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आरोग्य सेतु : एक ऐप जो किसी काम का नहीं है

‘यदि कोरोना मरीज़ों के संपर्क ढूँढने की प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी की मदद लेनी है, तो इसकी ज़िम्मेदारी सरकार पर है कि वह लोगों को इसके फ़ायदों के बारे समझाए।’
आरोग्य सेतु
Image courtesy: Twitter

महामारी हमें फौस्टियन विकल्प चुनने के लिए मजबूर कर रही है: आपकी गोपनीयता या आपका जीवन। विकल्प आपकी पसंद नहीं भी हो सकता है। भारत के डिजिटल संपर्क ट्रेसिंग तकनीक (डीसीटीटी) यानि आरोग्य सेतु बनाने वाले लोगों ने ऐप को अपनाने या उसे अस्वीकार करना आसान नहीं बनाया है। इस बारे में जो सर्व-परिचित भ्रम या आपत्ति और सरकार की हठधर्मिता और दबाव वाले दृष्टिकोण ने प्रभावी डीसीटीटी तैयार करने में भारत के प्रयास को काफी प्रभावित किया है।

यदि संपर्क ट्रेसिंग एक साबित ज़रूरत है जिसकी जरूरत महामारी के दौरान हालात से निबटने के लिए है, और डिजिटल तकनीक अन्यथा कठिन कार्य को आसान बनाने के लिए बेहतर  संभावनाएं प्रदान करती है, और, शायद उसे प्रभावी भी बनाती है, तो इस पर सवाल भी उठेंगे और उनके सहज जवाब आसानी से लोगों को इस मुहिम में जोड़ देंगे।

एक कड़े लॉकडाउन को लागू करने के साथ-साथ, जिसने आबादी को निर्धन बना दिया है,भारत सरकार ने सभी भारतीयों को आरोग्य सेतु मोबाइल ऐप को अपने स्मार्टफोन पर इंस्टॉल करने को कहा है। ऐप इंस्टॉल करने वालों को ऐप इंस्टॉल करते समय अपनी जियोलोकेशन को जोड़ने के साथ-साथ अपनी उम्र, लिंग, फोन नंबर और पेशे के बारे में सूचना दर्ज़ करनी होगी। सहज लगता है, लेकिन यह है नहीं।

यह बात मान लें कि एक "परोपकारी" और "सौम्य" भारतीय राष्ट्र के पास अपनी संकटग्रस्त आबादी का सर्वेक्षण करने का कोई इरादा नहीं है, तो भी यह "स्वास्थ्य का पुल" यानि आरोग्य एप्प एक निगरानी उपकरण ही है। इससे सरकार संभावित रूप से जान जाएगी कि प्रत्येक भारतीय कौन है, कहां रहता और क्या करता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को  व्यक्तिगत रूप से आरोग्य सेतु ऐप के गुणों के बारे में प्रचार करना पड़ा और सभी भारतीयों से जल्द से जल्द इसे इंस्टॉल करने की अपील की है। एक ट्वीट में उन्होंने कहा: कोविड़-19 के खिलाफ हमारी लड़ाई में आरोग्य सेतु एक महत्वपूर्ण कदम है। प्रौद्योगिकी के लाभ के कारण हमें महत्वपूर्ण जानकारी मिलेगी। जैसे-जैसे अधिक से अधिक लोग इसका उपयोग करेंगे, इसकी प्रभावशीलता बढ़ेगी। मैं आप सभी से इसे डाउनलोड करने का आग्रह करता हूं। ”

लेकिन इसमें यहाँ थोड़ी सी मरोड़ है। डीसीटीटी के प्रभावी होने के मामले में किए गए अध्ययन, जिसका शीर्षक 'डिजिटल कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग ऐप के प्रभावी कॉन्फ़िगरेशन: एनएचएसएक्स को एक रिपोर्ट' है के अनुसार, इस माहामारी को दबाने के लिए "80 प्रतिशत स्मार्टफोन के मालिकों द्वारा इसका उपयोग, और कुल आबादी के 56 प्रतिशत द्वारा इसका उपयोग आवश्यक है। भारत में 40 करोड़ 10 लाख .74 हज़ार स्मार्टफोन उपयोगकर्ताओं हैं, एक पूर्वानुमान के अनुसार, 130 करोड़ की आबादी में, जो कुल आबादी का करीब 50 प्रतिशत से भी नीचे बैठता है, इसलिए विकल्प के रूप में डीसीटीटी एक गैर-स्टार्टर की तरह लगता है। लेकिन इस हिचक के बावजूद, भारत सरकार ने सार्वजनिक निजी पहल में आरोग्य सेतु ऐप लॉन्च किया, जिसमें सरकार का राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र प्राथमिक डेवलपर है।

यदि व्यावसायिक रूप से लोकप्रिय ऐप्स को इंस्टॉल करने की दर ऊंची नहीं है, तो इसकी अधिक संभावना कम है कि सरकारें इसे प्रभावी बनाने के लिए तेज़ी से ऊंची दर हासिल कर लेंगी, भले ही यह अनिवार्य क्यों न हो। वास्तव में, सिंगापुर का बहुत चर्चित एप्प ट्रेसटाइट, केवल 20-25 प्रतिशत की दर पर ही सिमट कर रह गया है, और इसलिए इसकी सफलता को हासिल करने  लिए अधिक व्यापक प्रक्रिया शुरू करने को मजबूर करती है जिसमें ऑफ़लाइन पहलू भी शामिल हैं। 12 मई के बाद से, सिंगापुर ने सेफएंट्री दृष्टिकोण का उपयोग किया है।

इसकी नाकामयाबी के पीछे खुद तकनीक ही जिम्मेदार है। यह फ़ोन की लोकेशन के साथ, ब्लूटूथ तकनीक का इस्तेमाल कर अन्य ब्लूटूथ-सक्षम डिवाइस के अस्तित्व का पता लगाता है। केसी न्यूटन, द वर्ज में लिखे अपने लेख में बताता है कि क्यों ब्लूटूथ ऐप्स कोविड़-19 के नए मामलों की खोज में खराब कदम हैं। न्यूटन ने फ़रज़ाद मोस्तशरी नामक कंपनी के सीईओ से पूछा जोकि चिकित्सकों के लिए प्रबंधन का सॉफ्टवेयर बनाती है, उन्होंने बताया कि कैसे ब्लूटूथ समाधान खास नहीं है। मोशाश्री ने कहा: "अगर मैं व्यापक रूप से खुले मैदान में हूँ, तो मेरा ब्लूटूथ और आपका ब्लूटूथ एक दूसरे को पिंग कर सकते हैं, भले ही आप छह फीट से अधिक की दूरी पर हों ... आप एक अपार्टमेंट में मुझसे पीठ पीछे वाली दीवार के पास हो सकते हैं, और यह तब भी पिंग कर सकता है कि हम काफी निकट है। आप इमारत की एक अलग मंजिल पर हो सकते हैं और यह तब भी पिंग कर सकता है। आप खुले मेरी तरफ को बाइक चला कर जा रहे हो सकते हैं और यह तब भी पिंग कर सकता है।” आरोग्य सेतु ऐप का इस्तेमाल कर वाइरस के संपर्क को ढूँढने में शामिल स्वास्थ्य कर्मी इस तरह नकली पॉज़िटिव केस का पीछा कर रहे होंगे।

फिर भी, इस एप्प की कमी के बावजूद अन्य देशों ने अपनी डीसीटीटी को लॉन्च करने से नहीं रोका है। कुछ लोगों ने एप्पल और गूगल की पहल पर भरोसा किया है, जिसमें डीसीटीटी का उपयोग करने के लिए क्रमशः iOS और Android ऑपरेटिंग सिस्टम को एकीकृत किया गया है, लेकिन इससे व्यक्तियों की पहचान करना संभव नहीं है, इस प्रकार यह उच्च स्तर की गोपनीयता बनाए रखता है। लेकिन पोस्ट-स्नोडेन और कैम्ब्रिज एनालिटिका, और बिग टेक की जिस तरह से पोल खुली है, उससे लोगों को उन पर भरोसा करना मुश्किल लगता है।

चूंकि यह ऑपरेटिंग सिस्टम के स्तर पर होगा, इसलिए पृष्ठभूमि में तकनीक अधिक कुशलता से काम करेगी। ऐप्स द्वारा लोकेशन पिंग्स भी रिकॉर्ड नहीं किए गए हैं। एप्पल और गूगल चाहते थे कि डेटा को उपयोगकर्ताओं के उपकरणों पर रहने देना चाहिए और डेटा के लिए कोई केंद्रीय रिपॉजिटरी नहीं होनी चाहिए। लेकिन यूके और फ्रांस जैसे देशों ने कहा है कि यह प्रभावी विश्लेषण को रोक देगा।

डीसीटीटी के दिल में जो बेचैनी है वह गोपनीयता को लेकर है, लेकिन वे कानूनी स्तर पर भी चुनौतियों को पेश करते हैं। एक बढ़ती महामारी में, लोग अपनी गोपनीयता का त्याग करने के लिए तैयार हो सकते हैं, लेकिन सरकार को इनके बारे में सबको भरोसा दिलाना होगा कि उनके साथ कुछ अनुचित नहीं होगा। मिसाल के तौर पर, यह बताना कि ऐप का इस्तेमाल कब तक करना है? बेशक, यह इस बात पर निर्भर करता है कि महामारी कितनी देर तक रहती है। महामारी के बाद ऐप पर एकत्र किए गए डेटा के साथ सरकार क्या करेगी? इसका उल्लेख सेवा की शर्तों (ToS) में नहीं किया गया है। क्या सेवा की शर्त में (टीओएस) में कोई खंड नहीं है जो बताता हो कि ऐप का उपयोग सीमित उद्देश्य और कितने समय के लिए किया जाएगा और डेटा के उपयोग का भी स्पष्ट रूप से इसमें उल्लेख किया जाएगा? इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की एक रीडिंग के अनुसार, आरोग्य सेतु की सेवा की शर्त (टीओएस) में ऐसा कोई आश्वासन नहीं दिया गया है।

इसके उतार-चढ़ाव की चुनौती और प्रौद्योगिकी के प्रभाव के बारे में संदेह के बावजूद, ऐसे में नागरिकों को एप्लिकेशन इंस्टॉल करने की सरकार की अंधी उत्सुकता केवल उसके वास्तविक उद्देश्य पर संदेह ही पैदा करती। इस प्रकार, भले ही गृह मंत्रालय ने कहा हो कि ऐप को इंस्टॉल करना अनिवार्य नहीं है, लेकिन लोगों पर ऐप को इंस्टॉल करने का दबाव लगातार गलत ढंग से बनाया जा रहा। गुजरात सरकार ने सभी सरकारी कर्मचारियों को इसे इंस्टॉल करना अनिवार्य कर दिया है, जबकि उत्तर प्रदेश ने रेड ज़ोन में रहने वाले सभी लोगों के लिए इसे अनिवार्य बना दिया है। एयरलाइंस ने यात्रा के दौरान ऐप इंस्टॉल करना अनिवार्य कर दिया है और निजी कार्यालयों को यह कहा गया है कि वे सुनिश्चित करें कि एप्प को सभी कर्मचारियों ने डाउनलोड किया है। इंटरनेट डेमोक्रेसी परियोजना के मामले में अरोग्या सेतु एक ट्रैकर है जो ऐप के उपयोग को लागू करने वाली सभी सरकारों और संस्थानों पर कड़ी नजर रखता है। कुछ अदालतें ऐप के इस्तेमाल का आदेश भी दे रही हैं। उदाहरण के लिए, दिल्ली कोर्ट ने एक कैदी की अंतरिम जमानत को बढ़ा दिया लेकिन उसे अपने फोन पर आरोग्य सेतु इनस्टाल करने के लिए कहा है।

उच्चतम न्यायपालिका एप्प में मौजूद स्पष्ट गोपनीयता की चिंताओं से निपटने के लिए तैयार नहीं है जिसे कि इसके पटल पर लाया गया है। इस तरह के असाधारण हालत को देखते हुए, अदालतों को ऐप की गोपनीयता की चिंताओं के मामले में गुमराह किया जा सकता है, लेकिन जब आपको एक नैतिक हैकर के खतरों का सामना करना पड़ता है, और जब उसके डेटा गैपिंग पर हमला कर लेता है तो इसके प्रति सरकार का दोषपूर्ण दृष्टिकोण, चिंता का कारण बन जाना चाहिए। सरकार के वास्तविक इरादों और विश्वशनीयता का इस बात से पता चलता है कैसे वह इस एप्लिकेशन को एक ओपन-सोर्स प्रोजेक्ट बनाने की मांग पर कैसी प्रतिकृया व्यक्त करती है। 6 मई को, जाने-माने एथिकल हैकर, जो इलियट एंडरसन नाम से जाने जाते हैं, ने साबित किया कि ऐप के माध्यम से गंभीर डेटा लीक हो सकता है। एंडरसन से संपर्क करने के बाद और समस्या को ठीक करने के दावे के बाद, बाबू दल सोच लिया कि अब सब ठीक है। ऐप की सुरक्षा को लेकर बढ़ती बेचैनी को दूर करने के लिए, सबसे अच्छा काम केवल सरकार सकती थी, तब जब केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने 29 मई को घोषणा की थी कि ऐप पूरी तरह से सुरक्षित है और इसकी सुरक्षा या डेटा को धोखा नहीं दिया जा सकता है। इससे जनता की बेचैनी दूर नहीं हुई, खासकर जब से सरकार का ट्रैक रिकॉर्ड के हिसाब से लक्ष्य में बदलाव संदिग्ध बना हुआ है। इसे इस तरह से देखा जा सकता है जैसे कि आधार को देश की जनता पर जिस तरह से थोपा गया है। 

अभी तो ओर भी शर्मिंदगी उठाना बाकी थी। सरकार ने अचानक घोषणा कर दी कि लोगों को याद रखना चाहिए कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है इसलिए उसने ऐप का स्रोत कोड "जारी" कर दिया है – इसे पारदर्शिता की एक कोशिश माना जा रहा है। इंटरनेट कार्यकर्ताओं ने ट्वीट किए कि यह एक जीत है, लेकिन बाद में  पता चला कि जारी किया गया कोड वह नहीं है जिसे अधिकारियों ने सक्रिय रूप से विकसित किया था, बल्कि यह कोड का अन्य संस्करण है जिसे ओपन सोर्स समुदाय द्वारा उपयोग नहीं किया जा सकता है।

सरकार की वास्तविक मंशा पर संदेह करने के कई कारण हैं।

एक महामारी के वक़्त में डेटा का विज़ुअलाइज़ेशन करना, नॉवेल कोरोनवायर को लेकर मानवता के सामूहिक भय से अवगत तो कराएगा, यह मानवद्वेषवाद की भावना को शांत करने के लिए आवश्यक भी हो सकता है, लेकिन लोगों का वह संदेह दूर नहीं किया जा सकता है कि सरकार डीसीटीटी का दुरुपयोग करने की कोशिश कर रही है। डब्ल्यूएचओ ने नोट किया है कि वायरस के संपर्क का पता लगाना टेढ़ा काम है। यदि संपर्क ट्रेसिंग प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी की मदद लेनी है, तो अपने लोगों को आश्वाश्त करने की ज़िम्मेदारी, कि उनके अधिकारों पर कोई आंच नहीं आएगी, सरकारों की है।

गृह मंत्रालय का सशक्तीकरण समूह-9 बाबुओं के लिए एक अच्छी जगह है, जहां जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय द्वारा महामारी संबंधी प्रतिक्रिया और डिजिटल संपर्क ट्रेसिंग का मार्गदर्शन किया जाएगा। देश के भीतर एक और अच्छा कदम यह होगा कि वह उपलब्ध तकनीकी विशेषज्ञ की विशेषज्ञता का उपयोग करे, ताकि एक ऐसा ऐप विकसित और इनस्टाल किया जा सके जो अपने नागरिकों की गोपनीयता और सुरक्षा को तकनीक के दिल में रखता है। तीसरा और महत्वपूर्ण कदम उन लोगों की सुरक्षा और सुरक्षा के लिए समाधान खोजना होगा जो स्मार्टफोन का खर्च नहीं उठा सकते हैं और प्रौद्योगिकी के नेतृत्व वाली पहल से भी लाभ नहीं उठा सकते हैं।

अंग्रेज़ी में प्रकाशित मूल लेख को नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।

Aarogya Setu: The Bridge to Nowhere

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