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1975 बनाम 2023 : आज जनपक्षधर पत्रकार सुरक्षित नहीं

इमरजेंसी के दौर को याद करते हुए यूपी के पत्रकार बोले "आज अघोषित आपातकाल जैसे हालात"
EMERGENCY

इमरजेंसी के दौर को याद करते हुए यूपी के कई वरिष्ठ पत्रकारों और राजनीतिक विश्लेषकों ने मौजूदा दौर की तुलना इमरजेंसी के वक़्त से करते हुए आज के हालात को चिंताजनक बताया और साथ ही पत्रकारों की आवाज़ को 'दबाने' का गंभीर आरोप लगाया। पेश है स्पेशल रिपोर्ट :

"48 साल पहले देश में घोषित आपातकाल था और इस समय हालात अघोषित आपातकाल जैसे हैं। इमरजेंसी में भी अख़बार सरकार पर सवाल उठाया करते थे। मौजूदा दौर में सबसे बदतर स्थिति यूपी में है। यहां ज़्यादातर पत्रकार अपनी नौकरी बचा रहे हैं। इतनी बुरी नौबत तो उस वक़्त भी नहीं थी। अब तो कोई चू भी बोल देता है, पुलिस उसे जेल भेज देती है।"

यह कहना है देश के जाने-माने पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान का, जो अपना नज़रिया पेश करते हुए कहते हैं, "उत्तर प्रदेश में पत्रकारों के साथ पुलिसिया उत्पीड़न आम बात है। ऐसी घटनाओं को न सरकार संज्ञान में लेती है और न ही पुलिस के आला अफ़सर। यह सरकार अभिव्यक्ति की आज़ादी की बातें तो बहुत करती है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त से कोसों दूर है। अख़बारों के चलन से पता चलता है कि सरकार की नीति और नीयत क्या है? यूपी के ज़्यादातर अख़बार सरकार के कसीदे पढ़ रहे हैं। कोई भी ख़बर सरकार अथवा उसकी मशीनरी के कार्यकलाप पर सवाल उठती है तो वो अख़बार से गायब हो जाती है। अगर होती भी है तो अख़बारी पन्ने के किसी कोने में दुबकी मिलती है। सही मायने में असल ख़बर वही होती है।"

मौजूदा हालत पर चिंता ज़ाहिर करते हुए पत्रकार शरत यह भी कहते हैं, "यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सिर्फ़ उन्हीं पत्रकारों से मिलना पसंद करते हैं जो उनके आगे दंडवत होते है अथवा उनकी तारीफों के पुल बांधा करते हैं। ऐसे हुक्मरानों का इलाज सिर्फ़ जनता के पास है। दुर्योग यह है कि सरकार ने जनता के दिमाग में हिंदू-मुसलमान का ज़हर इतने अंदर तक पहुंचा दिया गया है कि लोग हर तर्क और ज़मीनी हक़ीक़त को नज़रअंदाज़ करते जा रहे हैं।"

शरत अपनी बात जारी रखते हुए आगे कहते हैं, "भारत में पिछले नौ सालों में भले ही पीएम नरेंद्र मोदी से कोई पत्रकार सवाल नहीं कर पाया, लेकिन अमेरिका दौरे के समय वहां के पत्रकारों ने भारत में मानवाधिकार उल्लंघन के मामले को लेकर खूब सवाल दागे। हालांकि मोदी हर सवाल का सिर्फ़ एक ही जवाब देते रहे कि इंडिया में सब बढ़िया है। उन्होंने यह भी कहा कि हम लोगों को मानवाधिकारों की बहुत फ़िक्र है। जिस तरह अमेरिका में अभिव्यक्ति की आज़ादी है, वैसी ही भारत में भी है। रिपोर्टर्स विदाउट बार्डर की रिपोर्ट बताती है कि लोकतांत्रिक मानदंड में 180 देशों में भारत का स्थान 161 वां है, जो सीधे-सीधे अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सवालिया निशान लगाता है। इसके अलावा यह भी दर्शाता है कि लोकतंत्र का चौथा किस स्थिति में है।"

"जनपक्षधर पत्रकार सुरक्षित नहीं"

अंग्रेज़ी में एक कहावत है, 'Pen Is Mighter Than Sword' यानी कलम तलवार से अधिक शक्तिशाली है। लेकिन कई वरिष्ठ पत्रकारों का आरोप है कि उत्तर प्रदेश में कलम से ज़्यादा ताकतवर हैं प्रशासन, पुलिस और अपराधी। लोकसभा में पेश राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2013 से अब तक पत्रकारों पर सर्वाधिक कार्रवाईयां उत्तर प्रदेश में हुईं। दूसरे स्थान पर मध्य प्रदेश और तीसरे पर बिहार है। यूपी में सरकार कोई भी रही हो, पत्रकारों पर इस तरह के मामलों में तनिक भी कमी नहीं आई है। ताज़ा मामला मिर्ज़ापुर के ड्रमनगंज का है जहां एक सड़क हादसे की कवरेज करने गए आंचलिक पत्रकार अभिनेश प्रताप सिंह को पुलिस थाने के लाकअप में बेरहमी से पीटने की ख़बरें सामने आईं। इसके बाद में शांति भंग करने के मामले में उनपर कार्रवाई की गई। मिर्ज़ापुर के एसपी संतोष कुमार मिश्र ने आरोपी दरोगा और सिपाही को लाइनहाज़िर करने का आदेश दिया, लेकिन अबतक उसपर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। पत्रकार के साथ हुए इस दुर्व्यवहार के मामले की जांच पुलिस क्षेत्राधिकारी को सौंपी गई थी, लेकिन उसका कुछ निर्णायक नही हुआ।

उत्तर प्रदेश में स्थिति यह है कि साल 2023 के शुरुआती दिनों में ही पत्रकारों पर सौ से अधिक मुक़दमे लिखे गए। हाल के दिनों में इसकी तादाद काफ़ी बढ़ गई है। लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "आज आपातकाल को याद करने का दिन है। आपातकाल के दौर में जोख़िम उठाने वाले कई पत्रकार अभी मौजूद हैं, जिन्हें लगता है कि उस समय जो घटनाएं हो रही थी, मौजूदा दौर में स्थिति कहीं ज़्यादा गंभीर है।"

सिद्धार्थ कहते हैं, "कोई पत्रकार अगर जनपक्षधर है तो उसे सुरक्षित नहीं मानना चाहिए। पहले सरकार के ख़िलाफ़ लिखने पर उत्पीड़न की कार्रवाई होती थी, आज जनता के पक्ष में लिखने पर सख्त एक्शन हो रहा है। मिर्ज़ापुर के नमक-रोटी और बनारस में मुसहरों के अकरी घास खाने की ख़बरें छापने पर हुई दमनात्कम कार्रवाइयां इस बात का सबूत हैं। स्थिति इतनी ख़राब है कि ख़बरों में सत्ता का पक्ष जानना भी दुश्ववार हो गया है। अभी हाल ही में अमेठी की सांसद एवं मंत्री स्मृति इरानी की बाइट लेने भर से दो आंचलिक पत्रकारों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। स्मृति इरानी से सवाल करने वाले पत्रकारों ने दावा किया था कि वे भास्कर समूह से हैं। हालांकि भास्कर की ओर से कहा गया कि उनका भास्कर समूह से कोई रिश्ता नहीं है।"

कलहंस कहते हैं, "पत्रकारों के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों में सरकार पहले अपनी गलती मानते हुए मुक़दमे वापस ले लिया करती थी लेकिन अब तो सभी मुक़दमे ट्रायल के लिए भेजे जा रहे हैं। चाहे वो झूठे हों या सच्चे। हाल के सालों में एक नया काम यह शुरू हुआ है यूपी सरकार ने ख़ुद अपना फैक्ट फाइंडिंग तंत्र विकसित कर लिया है। पत्रकारों को ख़ुद झूठा करार देकर योगी सरकार उनके ख़िलाफ़ मुक़दमें थोपती जा रही है। यूपी में यह स्थिति वैसी है जैसे आरोपी अपने मुक़दमें में ख़ुद ही जज बन जाए।"

"सत्ता से सवाल पूछना ही भूल गए"

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस अपनी बात जारी रखते हुए कहते हैं, "देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में हालात इतने ख़राब हो गए हैं कि यहां के पत्रकार अब सत्ता से सवाल पूछना भूल ही चुके हैं। सत्ता से कौन सा सवाल पूछा जाना है, ख़बर क्या छपनी चाहिए, उसके लिए डबल इंजन की सरकार ने ख़ुद अपना तंत्र विकसित कर लिया है। वह जो चाहती है वही अख़बारों को परोसा जाता है और वही जनता के बीच पहुंचता है। इसका दुखद नतीजा यह है कि सरकारें निरंकुश और अधिनायकवादी होती जा रही हैं। हाल के कुछ सालों में यूपी के पत्रकारों की साख जिस तरह से जनता के बीच गिरी है वह शर्मनाक है। पत्रकारों ने जनता के साथ खड़े होने का भरोसा पूरी तरह खो दिया है, जिसकी भरपाई अब मुमकिन नहीं है।"

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस की बातों को समझने के लिए कुछ घटनाओं पर नज़र डालते हैं। इसी साल मार्च 2023 में एक पत्रकार संजय राणा ने संभल में यूपी की माध्यमिक शिक्षा विभाग की मंत्री गुलाबों देवी से विकास के मुद्दे पर सवाल पूछने की हिम्मत जुटाई तो पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया। इसके अलावा, उसके ऊपर बीजेपी कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट का केस भी दर्ज किया गया।

गुलाबो देवी का कार्यक्रम ख़त्म होते ही संभल के चंदौसी थाने की पुलिस ने पत्रकार संजय राणा को बीजेपी कार्यकर्ता से मारपीट के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया। पुलिस राणा को पत्रकार भी नहीं मान रही है। पुलिस के मुताबिक़ संजय राणा का नाम ज़िले के सूचना विभाग में पंजीकृत नहीं हैं। शुभम राघव नाम के एक बीजेपी कार्यकर्ता की शिकायत पर उनके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 323, 504 और 506 के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई थी। शुभम राघव का इस मामले में कहना था, "संजय राणा पत्रकार नहीं है, बल्कि वह यूं ही हाथ में माइक लेकर घूमता रहता है और ग्राम प्रधानों और सचिवों को ब्लैकमेल करता रहता है।" वहीं मंत्री गुलाबो देवी का कहना था कि उनका इस एफ़आईआर से कोई संबंध नहीं है। राणा की मां कश्मीरी देवी कहती हैं, "मेरे बेटे का सिर्फ़ इतना कसूर है कि उसने मंत्री गुलाबो देवी से सवाल किया कि खंडवा गांव के विकास पर 75 लाख रुपये कहां ख़र्च किए गए हैं, जबकि सड़क टूटी हुई है। मेरे बेटे का किसी से कोई झगड़ा नहीं हुआ था। पुलिस ने सिर्फ़ उसका नाम पूछा और पकड़ कर ले गई।"

एक नज़र पत्रकारों पर हुई कार्रवाई के कुछ मामलों पर...

सवाल पूछने पर पत्रकार को जेल भेजने अथवा मुक़दमा दर्ज करने की यह पहली वारदात नहीं है। सितंबर 2019 में यूपी में नमक-रोटी मामले में पत्रकार पवन जायसवाल पर मुक़दमा दर्ज किया गया था। फरवरी 2021 में दिल्ली की पत्रकार इस्मत आरा पर रामपुर में मुक़दमा दर्ज किया गया था। इस्मत आरा ने दिल्ली में किसान आंदोलन के दौरान मारे गए रामपुर के एक सिख किसान के परिवार पर रिपोर्ट लिखी थी। रिपोर्ट शेयर करने वाले द वॉयर के एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन के ख़िलाफ़ भी एफ़आईआर दर्ज कराई गई थी। जून 2021 में ग़ाज़ियाबाद में पत्रकार राणा अय्यूब, मोहम्मद ज़ुबैर, लेखिका सबा नक़बी और कई लोगों के ख़िलाफ़ एक मुसलमान बुज़ुर्ग पर हमले की फ़र्ज़ी रिपोर्ट करने के संबंध में मुक़दमा दर्ज किया गया था।

जून 2020 में पत्रकार सुप्रिया शर्मा पर भी उत्तर प्रदेश के वाराणासी में मुक़दमा दर्ज हुआ था। सुप्रिया शर्मा ने प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में कोविड महामारी के हालात पर रिपोर्ट की थी। केरल के पत्रकार सिद्दीक़ कप्पन को हाथरस में हुए कथित गैंगरेप की रिपोर्ट करने जाने के दौरान गिरफ़्तार कर लिया गया था। कप्पन पर शांति भंग करने का प्रयास करने के आरोप लगाए गए थे। कुछ साल पहले जनसंदेश टाइम्स के पत्रकार रहे सुरेश बहादुर सिंह और धनंजय सिंह के ख़िलाफ़ ऑफ़िशियल्स सीक्रेट ऐक्ट के तहत एफ़आईआर दर्ज की गई थी। दोनों पर आरोप था कि उन्होंने गोपनीय दस्तावेज़ अवैध तरीक़े से प्राप्त किए और फिर उसके आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित की।

07 सितंबर, 2020 को बिजनौर में दबंगों के डर से वाल्मीकि परिवार के पलायन करने संबंधी ख़बर के मामले में पांच पत्रकारों आशीष तोमर, शकील अहमद, लाखन सिंह, आमिर ख़ान तथा मोइन अहमद के ख़िलाफ आईपीसी की धारा 153A, 268 तथा 505 के तहत रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। 03  सितंबर, 2019 को लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार असद रिज़वी को एक नोटिस तामील कराते हुए उन्हें कोर्ट में हाज़िरी के लिए कहा गया था। 02 अक्तूबर 2023 को लखनऊ में एक प्रदर्शन को कवर करने गए पत्रकार असद के साथ दुर्व्यवहार किया गया, लेकिन उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई। कुछ समय पहले वरिष्ठ पत्रकार और अंग्रेज़ी न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के ख़िलाफ़ अयोध्या में दो मामले दर्ज किए गए थे, जिसमें उन्हें हाईकोर्ट से अग्रिम ज़मानत मिल गई थी। 10 सितंबर 2019 को आज़मगढ़ के एक स्कूल में छात्रों से झाड़ू लगाने की घटना को रिपोर्ट करने वाले पत्रकार संतोष जायसवाल को गिरफ़्तार कर लिया गया था।

इंडियन फ़ेडरेशन ऑफ़ वर्किंग जर्नलिस्ट के राष्ट्रीय अध्यक्ष के. विक्रम राव कहते हैं, "पत्रकार तो पीड़ित पक्ष की पीड़ा सुनेगा ही। जो हुक्मरान पत्रकारों की आलोचना न सुन सके, उनके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि उसके पास बहुमत का अहंकार है। पुलिस और प्रशासन इसलिए पत्रकारों के ख़िलाफ़ एक्शन ले रही है ताकि चौथा खंभा डगमगाता रहे और नौकरशाही मनमानी करती रहे।"

"हक़ीक़त दिखाने पर जेल"

दिल्ली स्थित 'राइट एंड रिस्क्स एनालिसिस ग्रुप' ने कुछ साल पहले ऐसे 55 पत्रकारों को परेशान किए जाने का ब्योरा जुटाया था, जिन्होंने सरकार के कामकाज की ज़मीनी हक़ीक़त दिखाने की कोशिश की और बाद में उनके ख़िलाफ़ संगीन धाराओं में केस दर्ज किए गए। इनमें सर्वाधिक 11 मामले यूपी के थे।

कमेटी अगेंस्ट असॉल्ट ऑन जर्नलिस्ट्स (काज) की एक सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक़, "यूपी में साल 2017 में योगी सरकार सत्ता में आई और फरवरी 2022 तक पत्रकारों के उत्‍पीड़न के कुल 138 मामले दर्ज किए गए। इस रिपोर्ट के प्रकाशन तक राज्‍य में कुल 12 पत्रकारों की हत्‍या हुई, 48 पर शारीरिक हमले हुए, 66 के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज हुआ या उनकी गिरफ़्तारी हुई और धमकी, हिरासत या जासूसी संबंधी 12 मामले सामने आए। पांच साल के दौरान 78 फ़ीसदी मामले (109) वर्ष 2020 (52) और 2021 (57) में कोरोना महामारी के दौरान दर्ज किए गए। सबसे ज़्यादा सात पत्रकार साल 2020 में मारे गए।"

रिपोर्ट के मुताबिक़, "साल 2020 में कुल सात पत्रकार मारे गए। इसके अलावा आरोप है भ्रष्‍टाचार को उजागर करने के चलते राष्‍ट्रीय स्‍वरूप से जुड़े राकेश सिंह ने अपनी जान गंवाई। उन्‍नाव के शुभम मणि त्रिपाठी को रेत माफिया के ख़िलाफ़ लिखने के चलते धमकियां मिलीं तो उन्‍होंने पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाई और सुरक्षा न मिलने पर उन्हें गोलियों से मारा गया। ग़ाज़ियाबाद में पत्रकार विक्रम जोशी और बलिया में टीवी पत्रकार रतन सिंह को दिनदहाड़े गोली मारी गई। सोनभद्र के बरवाडीह गांव में उदय पासवान और उनकी पत्‍नी की दबंगों द्वारा पीट-पीट कर हत्या की गई। उन्‍नाव में अंग्रेज़ी पत्रकार सूरज पांडे की लाश रेल की पटरी पर संदिग्‍ध परिस्थितियों में मिली।"

बता दें कि साल 2021 में यूपी के प्रतापगढ़ में पत्रकार सुलभ श्रीवास्‍तव की हत्या कर दी गई। उन्होंने शराब माफिया के भ्रष्‍टाचार को उजागर करने की कोशिश की। लखीमपुर खीरी में रमन कश्‍यप की हत्या का आरोप केंद्रीय मंत्री अजय मिश्र टेनी के बेटे आशीष मिश्रा के ऊपर है। आरोप है कि आशीष ने अपनी गाड़ी से कथित रूप से प्रदर्शनरत किसानों के साथ पत्रकार को रौंद दिया था। साल 2022 की शुरुआत में सहारनपुर के पत्रकार सुधीर सैनी की दिनदहाड़े हत्या की गई। रिपोर्ट के मुताबिक़ कुल 12 पत्रकारों की हत्याओं का आंकड़ा सामने आया है।

कमेटी अगेंस्ट असॉल्ट ऑन जर्नलिस्ट्स की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़, "पत्रकारों पर सबसे ज़्यादा हमले सरकार और नौकरशाही की ओर से दर्ज कराए गए। ये हमले कानूनी नोटिस, एफआईआर, गिरफ़्तारी, हिरासत, जासूसी, धमकी और हिंसा के रूप में सामने आए हैं। पत्रकारों पर शारीरिक हमलों की फेहरिश्त बहुत लंबी है। इस राज्य में पांच साल में क़रीब 50 से अधिक पत्रकारों पर रिपोर्टिंग के दौरान जानलेवा हमले किए गए। साल 2021 से पत्रकारों पर हमलों का तेज़ी से ग्राफ बढ़ा है। साल 2020 और 2021 में सैकड़ों पत्रकारों को धमकाने की नीयत से कानूनी नोटिस भेजे गए। बीबीसी और द हिंदू जैसे बड़े संस्थानों के पत्रकार ही नहीं, ख्यातलब्ध पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन, मृणाल पांडे, राणा अयूब, ज़फ़र आगा, सबा नक़वी, विनोद के. जोस, अनंत नाथ जैसे पत्रकारों को भी सरकार ने कई मुक़दमों में फंसाने की कोशिश की। बीते पांच वर्षों के दौरान यूपी में पत्रकारों पर कुल 138 में से 107 मामले 2020 और 2021 में दर्ज किए गए।"
 
लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमले का आरोप
 
उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ़ जर्नलिस्ट के जिलाध्यक्ष विनोद बागी कहते हैं, "ख़बरों के संकलन में अब मालिकों का दखल बढ़ गया है और पत्रकारों की जुबां पर पहरे लगा दिए गए हैं। चौथे स्तंभ पर हो रहे हमलों को देखें तो दिमाग में यही बात आती है कि यहां ख़बरनवीशों की आज़ादी और सुरक्षा दोनों खतरे में है। अभिव्यक्ति की आज़ादी के मामले में मेक्सिको भले ही दुनिया का सबसे ख़तरनाक देश माना जाता है, लेकिन यहां भी हालात कुछ ख़ास ठीक नहीं है। आपातकाल की तरह कोरोनाकाल में बड़े पैमाने पर पत्रकारों पर हमले हुए और धमकियां दी गईं। फिर भी दावा किया जा रहा है कि बीजेपी के सत्ता में आने से पहले गुंडाराज था और अब सुशासन है।"

पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़ (पीयूसीएल) ने यूपी में बढ़ते मानवाधिकार हनन के मामलों पर गहरी चिंता जताते हुए फरवरी 2022 में एक विस्तृत रिपोर्ट जारी थी, जिसमें कहा था कि "मानवाधिकार हनन के 40 फ़ीसदी मामले अकेले यूपी के ही हैं। सिर्फ़ पत्रकार ही नहीं, महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा के मामले में भी यूपी देश में अव्वल है। दलित उत्पीड़न की सर्वाधिक 25.8 फ़ीसदी घटनाएं इसी राज्य में हुई हैं।"

चंदौली ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन के अध्यक्ष आनंद सिंह कहते हैं, "किसी पत्रकार ने अगर ख़बर लिखी और किसी को आपत्ति है तो उसके लिए कई फ़ोरम बने हैं। आप संपादक से शिकायत कर सकते हैं और प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया में भी जा सकते हैं। यहां तक कि कोर्ट में भी जा सकते हैं, लेकिन आप उसके साथ अपराधी की तरह पेश नहीं आ सकते। समझ में यह नहीं आ रहा है कि आप कैसी सरकार चला रहे हैं कि आलोचना सुनने की सहनशक्ति ही आप में नहीं है और प्रतिशोध की भावना से काम करना शुरू कर देते हैं।"

आनंद कहते हैं, "यूपी में पत्रकारों के लगातार दमन और बढ़ती पाबंदियों ने मीडिया की आज़ादी के लिए बड़ा ख़तरा पैदा कर दिया है। सरकार से सवाल करने वाले पत्रकारों के ख़िलाफ़ पुलिस झूठे मामले गढ़ देती है। कभी उन्हें धमकाने तो कई बार फ़र्ज़ी मामले में गिरफ़्तारी की धमकियां मिलती हैं। सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वाले पत्रकारों पर गिरफ़्तारी के साथ-साथ देशद्रोह जैसे मुक़दमों का ख़तरा भी हमेशा बना रहता है।"

(लेखक बनारस स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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