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हरियाणा हिंसा : नायब इमाम साद को पकड़नी थी घर जाने की ट्रेन, उससे पहले कर दी गई उनकी हत्या

“मस्जिद की सुरक्षा के लिए पुलिस और निजी गार्ड बाहर तैनात हैं। इसलिए कोई चिंता मत करो और सो जाओ... मैं कल सुबह आऊंगा'' - ये शब्द बिहार के सीतामढ़ी ज़िले में अपने परिवार से कहे गए उनके आख़िरी शब्द थे।
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फ़ोटो : PTI

गुरुग्राम (हरियाणा)/नई दिल्ली: अगर हरियाणा के गुरुग्राम के सेक्टर 57 में अंजुमन मस्जिद के नायब इमाम (प्रमुख इमाम के बाद इबादत कराने वाले) मोहम्मद साद आज जीवित होते, तो वे बिहार में अपने घर में होते। उनके पास आनंद विहार-मुजफ्फरपुर सप्त क्रांति एक्सप्रेस का कन्फर्म बोर्डिंग टिकट था और उन्हें 1 अगस्त को दोपहर 2:50 बजे ट्रेन पकड़नी थी।

जब 31 जुलाई की दोपहर को ब्रज-मंडल यात्रा के दौरान झड़पों के बाद मेवात के नूंह जिले में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी, तो साद के सेल फोन पर उसके बड़े भाई और बहन के कॉल आने की जैसे बाढ़ सी आ गई, जिनकी आशंका थी कि नूंह की घटना का असर गुरुग्राम में भी हो सकता है। 

उत्तरी बिहार के सीतामढी जिले के एक गाँव मनियाडीह के निवासी, लगभग 20 वर्ष के मौलवी साद ने रिशतेदारों को समझाया कि वे ज़्यादा न सोचें और चिंता न करें। “हम सुरक्षित हैं, यहाँ कोई समस्या नहीं है। बिजली गुल है, लेकिन मस्जिद के बाहर पुलिस तैनात कर दी गई है।  मस्जिद की सुरक्षा के लिए निजी गार्ड भी मौजूद हैं। तो, चिंता मत करो और सो जाओ। मैं भी सोने जा रहा हूं। मैं कल सुबह घर आने के लिए निकलूँगा।”

जैसा कि उनके बहनोई, गुलाम रसूल ने बताया कि 31 जुलाई की रात लगभग 11:30 बजे उनके भाई शादाब अनवर को कहे गए उनके आखिरी शब्द थे, जो गुरुग्राम में कहीं और रहते हैं और एक नायब इमाम हैं और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाते हैं। साद के भाई ने कहा कि यह उसका कर्तव्य है कि वह मुख्य इमाम की वापसी तक परिसर न छोड़े, जो शहर से बाहर थे और 3 जुलाई को वापस आने वाले थे। 

लेकिन उन्हें क्या पता था कि ट्रेन पकड़ने के जगह उनका मृत शरीर किसी एम्बुलेंस में अपनी आखिरी यात्रा कर रहा होगा और वापस नहीं लौटेगा। उनके रिश्तेदारों ने न्यूज़क्लिक को बताया कि लगभग 60 लोगों की भीड़ ने 1 अगस्त की सुबह गुरुग्राम मस्जिद पर हमला किया, कई गोलियाँ चलाईं गई जो उनकी छाती और कनपटी पर लगीं, धारदार हथियारों के ज़रिए क्रूर हमला किया गया, जिसमें तीन अन्य घायल हो गए थे और मस्जिद में आग लगा दी गई। अस्पताल ने साद को मृत घोषित कर दिया, जहां उसे अन्य घायलों के साथ इलाज के लिए ले जाया गया था।

“शादाब भाई का सेल फोन रात करीब 1:30 बजे बजा। यह फोन साद के नंबर से आया था। फोन करने वाले ने उन्हें घटना की जानकारी दी और मस्जिद पहुंचने को कहा। इसे एक शरारत या नुकसान पहुंचाने की कोई साजिश मानते हुए, हमने घर से बाहर निकलने से पहले जानकारी की पुष्टि करने का फैसला किया,” रसूल ने 2 जुलाई की दोपहर को मनियाडीह से फोन पर न्यूज़क्लिक को बताया कि वह अभी-अभी मृतक को दफ़नाकर लौटा था। 

जब वे मस्जिद मेनेजमेंट और स्थानीय परिचितों को फोन करने में व्यस्त थे, तो लगभग 2:30 बजे एक फोन आया जिसने उन्हें अंदर तक हिला कर रख दिया। इस बार, यह फोन किसी अस्पताल से था। उन्होंने याद करते हुए कहा, "पहले हमसे साद के शरीर का विस्तृत वर्णन देने को कहा और फिर बताया गया कि वह अब इस दुनिया में नहीं रहे।"

शादाब ने कहा कि, “वास्तव में हमें यह उम्मीद नहीं थी। जानकारी को पचाना कठिन था।  कुछ समय के लिए, शादाब भाई और मैं पूरी तरह से मौन हो गए, आंसु रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। शादाब के लिए सबसे कठिन काम उसके माता-पिता और बहन को जानकारी देना था। 

“मैं अपनी पत्नी के पास जाकर उसे यह बताने की हिम्मत कैसे कर सकता था कि उसका सबसे छोटा भाई, जो उसके बेटे समान था, अब नहीं रहा। वह रात भर सो नहीं पाई थी और पूरी रात उसकी सलामती के लिए इबादत करती रही। लेकिन आख़िरकार मुझे उसे बताना पड़ा और मैंने उसे सुबह लगभग 7:30 बजे बताया कि साद अब नहीं रहा। इससे बड़ी दुख की बात क्या हो सकती थी कि मेरे पास उसे सांत्वना देने के लिए शब्द नहीं थे।''  

उन्होंने बताया कि खबर सुनने के बाद वह बार-बार बेहोश हो रही थी। रसूल का सदमा यहीं ख़त्म नहीं हुआ। अब उसे साद के माता-पिता को भी सूचना देनी थी। “मैंने अपने ससुर को फोन किया, लेकिन वह मेरी सास के इलाज के लिए घर से बाहर आगे हुए थे। फिर मैंने एक रिश्तेदार को फोन किया जिसके घर पर वे ठहरे हुए थे और उन्हे इसके बारे में बताया। बुजुर्ग माता-पिता अभी भी इस बात को पचा नहीं पाए हैं कि साद अब नहीं रहे।'' 

मृतक युवक एक साधारण पृष्ठभूमि से था और पांच लोगों (तीन अविवाहित बहनों और उनके माता-पिता) के परिवार का एकमात्र कमाने वाला था। वित्तीय संकट के कारण, उन्हें आलिमियत पाठ्यक्रम (स्नातक के बराबर) को छोड़ना पड़ा - जिसे वह एक स्थानीय मदरसे, हिफ़्ज़-ए-कुरान (पवित्र कुरान को याद करना) पूरा करने के बाद कर रहे थे।

रसूल ने बताया कि, "वह अपने परिवार का आर्थिक समर्थन करने के लिए सिर्फ छह महीने पहले अंजुमन मस्जिद में शामिल हुआ था।" उन्होंने बताया कि बड़े भाई (शादाब) शादीशुदा हैं और उनके बच्चे हैं जिनके साथ वह गुरुग्राम में रहते हैं। "वे आर्थिक रूप से इतने संपन्न नहीं हैं कि वे दो परिवारों का खर्च उठा सकें।” 

'एक नहीं, कई गोलियां चलीं'

मौलवी के मामा इब्राहिम अख्तर, जो उसके शव को नहलाने में शामिल थे, ने न्यूज़क्लिक को बताया कि मृतक के सीने पर कई गोलियों के घाव थे। उन्होंने कहा कि, “एक गोली उसकी कनपटी पर भी लगी थी। इसके अलावा, शरीर पर कई चोटें थीं जैसे कि उस पर तेज वस्तुओं से हमला किया गया हो।”

साद बिहार के अररिया के एक अन्य कर्मचारी के साथ मस्जिद परिसर के एक कमरे में सो रहा था, उसके भी पैर, कमर और गर्दन के ऊपर गोली लगी है। वह गुरुग्राम स्थित अस्पताल में गहन चिकित्सा इकाई में दाखिल है। तीन अन्य लोगों पर हमला किया गया, लेकिन उन पर गोली नहीं चलाई गई। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि, "दूसरे कमरे में जहां वे सो रहे थे, एक गैस सिलेंडर में विस्फोट करने के लिए आग लगा दी गई थी।"

‘न्याय’ के लिए गुहार

मनियाडीह में 'न्याय' मांगने आवाज़ें गूंज रही है। ''मेरे बेटे का क्या कसूर था? भीड़ ने उन पर हमला क्यों किया, मस्जिद के अंदर मौजूद अन्य लोगों पर क्यों नहीं? मुझे इंसाफ चाहिए। मुझे सरकार से और कुछ नहीं चाहिए,'' साद के निराश पिता मुश्ताक ने कहा, उन्हें अपने बेटे के खिलाफ ''साजिश'' की बू आ रही है।

वे अपने दो बेटों को लेने के लिए मुजफ्फरपुर जाने की योजना बना रहे थे, जो तय कार्यक्रम के अनुसार ट्रेन से आने वाले थे। शोक संतप्त व्यक्ति को अभी भी अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा है, जिन्होंने अपने जवान बेटे के शव को शव-वहान से आते हुए देखा। एक युवा उप इमाम, जो एक वीडियो में हिंदू-मुस्लिम सौहार्द की इबाबादत करते हुए देखा गया,  वही इमाम मंगलवार को एक मस्जिद में आग लगाने के बाद मार दिया गया। मिलेनियम सिटी के नाम से जाना जाने वाला गुरुग्राम उपनगर, राजधानी में प्रधानमंत्री के आवास से बमुश्किल एक घंटे की दूरी पर है।

मौलवी सांप्रदायिक सौहार्द कायम रखना चाहते थे 

रसूल द्वारा साझा किए गए एक वीडियो में, साद को एक शेर पढ़ते हुए देखा गया – खुदा से एक ऐसा भारत बनाने की इबादत करना जहां हिंदू और मुस्लिम सौहार्दपूर्वक रहें। शेर इस प्रकार है: "हिंदू-मुस्लिम बैठ के खाएं एक थाली में, ऐसा हिंदुस्तान बना दे या अल्लाह"

'जय श्री राम' के नारे

पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 148, 149, 153-ए, 186, 302, 307,323, 353, 427, 436 और 452 के तहत 11 नामित व्यक्तियों और 90100 अज्ञात लोगों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) (आईपीसी) और शस्त्र अधिनियम की धारा 25 (आई-बी)(ए) के तहत दर्ज़ किया गया है।

न्यूज़क्लिक के पास मौजदु एफआईआर में कहा गया है कि 90-100 हथियारबंद लोगों ने रात करीब 12:15 बजे 'जय श्री राम' के नारे लगाते हुए अंजुमन मस्जिद को घेर लिया और तोड़फोड़ की। उन्होंने वहां मौजूद पुलिस पार्टी पर पथराव और फायरिंग की। हिंसक भीड़ की संख्या पुलिस से अधिक थी और भीड़ ने मस्जिद में आग लगा दी। उनमें से कुछ लोग मस्जिद में घुस गए और गोलियां चला दीं।'' 

एफआईआर में कहा गया है कि गोलियां साद और खुर्शीद आलम (बिहार के अररिया जिले के जोकीहाट के निवासी) को लगीं। दोनों को इलाज के लिए भेजा गया। दो अन्य-मोहम्मद इज़हार (उत्तर प्रदेश के बलिया से) और शहाबुद्दीन (उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से) - को मस्जिद के अंदर से बचा लिया गया। इसमें कहा गया है कि, ''गंभीर रूप से घायल साद की अस्पताल में मौत हो गई, इज़हार का इलाज चल रहा है।''

एक पैट्रन 

एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स के नदीम खान का मानना है कि मेवात और आसपास के इलाकों में हिंसा "घृणारत अपराधों" की कोई नई घटना नहीं है, नदीम खान ने साद के शव को बिहार ले जाने के लिए एक एम्बुलेंस की व्यवस्था की थी, और उस कहानी को खारिज कर दिया ज्सिमे कहा जा रहा है कि नूंह में जुलूस पर "हमले" के बाद दंगे भड़क उठे थे। 

“एक जुलूस जिसमें दूसरे धर्म को निशाना बनाते हुए बेहद आपत्तिजनक नारे लगाए जाते हैं, उसे धार्मिक जुलूस कैसे कहा जा सकता है और जुलूस में हथियार लहराने वालों को भक्त कैसे बताया जा सकता है?” उन्होंने पूछा, और आरोप लगाया कि पुलिस ने अत्यधिक उकसावे की तरफ आंखें मूंद लीं थीं, जिसके कारण यह हिंसा हुई।

कुख्यात गौरक्षक मोनू मानेसर, जो जुनैद और नासिर की क्रूर हत्याओं का मुख्य आरोपी है और एक अन्य गौरक्षक बिट्टू बजरंगी के नफरत भरे भाषण फेसबुक पेज से प्रसारित किए जा रहे थे और कई लोगों द्वारा उन्हे साझा किया जा रहा था, जिससे दूसरे पक्ष को उकसाया जा रहा था लेकिन पुलिस ने आंखें मूंद लीं थीं।

सोश्ल मेडिया से “ऐसे पोस्ट क्यों नहीं हटाए गए, और इसमें शामिल लोगों को हिरासत में क्यों नहीं लिया गया? पुलिस की जानबूझकर निष्क्रियता और हरियाणा के गृह मंत्री अनिल विज द्वारा मानेसर का महिमामंडन बहुत कुछ कहता है। इसलिए, हम कह रहे हैं कि नूंह की घटना एक पैटर्न है और हिंसा की एक अलग घटना नहीं है।”

नदीम खान ने कहा कि अगर पीड़ित परिवार यह सुनिश्चित करने के लिए अपनी सहमति देते हैं कि घायलों और मृतकों के परिजनों को पर्याप्त मुआवजा दिया जाए और दोषियों को सजा दी जाए तो एपीसीआर कानूनी लड़ाई लड़ेगी।

अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें:

Haryana Violence: Cleric Saad was to Board Train for Home Hours After he was Killed

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