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2022 : पांच और हिंदी किताबों के बारे में

कवि और विश्लेषक अजय सिंह ने इस आलेख में कवि अदनान कफ़ील दरवेश, शंभु बादल, रंजीत वर्मा और आलोचक आशीष सिंह की किताबों पर बेबाक टिप्पणी की है। साथ ही ‘स्मृतियों के आईने में अरुण कुमार पांडेय’ पर भी बात की है।
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वर्ष 2022 में छपी कुछ हिंदी किताबों पर मैं पिछले दो अंकों में लिख चुका हूं। यह उस कड़ी का तीसरा और आख़िरी लेख है।

कवि अदनान कफ़ील दरवेश का पहला कविता संग्रह ‘ठिठुरते लैंप पोस्ट’ (राजकमल प्रकाशन, दिल्ली) ध्यान देने लायक है। ये कविताएं अलग मिज़ाज की हैं। कविताओं का मुख्य स्वर निराशा और भविष्यहीनता का दिखायी देता है, और असहमति की आवाज़ भी सुनायी देती है। संग्रह की कविताएं उम्मीद जगाती हैं कि बीच-बीच में झांकती असहमति आगे चलकर पुख़्ता और मुखर होगी, और अपने निशाने (टारगेट) की ठीक-ठीक पहचान करेगी।

दरअसल ठिठुरते लैंप पोस्ट एक रूपक है, हिंदी-उर्दू पट्टी के मुस्लिम मन और समाज का। ख़ासकर निम्न मध्यमवर्गीय मुस्लिम समाज का—उसकी चिंताओं, दुःस्वप्नों और चाहतों का। यह समाज बहुत डरा हुआ, बहुत आतंकित है।

बाबरी मस्जिद विध्वंस और उसके बाद फ़ासीवादी हिंदुत्व विचारधारा के उभार ने—जो इन दिनों केंद्र में सत्तारूढ़ है—जिस तरह भारतीय समाज पर, ख़ासकर मुस्लिम समुदाय पर, कहर बरपा किया है और बचे-खुचे लोकतंत्र को मौत के कगार पर पहुंचा दिया है—उसकी बहुत धीमी, ढकी-छिपी अभिव्यक्ति अदनान की कविताओं में मिलती है। कविताओं में गेहुंअन सांप और बिच्छू के बिंब अक्सर आते हैं, जो ख़ास संकेत देते हैः ‘रस्ता रोके सांप खड़ा है’। दरवेश के मरने का ज़िक्र भी आता हैः ‘वहीं कहीं दरवेश मरा है’, ‘पूछते क्या हो लाश किसकी है/ कोई दरवेश मर गया होगा’। टटके, नये ढंग के बिंब इन कविताओं की ख़ासियत हैं।

लेकिन अदनान की कविताओं में औरतें मर्दों के सहारे—उनके रहम-ओ-करम पर—नज़र आती हैं, उनका अपना स्वतंत्र, निजी व्यक्तित्व नहीं उभरता। वे मर्दों को गमछा थमाती, छाता पकड़ाती, थैला/झोला देती दिखायी देती हैं। उनकी अपनी स्वतंत्र यौनिकता की दावेदारी, तो ख़ैर, बहुत दूर की बात है! अगर आप शानी का उपन्यास ‘काला जल’ (1965) पढ़ें, तो उसमें सल्लो आपा – जैसी बग़ावती, आज़ादख़्याल लड़की/औरत मिलती है—वह अद्भुत चरित्र है। लेकिन अदनान की कविताओं में ऐसी लड़की या औरत की आमद होना बाक़ी है। कविताओं में निष्क्रियता (passivity) भी दिखायी देती है।

‘ठिठुरते लैंप पोस्ट’ के आख़िरी कवर पेज पर अदनान की कविताओं के बारे में कवि राजेश जोशी (भोपाल) की टिप्पणी छपी है। यह शब्दों की बाज़ीगरी और ख़िलवाड़ के अलावा और कुछ नहीं है। इस हवा-हवाई, निरर्थक टिप्पणी से किताब का असर काफ़ी कम हो जाता है। बच-बचाकर, चालाकी से लिखी इस टिप्पणी में बाबरी मस्जिद विध्वंस, मुसलमानों पर हमले और फ़ासिस्ट हिंदुत्व विचारधारा के उभार का एक बार भी ज़िक्र नहीं है। क्या यह अनायास है? इस ज़िक्र के बग़ैर अदनान की कविता को कैसे समझा जा सकता है! ऐसी समय-निरपेक्ष टिप्पणी 50 साल पहले भी लिखी जा सकती थी और 50 साल बाद भी लिखी जा सकती है—हूबहू इसी तरह! कविता संग्रह के अगले संस्करण में यह टिप्पणी निकाल दी जानी चाहिए।

लंबी कविता ‘पैदल चलनेवाले पूछते हैं’ (1986) से चर्चा में आये कवि शंभु बादल के लिए ‘ज़िंदगी का प्रश्न कविता का प्रश्न है और कविता का प्रश्न ज़िंदगी का प्रश्न है’। उनका नया कविता संग्रह ‘शंभु बादल की चुनी हुई कविताएं’ इसकी गवाही देता है। संग्रह की कविताओं का चयन कवि-आलोचक बलभद्र ने किया है। किताब विकल्प प्रकाशन, दिल्ली से छपी है।

इस किताब में शंभु बादल के अब तक छपे तीन कविता संग्रहों से कविताएं ली गयी हैं और पत्रिकाओं में छपी कवि की कविताएं भी शामिल की गयी हैं। किताब का ब्लर्ब (फ़्लैप मैटर) तेलुगू कवि वरवर राव ने लिखा है, और भूमिका हिंदी आलोचक आशुतोष कुमार ने लिखी है।

वरवर राव ने शंभु बादल के बारे में लिखा है कि वह ‘समकालीन राजनीति में संघर्षशील शक्तियों का पक्ष लेना पसंद करते हैं’। वह लिखते हैः ‘शंभु बादल का हृदय शोषित जनों के पक्ष में है।’

आशुतोष कुमार ने कवि की कविता को ‘थापों और चांटों से सधी हुई कविता’ बताते हुए लिखा है कि ‘शंभु बादल की कविताओं के आदिवासी चरित्र ख़ासतौर पर ध्यान खींचते हैं’। अपने परिचयात्मक लेख में बलभद्र ने शंभु बादल को ऐसा कवि बताया है, ‘जो सत्ता की निर्मम आलोचना तक ही नहीं रहते, बल्कि उसे बदल देनेवाली पहलक़दमियों की तरफ़ भी नज़र रखते हैं।’

यह संग्रह शंभु बादल के कवि व्यक्तित्व और उसकी विकास यात्रा को समझने में मददगार है।

‘अगर भगतसिंह हमारे नायक हैं/ तो बार-बार हत्यारा चुन कर कैसे आ जाता है’ – यह सवाल पूछते हैं कवि रंजीत वर्मा अपने नये कविता संग्रह ‘यह रक्त से भरा समय है’ (परिकल्पना प्रकाशन, लखनऊ) में। ऐसे असुविधाजनक सवालों से लैस है यह संग्रह। 154 पेज की इस किताब में क़रीब 50 कविताएं हैं। यह रंजीत वर्मा का चौथा कविता संग्रह है। वह साफ़ लफ़्जों में कहते हैः ‘मार्क्सवाद जानना/मार्क्सवादी होना नहीं होता है।’

जैसा कि शीर्षक से ज़ाहिर है, यह संग्रह मौजूदा डरावने समय—फ़ासिस्ट हिंदू अंधराष्ट्रवादी समय—पर केंद्रित है, जिसके सरगना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। अगर जीवन में संघर्ष और प्रतिरोध के लिए जगह है, तो यह किताब उसके साथ है। इसलिए इसकी अहमियत है।

‘कविता में ईश्वरवाद आ गया है’ और ‘कविता सत्ता से मुक्ति की लड़ाई है’ शीर्षक कविताएं एक प्रकार से रंजीत वर्मा का घोषणापत्र हैं। कवि संसदीय सत्ता पक्ष और विपक्ष से अलग एक ग़ैर-संसदीय विपक्ष की ज़रूरत की वकालत करता है और कहता है कि संसदीय सत्ता पक्ष और विपक्ष एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं। मेरा सवाल हैः क्या यह मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य के बारे में सही, विवेकसंगत समझदारी है?

‘यह रक्त से भरा समय है’ कविता संग्रह के साथ दिक़्क़त यह है कि इसकी लगभग सारी कविताएं एकरस/एकरंगी (monotonous) हैं। वे सब एक ही टोन में चलती हैं, और अन्य मानवीय संवेदनाओं के लिए वहां जगह नहीं है। औरंगज़ेब वाली कविता में राजनीतिक गड़बड़झाला दिखायी देता है। कुछ अन्य कविताएं भी राजनीतिक समझ की दृष्टि से समस्याग्रस्त लगती हैं। हालांकि इन कविताओं से कवि की पॉलिटिक्स को समझने में कुछ मदद भी मिलती है।

पत्रकार अरुण पांडेय (1965-2021) पर केंद्रित किताब ‘स्मृतियों के आईने में अरुण कुमार पांडेय’ (परिकल्पना, दिल्ली) यादों/संस्मरणों से भरी किताब है। इसमें उनके संगी-साथियों और परिवारजनों ने उन्हें बड़ी शिद्दत और लगाव से याद किया है। किताब का संपादन वाम राजनीतिक ऐक्टिविस्ट कुमुदिनी पति और सह संपादन ऐक्टिविस्ट व अनुवादक अवधेश कुमार सिंह ने किया है। इसकी प्रस्तावना पत्रकार उर्मिलेश ने लिखी है।

कोरोना वायरस बीमारी की चपेट में आकर कम उम्र में अरुण पांडेय का गुज़र जाना हम सबक लिए सदमा-जैसा था। किताब में जिन्होंने अरुण पांडेय को याद किया है, उनमें लाल बहादुर सिंह, महेंद्र मिश्र, दयाशंकर राय, रामशिरोमणि शुक्ल, तारिक नासिर, प्रियदर्शन, अजीत अंजुम, रामकृपाल सिंह आदि शामिल हैं।

अपने अंतिम दिनों में अरुण पांडेय दिल्ली किसान आंदोलन (2020-21) पर एक किताब लिख रहे थे, जो अधूरी रह गयी। उसे इस संस्मरण किताब में शामिल किया गया है।

आलोचक आशीष सिंह की पहली आलोचना किताब ‘कविता की बात’ (अंतिका प्रकाशन, ग़ाजियाबाद, उ.प्र.) साहसिक, विवेकशील आलोचना का नमूना है, जहां आलोचनात्मक दृष्टि मौजूद है। (हालांकि कुछ जगहों पर यह दृष्टि धुंधला गयी है।) किताब में हिंदी के पुराने-नये कवियों पर नौ लेख हैं। लेखों के साथ उनका लेखन काल/प्रकाशन काल दे दिया गया होता, तो बेहतर रहता।

ये लेख बनी-बनायी साहित्यिक चौहद्दी तोड़ने की कोशिश करते हैं, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। लेकिन दिक़्क़त यह है कि तुलसीदास, हरिश्चंद्र (बनारस वाले), रामचंद्र शुक्ल पर बात करते हुए आशीष उसी दकियानूस चौहद्दी के अंदर चले जाते हैं और अनालोचनात्मक नज़रिया अपना लेते हैं।

पुराने कवियों में आशीष को मुक्तिबोध और त्रिलोचन बहुत पसंद हैं। किताब में मुक्तिबोध पर एक और त्रिलोचन पर दो लेख हैं। इस कड़ी में कवि शमशेर बहादुर सिंह को भी शामिल कर लिया गया होता, तो अच्छा रहता। शमशेर को न शामिल करने का कारण आशीष ने नहीं बताया है। शमशेर को मुक्तिबोध और त्रिलोचन बेहद पसंद थे, और मुक्तिबोध को शमशेर व त्रिलोचन बेहद पसंद थे।

किताब में प्रूफ़/स्पेलिंग/वाक्य विन्यास/व्याकरण की कई गलतियां हैं, जो झुंझलाहट पैदा करती हैं। ये लेखक और प्रकाशक की लापरवाही का नमूना हैं। एक-दो जगह तथ्यपरक ग़लतियां भी हैं। जैसे, पेज 66 पर केरल में ‘सन 51-52 की चुनी गयी प्रथम कम्युनिस्ट सरकार की बर्ख़ास्तगी का ज़िक्र है। जबकि तथ्य यह है कि केरल में पहली कम्युनिस्ट सरकार 1957 में बनी, जिसे 1959 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने बर्ख़ास्त कर दिया था।’

किताब की भूमिका आलोचक कर्ण सिंह चौहान ने लिखी है। यह पढ़ने और ध्यान देने लायक है। ऐसी भूमिका आम तौर पर नहीं लिखी जाती। इससे आशीष सिंह की संभावना और सीमा को समझने में मदद मिलती है। आशीष की पहली किताब उम्मीद जगाती है।

(लेखक कवि और राजनीतिक विश्लेषक हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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