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बांग्लादेश: महिला कपड़ा श्रमिकों का आंदोलन एक बार फिर पकड़ रहा ज़ोर!

बांग्लादेश में कपड़ा श्रमिक बीते लंबे वक़्त से न्यूनतम वेतन के रूप में 20,390 टका (भारतीय रुपये में 15,474) समेत कई मांगों को लेकर सघर्ष कर रहे हैं। श्रमिकों का ये आंदोलन एक बार फिर ज़ोर पकड़ रहा है।
bangladesh protest
फ़ोटो साभार : REUTERS

बांग्लादेश में महिला रेडीमेड गारमेंट (RMG) श्रमिकों के आंदोलन में एक नया उछाल देखा जा रहा है। ये हज़ारों कार्यकर्ता रविवार, 19 नवंबर 2023 को राष्ट्रीय राजधानी ढाका में जातीय प्रेस क्लब (National Press Club) के सामने एक मानव श्रृंखला में खड़े हुए। मानव श्रृंखला का आयोजन बांग्लादेश गारमेंट वर्कर्स फेडरेशन (BGWF) और इंडस्ट्रीऑल बांग्लादेश काउंसिल द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था।

प्रदर्शनकारियों की एक ही मांग थी। वे कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी पर तत्काल रोक लगाने की मांग कर रहे थे। दरअसल, बांग्लादेश के कपड़ा श्रमिक 13 अक्टूबर से हड़ताल कर रहे थे। हड़ताल के कारण लगभग 150 आरएमजी (RMG) इकाइयां बंद हो गईं। वे अधिक न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे थे। वर्तमान में, कपड़ा श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन 8000 टका (भारतीय मुद्रा में 6080 रुपये) तय किया गया है, और श्रमिकों को विभिन्न प्रकार के काम के लिए विभिन्न इकाइयों में बतौर बाज़ार, वेतन 8500 टका से 10,000 टका के बीच मिल रहा है। वे न्यूनतम वेतन के रूप में 20,390 टका (भारतीय रुपये में 15,474) की मांग कर रहे थे। नियोक्ता और सरकार इस पर सहमत नहीं थे।

30 अक्टूबर, 2023 को लगभग 25,000 हड़ताली कर्मचारी पुलिस से भिड़ गए, जब पुलिस ने उनकी रैली पर आंसू गैस छोड़ा और उन पर लाठीचार्ज किया। इस दौरान दो मज़दूरों की मौके पर ही मौत हो गई और तीसरे मज़दूर की बाद में अस्पताल में मौत हो गई। गुस्साए मज़दूरों ने 40 कपड़ा फैक्ट्रियों में तोड़फोड़ की। सैकड़ों कार्यकर्ताओं को गिरफ़्तार किया गया और 11,000 कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ मामले दर्ज किये गये। लेकिन दमन ने श्रमिकों के प्रतिरोध को कम नहीं किया।

श्रमिकों के विरोध का सामना करते हुए, बांग्लादेश सरकार ने एक आरएमजी वेज बोर्ड (RMG Wage Board) नियुक्त किया। वेतन बोर्ड ने 9 नवंबर, 2023 को न्यूनतम वेतन के रूप में 12,500 बांग्लादेश टका प्रति माह (9500 भारतीय रुपये या यूएस के 116 डॉलर के बराबर) की घोषणा की। अधिकांश हड़ताली श्रमिकों ने इस पर अपनी सहमती नहीं जताई। इसके बाद इन श्रमिकों का संघर्ष जारी रहा और साथ ही दमन और गिरफ़्तारियां भी जारी रहीं। 19 नवंबर, 2023 की मानव श्रृंखला, तमाम गिरफ़्तारियों के सिलसिले को समाप्त करने और मामलों को वापस लेने के साथ-साथ उनके वेतन और कार्यस्थल सुरक्षा में सुधार की मांग करने के लिए थी।

विरोध प्रदर्शन स्थल के रूप में प्रेस क्लब का चयन यूनियनों की ओर से एक सटीक फैसला था। राष्ट्रीय राजधानी में स्थित घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मीडिया द्वारा लाइव कवरेज की वजह से ही आज श्रमिकों का ये विरोध प्रदर्शन अंतरराष्ट्रीय पटल पर सबके सामने है। बांग्लादेश का श्रमिक आंदोलन विकासशील देशों के श्रमिक आंदोलनों में सबसे अधिक अंतरराष्ट्रीयकृत आंदोलन है। वास्तव में, एक अंतरराष्ट्रीय संघ ही है - जिनेवा स्थित इंडस्ट्रीऑल - जिसने बांग्लादेश के गार्मेंट वर्कर्स को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नीदरलैंड स्थित क्लीन क्लोद्स कैम्पैन (Clean Clothes Campaign) बांग्लादेश के गार्मेंट वर्कर्स की सुरक्षा और श्रम अधिकारों जैसे श्रम मुद्दे पर सबसे जीवंत एनजीओ अभियानों में से एक है।

वैश्विक पूंजी द्वारा बांग्लादेश के सस्ते श्रम के शोषण की 'डिकेंसियन थ्योरी'

चार्ल्स डिकेंस एक प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखक हैं, जिन्होंने 19वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति के दौरान ब्रिटिश श्रमिकों की दयनीय स्थिति के बारे में लिखा था, जहां श्रमिकों के साथ जानवरों जैसा व्यवहार किया जाता था। 21वीं सदी में बांग्लादेश की गार्मेंट फैक्ट्रियों में भी ‘‘डिकेंसियन’ स्थितियां हैं। कई अन्य विकासशील देशों में भी ऐसी ही अमानवीय स्थितियां व्याप्त होंगी। लेकिन बांग्लादेश का मामला विशेष है क्योंकि ये स्वेटशॉप मुख्य रूप से पश्चिमी देशों के उपभोक्ताओं के लिए उत्पादन कर रहे हैं।

इन पश्चिमी देशों में अमीर लोग टॉप ब्रांड्स के तैयार पोषाक पहनकर फैशनेबल तरीके से घूम रहे हैं। आप किसी प्रसिद्ध सूती शर्ट या टी-शर्ट ब्रांड का ज़िक्र करें, आप पाएंगे कि उस कंपनी का उत्पादन स्थल ज़रूर बांग्लादेश में होगा। वजह साफ है। वैश्विक कॉर्पोरेट पूंजी बांग्लादेश के सस्ते श्रम का शोषण करना चाहती है। स्विट्ज़रलैंड में एक सूती शर्ट के उत्पादन की लागत 10 डॉलर है। जर्मनी में इसकी कीमत और भी अधिक, 15 यूरो है। लेकिन बांग्लादेश में लागत 2-2.5 डॉलर है, जो चार से पांच गुना सस्ता है। यह किसी पैमाने के उत्पादन लाभ के कारण नहीं बल्कि पूरी तरह से सस्ते श्रम के कारण है।

जर्मनी में न्यूनतम वेतन 1584 यूरो प्रति माह है। स्विट्ज़रलैंड में न्यूनतम वेतन 4141 यूरो है। बांग्लादेश में मासिक न्यूनतम वेतन के बराबर यूरो, जो हाल तक प्रचलित था, मात्र 67 यूरो था!

राणा प्लाज़ा त्रासदी और उसके परिणाम

पश्चिमी लोगों के कैज़ुअल पोषाक का शानदार लुक बांग्लादेश के श्रमिकों के पसीने और पीड़ा को नहीं दर्शाता। न केवल बांग्लादेश के गार्मेंट श्रमिक, बल्कि श्रीलंका, भारत के बैंगलोर, वियतनाम और फिलीपींस के कपड़ा श्रमिक भी पीड़ित हैं। पश्चिमी पूंजी ने जानबूझकर विभिन्न विकासशील देशों में इन कपड़ा समूहों को विकसित किया और उन्हें प्रतिस्पर्धा में एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा किया ताकि मज़दूरी की लागत कम रखी जा सके।

लेकिन मीडिया के युग में, बांग्लादेश की कपड़ा इकाइयों की डिकेंसियन श्रमिक स्थितियां 24 अप्रैल 2014 को पश्चिमी चेतना में मानों एक बम की तरह फट गईं, जब राणा प्लाज़ा नामक एक विशाल इमारत, जिसमें 5 कपड़ा कारखाने थे, ढह गई, जिसमें 1134 कपड़ा श्रमिकों की मौत हो गई और 2500 से अधिक घायल हो गए थे। यह शायद श्रम इतिहास की सबसे बड़ी आपदाओं में से एक है।

इस आपदा ने पश्चिमी चेतना को झकझोर कर रख दिया। कई लोगों को बांग्लादेश में निर्मित सूती शर्ट और टी-शर्ट पहनने में शर्म महसूस होने लगी और उन्होंने इन कपड़ों को त्याग दिया; पूंजीवाद विरोधी प्रदर्शनकारियों ने इन कपड़ों को इकट्ठा किया और उनकी होली जलायी। श्रमिक यूनियनों ने एकजुटता दर्शाते हुए बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किये। कई मीडिया आउटलेट्स, नागरिक समाज संगठनों और ट्रेड यूनियनों ने बांग्लादेश पर ध्यान केंद्रित किया। बांग्लादेश आरएमजी इकाइयां अभूतपूर्व वैश्विक जांच के दायरे में आईं। दर्जनों खोजी रिपोर्ट और डॉक्यूमेंट्री तैयार की गईं।

दुनिया को यह भी पता चला कि राणा प्लाज़ा से पहले, 2005 में स्पेक्ट्रम फैक्ट्री की इमारत ढह गई थी, जिसमें कई कर्मचारी मारे गए थे। सेवर की एक इमारत (Savor International Limited) भी ढह गई थी। राणा प्लाज़ा त्रासदी से पहले भी, साल 2012 में एक क्लीन क्लोद्स कैम्पैन बुलेटिन में बताया गया था: “बांग्लादेश कपड़ा उद्योग का सुरक्षा रिकॉर्ड दुनिया में सबसे खराब में से एक है। बांग्लादेश अग्निशमन विभाग के अनुसार साल 2006 और 2009 के बीच कम से कम 213 फैक्ट्री आग में 414 गार्मेंट श्रमिक मारे गए। इसी तरह 2010 में 21 अलग-अलग दर्ज घटनाओं में 79 श्रमिकों की जान चली गई थी।”

कपड़ा कारखाने खराब तरह से निर्मित इमारतों में स्थित थे। उनके पास अग्नि सुरक्षा उपाय और अग्नि निकास जैसे अन्य आपातकालीन सुरक्षा उपाय नहीं थे। कारखाने अत्यधिक भीड़भाड़ वाले कार्यस्थल थे। इससे पहले कि वे भागकर अपनी जान बचा पाते, आग उन्हें अपनी चपेट में ले लेती।

राणा प्लाज़ा आपदा में 1134 श्रमिकों की मौत के बाद बांग्लादेश सरकार को कानून पारित करने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसने सभी कपड़ा और अन्य कारखानों के लिए सरकारी अधिकारियों द्वारा निरीक्षण को अनिवार्य बना दिया। इसका मुख्य कारण यह भी था कि उन पर पश्चिमी सरकारों का भी दबाव था। वे पश्चिमी सरकारें अपने ही श्रमिकों का आक्रोश झेल रही थीं। नागरिक समाज संगठनों के ज़ोरदार अभियान ने कपड़ा आयातकों और खुदरा विक्रेताओं को भी मुश्किल में डाल दिया है। उपभोक्ताओं ने बांग्लादेश में अपनी विनिर्माण सुविधाओं वाले लोकप्रिय ब्रांड्स का बहिष्कार करना शुरू कर दिया। मीडिया ने खुलासा किया कि बेनेटन और वॉलमार्ट सहित कई यूरोपीय देशों और यूएस-कनाडा में लोकप्रिय 16 प्रसिद्ध रेडीमेड शर्ट ब्रांड्स की उत्पादन सुविधाएं राणा प्लाज़ा में थीं।

पश्चिमी उदारवाद में उथल-पुथल

राणा प्लाज़ा ने पश्चिमी उदारवाद के पाखंड को सबसे अच्छे ढंग से सामने लाया है। प्रतिष्ठान ने पश्चिमी उपभोक्ताओं के गुस्से और नाराज़गी को आधे-अधूरे उदारवादी समाधानों में बदलने की कोशिश की।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने कुछ पैचवर्क जैसा करने के लिए पहल की। अग्नि एवं भवन सुरक्षा पर बांग्लादेश समझौते की स्थापना की गई, जो कपड़ा कारखानों में सुरक्षा मानकों में सुधार के लिए ब्रांड्स, खुदरा विक्रेताओं और यूनियनों के बीच एक कानूनी रूप से बाध्यकारी समझौता है। लेकिन इस समझौते को कई छोटी गारमेंट इकाइयों ने नज़रअंदाज़ कर दिया और बांग्लादेश सरकार ने इस समझौते को सख्ती से लागू नहीं किया। कई हरित गैर सरकारी संगठनों ने भी बांग्लादेश कपड़ा उद्योग के लिए 'ग्रीन बिल्डिंग्स' को बढ़ावा देना शुरू कर दिया और 'अंतरराष्ट्रीय ग्रीन बिल्डिंग प्रमाणन एजेंसी' की व्यवस्था की और गर्व से दावा किया कि 100 प्रमाणित वैश्विक हरित फैक्ट्री भवनों में से 52 बांग्लादेश में स्थित थे। लेकिन यह बांग्लादेश में फैक्ट्री भवनों का बमुश्किल 1% ही बन सका।

कौशल विकास और क्षमता वृद्धि जैसे उदार विकासवाद के अन्य प्रकारों की सीमाएं दर्शाई गईं , जिसका प्रस्ताव अमर्त्य सेन जैसे प्रख्यात विद्वान ने भी किया था।

NGOs ने एथिकल ट्रेडिंग इनिशिएटिव (Ethical Trading Initiative) और बिज़नेस सोशल कंप्लायंस इनिशिएटिव (Business Social Compliance Initiative) लॉन्च किया। प्रहरी के रूप में कार्य करते हुए, उन्होंने कुछ कड़ी मेहनत की और कई रिपोर्ट और डॉक्यूमेंट्री प्रस्तुत किये। लेकिन बांग्लादेश सरकार द्वारा कुछ नियामक उपाय और सुधार केवल श्रमिक प्रतिरोध के कारण किए गए थे।

दुखद रूप से बुर्जुआ अर्थशास्त्रियों के निंदनीय 'तुलनात्मक लाभ' सिद्धांत के अनुसार बांग्लादेश से एकमात्र लाभ इसकी महिलाओं का अकुशल श्रम है। कई अध्ययनों से पता चला है कि बांग्लादेश की महिला कपड़ा श्रमिकों में कुपोषण है और सिलाई मशीनों के सामने झुकने के कारण महिला श्रमिकों में मस्कुलोस्केलिटल विकार और पीठ दर्द की व्यापक परेशानी है। कारखानों में महिला श्रमिकों की स्थितियां अनौपचारिक श्रमिकों की स्थितियों से बहुत भिन्न नहीं थीं। इन श्रमिकों में एनीमिया व्यापक रूप से पाया गया। वैश्विक ब्रांड्स ने इन आपूर्ति इकाई श्रमिकों के लिए उचित स्वास्थ्य देखभाल की भी व्यवस्था करने की ज़हमत नहीं उठाई। अधिकांश महिला श्रमिक ग्रामीण बांग्लादेश से प्रवासी थीं और उनके पास ढाका और अन्य औद्योगिक शहरों में रहने के लिए सुरक्षित स्थान नहीं थे। बांग्लादेश में कम से कम 3500 कारखानों के 30 लाख से अधिक गारमेंट श्रमिकों को अपना भाग्य अपने हाथों में लेना पड़ा है।

बांग्लादेश के मज़दूरों का लगातार विरोध प्रदर्शन

राणा प्लाज़ा त्रासदी के अगले ही दिन, बांग्लादेश के श्रमिकों ने अपनी दिवंगत वर्ग-बहनों के साथ एकजुटता ज़ाहिर करने के लिए राष्ट्रीय शोक दिवस का आयोजन किया। मारे गए श्रमिकों में अधिकतर महिलाएं थीं। कार्यकर्ताओं ने सोहेल राणा को फांसी की सज़ा देने की मांग की। राणा प्लाज़ा के मालिक राणा को गिरफ़्तार किया गया था और मार्च 2014 में ज़मानत पर रिहा कर दिया गया। इमारत एक दलदल पर बनाई गई थी, और 8-मंजिला इमारत में शीर्ष चार मंजिलों का निर्माण, बिना अनुमति प्राप्त किए और कंक्रीट खंभे का सपोर्ट दिये व बिना नींव को गहरा किये, हुआ था। एक मीडिया चैनल ने आपदा से एक दिन पहले कारखाने की दीवारों में दरारें भी उजागर की थीं, लेकिन मालिक या अधिकारियों द्वारा समय पर कोई कार्रवाई नहीं की गयी। दरसल, मई 2006 में श्रमिक विरोध प्रदर्शनों में एक बड़ा उछाल आया, जिसने बांग्लादेश में शुरुआती श्रम सुधारों को गति दी। 2010 में अधिक हिंसक श्रमिक विरोध प्रदर्शन हुए। कई श्रमिक नेताओं को गिरफ़्तार किया गया और कुछ मारे भी गए।

मज़दूरों ने अपने लंबे संघर्ष में अब एक नए चरण की लड़ाई शुरू कर दी है। महाकवि रबींद्रनाथ ठाकुर की ‘अमार सोनार बांग्ला’ बांग्लादेश का राष्ट्रगान है, जो वैश्विक पूंजी की क्रूरता के कारण आज दुर्भाग्य से ‘अमार स्वेटशॉप बांग्ला’ में बदल गया। लेकिन केवल श्रमिक ही अपना भाग्य बदल सकते हैं, और वास्तविक सोनार बांग्ला का निर्माण भी कर सकते हैं, जिसका सपना गुरुदेव रबींद्रनाथ ने देखा था।

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