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ज्ञानवापी केसः डिस्ट्रिक कोर्ट ने ASI को सर्वे रिपोर्ट सौंपने के लिए 17 नवंबर तक की मोहलत दी

एएसआई को पहले छह अक्टूबर तक रिपोर्ट देनी थी, लेकिन बाद में उसे तीन नवंबर तक इसे जमा करने का समय दिया गया था।
gyanvapi

उत्तर प्रदेश के वाराणसी की अदालत ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के वैज्ञानिक सर्वे की रिपोर्ट सौंपने के लिए 17 नवंबर तक का वक्त दिया है। केंद्र सरकार के अधिवक्ता अमित श्रीवास्तव गुरुवार को एएसआई की  ओर से जिला जज ए. के. विश्वेश की अदालत में पेश हुए और एएसआई रिपोर्ट पेश करने के लिए कुछ और समय की देने की मांग की।

अधिवक्ता अमित श्रीवास्तव ने कोर्ट को बताया कि ज्ञानवापी परिसर में सर्वे का काम पूरा कर लिया है, लेकिन सर्वे की रिपोर्ट बनाने में कुछ और समय लग सकता है। सर्वे के लिए इस्तेमाल किए गए उपकरणों की रिपोर्ट संकलित करने में कुछ और वक्त लग सकता है। एएसआई ने जिला अदालत से रिपोर्ट सौंपने के लिए अतिरिक्त समय की मांग की है। एएसआई की अर्जी पर सुनवाई करते हुए बनारस के जिला न्यायाधीश एके विश्वेश की अदालत ने सर्वे रिपोर्ट जमा करने के लिए 17 नवंबर तक का समय दिया है। एएसआई को पहले छह अक्टूबर तक रिपोर्ट देनी थी, लेकिन बाद में उसे तीन नवंबर तक इसे जमा करने का समय दिया गया था।

21 जुलाई को हुआ सर्वे का आदेश

वाराणसी के डिस्ट्रिक कोर्ट ने 21 जुलाई 2023 को ज्ञानवापी परिसर का सर्वे कर चार अगस्त तक पूरा कर रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया था। 24 जुलाई को सर्वे शुरू होने के बाद पहले उच्चतम न्यायालय और फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश से तीन अगस्त तक सर्वे का काम ठप रहा। इसके बाद एएसआई ने सर्वे का काम पूरा करने के लिए चार हफ्ते का और वक्त मांगा। अदालत ने 05 अगस्त 2023 को सर्वे रिपोर्ट पेश करने के लिए चार हफ्ते का और समय दिया था। उसके बाद अदालत ने 08 सितंबर 2023 को एएसआई को सर्वे का काम पूरा करने के लिए चार हफ्ते का समय और दिया था।

दूसरी ओर, ज्ञानवापी परिसर में स्थित व्यास जी के परिवार की ओर से तहखाना को जिलाधिकारी को सुपुर्द किए जाने के मामले की आज सुनवाई शुरू हुई। बाद में कोर्ट ने सुनवाई की अगली तिथि 8 नवंबर तय की। कोर्ट ने अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी को छह नवंबर तक आपत्ति दाखिल करने का निर्देश दिया है।

क़रीब 350 साल पुराना है विवाद

ज्ञानवापी मस्जिद का विवाद करीब साढ़े तीन सौ साल पुराना है। हिंदू पक्ष का कहना है कि साल 1669 में औरंगजेब के आदेश पर मंदिर ध्वस्त करके मस्जिद बनाई गई। साल 1936 में ज्ञानवापी मस्जिद के स्वामित्व पर बहस आगे बढ़ी। उसी समय तीन मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र को मस्जिद का हिस्सा घोषित करने की मांग की। सुनवाई में मुस्लिम पक्ष को ज्ञानवापी में नमाज अदा करने की अनुमिति दी गई। साल 1942 में इस फैसले के खिलाफ हिंदू पक्ष ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन उन्हें झटका लगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट में साल 1942 में निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा और याचिका खारिज कर दी। काफी वक्त गुजर जाने के  बाद साल 1991 में ज्ञानवापी का फिर सुर्खियों में आया। उसी  साल स्वयंभू भगवान विश्वेश्वर के नाम पर फिर से एक नया मुकदमा दाखिल किया गया। इसमें मस्जिद को पूजा स्थल विशेष प्रावधान अधिनियम के लागू न होने की बात कहते हुए पुरातन मंदिर का हिस्सा बताया गया। साल 2019 में भगवान विश्वेश्वर की ओर से अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने वाराणसी जिला अदालत में अपील करते हुए पूरे क्षेत्र के सर्वेक्षण की मांग की, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया और 2020 में सर्वेक्षण की मांग खारिज होने के बाद हाईकोर्ट ने इस पर स्टे को आगे नहीं बढ़ाया।

साल 2021 में पुरातत्व सर्वेक्षण की मांग उठी तो सुन्नी सेंट्रल बक्फ बोर्ड और अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी ने विरोध किया। हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद सर्वे पर अंतिम रोक लगा दी। 18 अप्रैल 2021 में मामले में नया मोड़ आया और राखी सिंह समेत चार अन्य महिलाओं जिसमें लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक ने यहां मौजूद श्रृंगार गौरी मंदिर में नियमित दर्शन पूजन की अनुमति मांगी। 16 मई को हिंदू पक्ष ने वजूखाने में मिली विवादित आकृति को शिवलिंग बताया। जुलाई 2023 को ज्ञानवापी परिसर में सर्वे का आदेश दिया गया।

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