों और आदिवासी मामलों के जानकारों का आरोप है कि- “सरना-सनातन और डिलिस्टिंग विवाद” संघ-परिवार संचालित और भाजपा प्रायोजित है। 2023 में ही हेमंत सोरेन सरकार ने झारखंड विधान सभा से सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित कर केंद्र की सरकार को प्रस्ताव भेजा था कि आदिवासी समाज के लोगों के लिए “धर्म-कोड” कॉलम में अलग से “सरना धर्म कोड” उपलब्ध कराया जाय। जिसे केंद्र सरकार ने पूरी तरह से “ठंडे बस्ते” में डालकर मौन साध रखा है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने “सरना धर्म कोड” के लिए देश की राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को विशेष पत्र लिखकर मांग की थी कि- “आदिवासी समाज के लोग प्राचीन परम्पराओं और प्रकृति के उपासक हैं।” लेकिन कही से भी कोई सकारात्मक जवाब नहीं आया।
ख़बरों के अनुसार सिर्फ झारखंड ही नहीं देश भर के आदिवासी समुदाय के लोग अपने स्वतंत्र धार्मिक पहचान और अस्तित्व के लिए जनगणना के “धर्म कॉलम” में ‘सरना धर्म कोड’ शामिल किये जाने की मांग को लेकर लागातार आन्दोलनरत हैं। जिसे केंद्र की सरकार लागातार अनसुना किये हुए है।
उक्त हालात में यह सवाल और संदेह बेहद अहम और गंभीर बन जा रहा है कि- क्या कारण हैं कि झारखंड के आदिवासी समाज को टारगेट करके नित नए नए सामाजिक-विभाजन के मुद्दे उछलकर पूरे सामाजिक वातावरण को अराजक बनाने की कवायदें हो रहीं हैं?
मसलन, पिछले दिनों का “कूड़मी बनाम आदिवासी विवाद”, फिर झारखंडी भाषा-विवाद, संविधानप्रदत्त “पेसा कानून विवाद” और अब “सरना-ईसाई-डिलिस्टिंग विवाद” के बाद एसआईआर-परिसीमन का मामला।
दूसरी ओर, झारखंड में बचे-खुचे जल-जंगल-ज़मीन और प्राकृतिक खनिज संसाधनों की कॉर्पोरेट कंपनियों द्वारा कानूनी-छेदों का इस्तेमाल कर केंद्र की सत्ता और पुलिस के बल पर बेलगाम लूट की छूट दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है। वहीं, आदिवासी समाज को मिले संविधान की पांचवी अनुसूची जैसे सभी विशेषाधिकारों को प्रभावहीन बनाने की सुसंगठित कवायदें भी तेज़ दर तेज़ हो रहीं हैं। माओवादी हिंसा रोकने के नाम पर आदिवासी क्षेत्रों में हर पांच किलोमीटर पर बनाए गए “अस्थायी सीआरपीएफ-पोस्ट” सब स्थायी किये जा चुके हैं।
पूरा परिदृश्य साफ़-साफ़ बता रहा है कि इन दिनों झारखंड और विशेषकर आदिवासी क्षेत्रों व आदिवासी समाज के भीतर जो “प्रायोजित उथल-पुथल” मचाने की कवायद सामने दीख रहीं हैं, मामला “कहीं पर निगाहें, कहीं पर निशाना” वाला तो नहीं! जिसके लिए नित नए नए “आदिवासी और झारखंडी सेलिब्रिटी मार्का नेता” मीडिया द्वारा बेहद फ़िल्मी अंदाज़ में खूब वायरल किये जा रहे हैं।
सोशल मीडिया में भी राज्य के सुचिंतित समाज के लोगों के कई पोस्टों में उक्त स्थितियों को लेकर बातें सामने आ रहीं हैं। जिनमें कहा जा रहा है कि- “बड़ी चतुराई से आदिवासियों के बीच “धर्म” नाम का नशा परोसा जा रहा है जिससे आदिवासी समाज दो पाटों में पिस रहा है। इस लड़ाई में आदिवासियों का मूल स्वभाव ‘सामूहिकता और इंसानियत’ कहीं सो सी रही है। शिक्षा और रोज़गार इत्यादि से वंचित आदिवासी समाज के कई युवा राजनीतिक दलों के पिछलग्गू और उसके एजेंट बनते जा रहे हैं। आदिवासियों की बची-खुची पहचान और और समाज का सत्यानाश करने पर तुले हुए हैं। वहीं, कुछ तथाकथित सामाजिक संगठनों के इशारों पर “धर्म” के नाम पर नंगा नाच करने को मजबूर हो रहे हैं। इन कृत्यों से कभी समाज का भला नहीं हो सकता हैं।”
(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार, संस्कृतिकर्मी और राजनीतिक कार्यकर्ता हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)
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