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अंजुमन इंतज़ामिया मसाजिद कमेटी का दावा— औरंगज़ेब ने नहीं तुड़वाया था मंदिर

ज्ञानवापी से जुड़े सभी मुक़दमों की सुनवाई अब एक साथ बनारस के डिस्ट्रिक कोर्ट में होगी।
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फ़ोटो साभार: PTI

"देश महंगाई, बेरोजगारी और नोटबंदी के भीषण संकट से जूझ रहा है, जिसका निदान ढूंढने की कोशिश नहीं की जा रही है। ढूंढा जा रहा है तो कथित शिवलिंग, जिसके चक्रव्यूह में उलझकर देश सांप्रदायिकता के मुहाने पर खड़ा हो गया है।"

बनारस के ज्ञानवापी विवाद से जुड़े सभी मामलों की सुनवाई अब एक साथ जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश की अदालत में होगी। कोर्ट ने सभी मुकदमों को एक साथ क्लब करने का फैसला सुनाया है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों पक्ष ने ज्ञानवापी से जुड़े सभी मुकदमों की सुनवाई एक ही कोर्ट में करने के लिए जिला जज की अदालत में अर्जी दी थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया है। इस बीच अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने विवादित आकृति के साइंटिफिक सर्वे पर आपत्ति जताते हुए कोर्ट में जो जवाब दाखिल किया है उसमें कहा है कि विश्वेश्वर मंदिर को औरंगज़ेब ने नहीं तुड़वाया था। मुग़ल शासक पर मंदिर तोड़ने के सभी आरोप झूठे और बेबुनियाद हैं।

ज्ञानवापी के श्रृंगार गौरी की पूजा-अर्चना का अधिकार मांगने वाली चार महिला वादकारियों- राखी सिंह, रेखा, सीता, मंजू, लक्ष्मी ने दिसंबर 2022 में डिस्ट्रिक कोर्ट में अर्जी देकर सभी सात मामलों की सुनवाई एक साथ, एक ही कोर्ट में करने की मांग उठाई थी। इनमें छह मामले सिविल जज (सीनियर डिविजन) और एक अन्य केस फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रहा था। राखी सिंह की ओर से अधिवक्ता शिवम गौड़, सुभाष नंदन चतुर्वेदी, सुधीर त्रिपाठी, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से रमेश उपाध्याय और अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के अधिवक्ता रईस अहमद ने जिला जज की अदालत में पेश होकर सभी मुकदमों को क्लब करने की अपील की। इनका कहना था कि न्यायिक प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए सभी मुकदमों की सुनवाई एक ही अदालत में हो, ताकि किसी तरह की संशय की स्थिति पैदा न हो। याचिकाकर्ताओं का यह भी कहना था कि सभी मुकदमों की प्रकृति एक जैसी है। सभी मुकदमों का उद्देश्य एक है। सभी मुकदमे एक साथ चलेंगे तो समय की बचत होगी। इससे मतभेद और भ्रम की स्थिति भी पैदा नहीं होगी।

जिला जज डॉ. अजय कृष्ण विश्वेश ने याचियों की अर्जी स्वीकार करते हुए सभी मामलों की सुनवाई खुद करने का आदेश जारी किया। हालांकि बाद में मीडिया से बात करते हुए हिन्दू पक्ष के अधिवक्ता सुभाष चतुर्वेदी ने दावा किया, "डिस्ट्रिक कोर्ट का फैसला हमारे पक्ष में आया है। हम लंबे समय से मांग कर रहे थे कि सभी मुकदमों की सुनवाई एक ही अदालत में हो। कोर्ट ने हमारी याचिका को स्वीकार करते हुए एक साथ क्लब करने आदेश जारी किया है। ज्ञानवापी से जुड़े सभी मामले एक ही प्रकृति के हैं। राखी सिंह के मुकदमे को लीड मानते हुए इसी केस के तहत सभी मामलों की सुनवाई होगी।"

कहां है विवाद की जड़

श्रृंगार गौरी की पूजा-अर्चना से जुड़े मामले का पेच अब कथित शिवलिंग और फव्वारा विवाद में फंसकर रह गया है। हिन्दू पक्ष इस दावे पर अड़ा हुआ है कि ज्ञानवापी मस्जिद के वुजूखाने में मिली आकृति शिवलिंग है, जबकि मुस्लिम पक्ष उसे पुराना फव्वार बता रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कुछ रोज पहले विवादित आकृति के साइंटिफिक सर्वे और कार्बन डेटिंग के लिए बनारस डिस्ट्रिक कोर्ट को जिम्मेदारी सौंपी थी। बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए रोक लगा दी कि इस मामले में संभलकर चलने की जरूरत है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश की गहन जांच-पड़ताल करने की जरूरत है।

हिन्दू पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन का दावा है कि गुंबद के नीचे मंदिर के शिखर हैं। वह कहते हैं, जिस स्थान पर ज्ञानवापी मस्जिद है वहां पहले आदि विश्वेश्वर का मंदिर था, जिसे मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने तुड़वा दिया था। मां श्रृंगार गौरी का मंदिर विवादित ज्ञानवापी परिसर के पीछे है। वहां अवैध निर्माण कर मस्जिद बनाई गई है। मस्जिद के वजूखाने में जो आकृति मिली है वह वस्तुतः शिवलिंग है, जिसके ऊपर पांच खांचे बने हैं। लगता है कि शिवलिंग के साथ छेड़छाड़ की गई है। शिवलिंग के नीचे क्या है, उसकी जांच-पड़ताल जरूरी है। हम 38 साल से ज्ञानवापी की मुक्ति के लिए लड़ रहे हैं। हम यही चाहते हैं कि सर्वे के बाद अगर नीचे चीजें मिलती हैं तो खुदाई का आदेश जारी किया जाए और वहां बाबा आदि विश्वेश्वर का भव्य मंदिर बनाया जाए। सर्वे नॉन डिस्ट्रक्टिव मेथड से डेटिंग कराई जाए और शिवलिंग को तोड़ा न जाए।"

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साइंटिफिक जांच का विरोध

अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी ने हिन्दू पक्ष के साइंटिफिक सर्वे की दलील पर बनारस के डिस्ट्रिक कोर्ट में अपना पक्ष रखा है और कहा कि ऐसी जांचें निष्पक्षता की कसौटी पर खरी नहीं उतर सकतीं। मुस्लिम पक्ष की ओर से दाखिल जवाब में कहा गया है कि हिन्दू पक्ष की यह धारणा सरासर गलत है कि पुराने मंदिर को मुसलमान आक्रमणकारी ने तोड़ दिया था। यह आरोप भी बेबुनियाद है कि साल 1669 में आदि विश्वेश्वर मंदिर को मुग़ल शासक औरंगज़ेब ने तुड़वाया था। बनारस में दो काशी विश्वनाथ मंदिर नहीं थे। हिन्दू पक्ष ने अभी तक दो विश्वनाथ मंदिरों के वजूद को न तो प्रमाणित किया है और न ही इस बाबत कोई अभिलेखीय साक्ष्य कोर्ट में पेश किया है।

मुस्लिम पक्ष के मुताबिक, '' काशी विश्वनाथ परिसर में मौके पर मौजूद ज्ञानवापी मस्जिद पहले से ही मुसलमानों की इबादतगाह रही है। वह पहले भी मस्जिद थी और आज भी मस्जिद है। पूर्वांचल और पश्चिमी बिहार से मुस्लिम समुदाय लोग कारोबार के सिलसिले में बनारस आते थे तो इसी मस्जिद में नमाज अदा करते थे। यहां लगातार धार्मिक आयोजन होता आ रहा है। अधिवक्ता सर्वे के दौरान 16 मई, 2022 को वजूखाने में जो आकृति मिली है, वह शिवलिंग नहीं, फव्वारा है।''

औरंगज़ेब पर कितने सवाल?

दूसरी ओर, बनारस के गजेटियर का हवाला देते हुए हिन्दू पक्ष दावा कर रहा है कि इसके पेज संख्या 57 पर कहा गया है कि नौ अप्रैल 1669 को औरंगज़ेब ने अपने प्रादेशिक गवर्नर को फरमान जारी किया था कि काशी के मंदिरों और संस्कृत स्कूलों को नष्ट कर दें। यूपी सरकार की ओर से प्रकाशित गजेटियर में बेनी माधव मंदिर के ध्वस्तीकरण का भी जिक्र किया गया है। गजेटियर में इस बात का भी उल्लेख है कि साल 1669 में औरंगज़ेब के आदेश पर दोनों मंदिरों को गिराया गया था। गजेटियर के 10वें पृष्ठ पर जिले का प्रशासनिक नाम वाराणसी किए जाने की तिथि 24 मई 1956 अंकित है। यह गजेटियर इलाहाबाद के सरकारी प्रेस छपा था, जिसमें पेज संख्या 25 से 77 तक बनारस का इतिहास दर्ज है।

औरंगजेब का फरमान

दूसरी ओर, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि इतिहास के पन्नों से उन भ्रांतियों को भी दूर किया जाना जरूरी है जो बनारस के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय परिसर के कला भवन की गैलरी में सनद के तौर पर मौजूद है। औरंगज़ेब का एक दुर्लभ फरमान वहां आज भी मौजूद है। मुग़ल शासक द्वारा जारी फ़ारसी भाषा का फरमान इस बात का संकेत करता है कि औरंगज़ेब को ब्राह्मणों के प्रति काफी लगाव था। उस समय बनारस का दीवान अबुल हसन था, जिसको औरंगज़ेब ने मंदिर और पुजारियों की हिफाजत के बाबत फरमान जारी किया था, जिस पर मुग़ल शासन की शाही मुहर भी लगी हुई है। कला भवन में इसका हिन्दी रुपांतरण भी मौजूद है।"

औरंगज़ेब ने वाराणसी में तैनात अपने सिपहसलार को संबोधित करते हुए फारसी भाषा में जो फरमान जारी किया था इस प्रकार है, "अब्दुल हसन को यह जानकारी हो...हमारे धार्मिक कानून द्वारा यह निर्णय किया गया है कि पुराने मंदिर न तोड़े जाएं एवं नए मंदिर भी न बनाए जाएं। इन दिनों हमारे आदर्श और पवित्र दरबार में यह खबर पहुंची है कि कुछ लोग द्वेष एवं वैमनस्यता के कारण बनारस और उसके आसपास के क्षेत्रों में कुछ ब्राह्मणों को परेशान कर रहे हैं। साथ ही मंदिर की देखभाल करने वाले ब्राह्मणों को उनके पदों से हटाना चाहते हैं, जिससे उस संप्रदाय में असंतोष पैदा हो सकता है। इसलिए हमारा शाही आदेश है कि फरमान के पहुंचते ही तुम्हें यह चेतावनी दी जाती है कि भविष्य में ब्राह्मणों और अन्य हिन्दुओं को किसी तरह के अन्याय का सामना न करना पड़े। इस प्रकार से सभी शांतिपूर्वक अपने व्यवसायों में लगे रहें एवं हमारे अल्लाह द्वारा दिए गए साम्राज्य (जो हमेशा बरकरार रहेगा) में पूजा-पाठ करते रहें। इस पर शीघ्रातिशीघ्र विचार होना चाहिए।"

औरंगज़ेब की हुकूमत के दस्तावेजों के मुताबिक बनारस के मंदिरों और पुजारियों को लेकर मुग़ल शासक औरंगज़ेब का शाही फरमान 15 जुम्द-स-सनिया हिजरी 1069 (1658-59 ई.) में जारी किया गया था। बनारस के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के इतिहास, विभाग के अध्यक्ष रहे प्रोफेसर परमानंद सिंह के मुताबिक, "औरंगज़ेब ईमानदार शासक था, लेकिन उसके बारे में अनेक गलतफहमियां हैं, क्योंकि वह जिद्दी स्वभाव का था। वह शाही खजाने से अपने व्यक्तिगत खर्च और भोजन के लिए धन नहीं लेता था। औरंगज़ेब एक अच्छा कलाकार भी था। वह टोपी बनाता था और उसे बेचने पर जो आमदनी होती थी उसी से अपना खर्च चलाता था।" प्रो. परमानंद सिंह का यह आलेख बनारस के दैनिक जागरण में 17 सितंबर 2005 को प्रकाशित हुआ था।

हिन्दुओं का दुश्मन नहीं था औरंगज़ेब

उड़ीसा के पूर्व राज्यपाल और इतिहासकार प्रो. बीएन पांडेय अपनी किताब ‘भारतीय संस्कृति और मुग़ल साम्राज्य’ लिखते हैं, "औरंगज़ेब ने अपना सारा जीवन राष्ट्रीय एकता के लिए प्रयासरत होकर गुज़ारा। इस मुग़ल शासक को तमाम ऐतिहासिक शोध के लिए भी जाना जाता है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर, चित्रकूट के बालाजी मंदिर, गुवाहाटी के उमानंद मंदिर, शत्रुंजाई के जैन मंदिर और उत्तर भारत में फैले हुए अन्य प्रमुख मंदिरों और गुरुद्वारों से संबंधित जागीरों के लिए औरंगज़ेब के फरमानों की कई नकलें अब भी मौजूद हैं। ये फरमान साल 1659 से 1685 इसवीं के बीच जारी किए गए थे। औरंगज़ेब पर अंग्रेजों ने हिन्दुओं के दुश्मन के तौर पर झूठे आरोप गढ़े थे। वैसे भी इस्लाम के नियम के अनुसार मस्जिद को इबादत करने के लिए न बनाकर किसी अन्य गलत कार्य को करने के उद्देश्य से बनाने, जिस मस्जिद को बनाने में अल्लाह को खुश करने की नीयत न हो या अपवित्र धन से मस्जिद बने, इस पर सख्त मनाही है।"

वरिष्ठ पत्रकार पवन मौर्य कहते हैं, "अगर मुग़ल गलत मानसिकता के होते और गलत तरीके शासन किए होते तो वह अपना सेनापति हमेशा हिन्दू ही क्यों रखते? राजनीति के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों को हमेशा लड़ाया जाता रहा, क्योंकि नफरत की आड़ में कोई भी आसानी से आस्था और ईमान की चादर ओढ़ सकता है। नीयत साफ होती और मामला सिर्फ श्रृंगार गौरी के दर्शन-पूजन तक सीमित होता तो इस मामले को सुनियोजित तरीके से ज्ञानवापी मस्जिद-मंदिर के विवाद में नहीं बदला गया होता।"

" साफ सच तो यह है कि आरएसएस, भाजपा और उसके अनुसांगिक संगठनों ने गोदी मीडिया के साथ मिलकर इस मामले को सनसनीखेज बना दिया है। जिस तरह के उपासना कानून का माखौल उड़ाया जा रहा है उससे कुछ कानूनविदों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। देश महंगाई, बेरोजगारी और नोटबंदी के भीषण संकट से जूझ रहा है, जिसका निदान ढूंढने की कोशिश नहीं की जा रही है। ढूंढा जा रहा है तो कथित शिवलिंग, जिसके चक्रव्यूह में उलझकर देश सांप्रदायिकता के मुहाने पर खड़ा हो गया है। आज जरूरत इस बात की है हम मोहब्बत का हक अदा करें और समाज में अच्छा इनसान पैदा करने की कोशिश करें।"

(लेखक बनारस स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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