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उत्तर प्रदेश : कहीं क़र्ज़ ने तो कहीं मौसमी मार ने ली किसानों की जान

आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में हर महीने क़रीब 70 किसान आत्महत्या करते हैं। इनमें से तो बड़ी संख्या में होने वाली मौत का ज़िक्र होता ही नहीं।
Farmers

पांच साल की आर्या नहीं जानती कि अब उसके पिता इस दुनिया में नहीं हैं। उसके घर कौन आ रहा है, क्यों आ रहा है, उसे कोई मतलब नहीं। वो तो बस यह जानती है कि उसके पापा की तबीयत खराब हो गई थी इसलिए अस्पताल में हैं और जब वे ठीक हो जायेंगे तो लौट आयेंगे। वह एकटक अपनी रोती हुई मां को देखती है उनके आंसू पोछती है और फिर अपने खेलकूद में लग जाती है। लेकिन 12 साल की शिरजी और 9 साल की शानवी से कुछ नहीं छुपा। वे दोनों जानती हैं कि उनके पापा के साथ क्या हुआ और अब वे कभी लौटकर नहीं आयेंगे।

ये तीनों बेटियां सुशील सिंह की हैं। उसी सुशील सिंह की जिन्होंने पिछले दिनों 28 मई को अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। 41 साल के सुशील एक आम उत्पादक किसान थे। कई सालों से वे आम का कारोबार करते थे। वे लखनऊ से सटे मलिहाबाद के रहिमाबाद स्थित गांव रहटा के रहने वाले थे। सुशील की मौत कोई साधारण मौत नहीं। ये मौत हमारे सामने कई सवाल छोड़ कर गई है। एक किसान जब अपनी फसल के नुकसान पर अपनी जान देने को मजबूर हो जाए, तो सवालों का उठना लाज़िमी है।

खुद को किसी तरह संभालते हुए सुशील की पत्नी रूबी बताती हैं कि मौसमी मार के चलते पिछले दो तीन सालों से आम की बागवानी में घाटा ही हो रहा था लेकिन इस साल मार्च, अप्रैल में आई आंधी- बारिश ने कमर ही तोड़ कर रख दी। तेज आंधी के कारण भारी मात्रा में आम पेडों से झड़ गए।

हम रूबी से और बात करना चाह रहे थे, लेकिन उनकी दशा देखकर बात करने की हिम्मत जुटाना मुश्किल था। मृतक सुशील के पिता पिछले पांच सालों से बेहद बीमार हैं और बिस्तर पर हैं तो वहीं मां मानसिक रोगी है इसलिए रूबी को संभालने आये उनके माता-पिता और भाई से ही बात करना उचित लगा। 

रूबी के पिता ने बताया कि उनके दामाद ने बैंक से 8 लाख रुपये लोन लेकर आम की खेती शुरू की थी। सुशील के अपने आम के बाग नहीं थे। उसने लीज पर बाग लेकर खेती शुरू की थी। उसे उम्मीद थी कि बंपर पैदावार होगी, जिससे वह अच्छी कमाई करेगा। लेकिन, अचानक आई आंधी की वजह से पेड़ पर लगे करीब तीन ट्रॉली कच्चे आम गिर गए। सुशील सिंह फसल नुकसान को बर्दाशत नहीं कर पाये और जान दे दी। सुशील ने एक डाला भी कर्ज पर लिया था।

रूबी के पिता के मुताबिक सुशील की आत्महत्या से पहले बैंक से साढे तीन लाख का कर्ज चुकाने का नोटिस आया था। रुंधे गले से वे कहते हैं, इस साल मार्च महीने से ही समय-समय पर हो रही असमय बारिश और ओला वृष्टि ने आम की बागवानी को बहुत नुकसान पहुंचाया जबकि इस साल आम का उत्पादन अच्छी होने की उम्मीद थी लेकिन बारिश ने सब बर्बाद कर दिया। सुशील इसी नुकसान के चलते पिछले तीन महीनों से कुछ तनाव में थे लेकिन वे आत्महत्या जैसा कदम उठा लेंगे ये किसी ने नहीं सोचा था।

बता दें कि पूरे देश में उत्तर प्रदेश आम उत्पादन में पहले नंबर पर आता है। अगर हम यूं कहें कि आम के तरह-तरह के स्वाद उत्तर प्रदेश से ही देश के करोड़ों लोगों तक पहुंचाता है, तो कुछ गलत नहीं होगा। न केवल देश बल्कि विदेशों तक उत्तर प्रदेश के आम पहुंचते हैं। उत्तर प्रदेश की ही बदौलत आम उत्पादन में विश्व में भारत की हिस्सेदारी 42 फीसदी है। एक आंकड़े के मुताबिक 2021-22 में देश में आम का उत्पादन 210 लाख टन हुआ था। वर्ष 2023 तो आम का उत्पादन और भी ज्यादा होने का अनुमान जताया गया था, लेकिन ऐसा नहीं होता दिख रहा। असमय बारिश और ओलावृष्टि के चलते बागवानी को काफी नुकसान पहुंचा है।

एक अनुमान के मुताबिक लखनऊ के मलिहाबाद और काकोरी क्षेत्र में ओलावृष्टि और बेमौसम बारिश के चलते आम की बागवानी को अब तक 60 फीसदी तक नुकसान हो चुका है तो वहीं  मेरठ के क्षेत्र में चौसा आम का उत्पादन सबसे ज्यादा होता है। यहां भी आंधी और बारिश के चलते 50 फीसदी तक फसल को नुकसान हो चुका है।

आम उत्पादक किसान इस बार आम के महंगा होने का अनुमान जता रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मेरठ, लखनऊ, सीतापुर, लखीमपुर और वाराणसी के क्षेत्र में आम की फसल को बारिश और ओलावृष्टि से काफी नुकसान पहुंचा है। इस नुकसान के चलते आम की फसल अब सीमित रह गई है जिसके चलते आम किसान बेहद परेशान हैं।

सुशील की आत्महत्या की खबर अभी आई ही थी कि एक अन्य जिले मैनपुरी से भी खबर आती है कि असमय बारिश और ओलावृष्टि से खराब हुई फसल से तनाव में आये किसान असवेंद्र ने आत्महत्या कर ली। असवेंद्र 35 साल के थे और कुंजपुर गांव के रहने वाले थे। खेती किसानी से ही परिवार का भरण पोषण करते थे। बताया गया कि बेमौसम हुई तेज बारिश से असवेंद्र के गेहूं के रखे गट्ठर सड़ गए। इतने बड़े नुकसान से वे सदमे में आ गए और आत्महत्या कर ली।

अभी ज्यादा समय नहीं बीता जब अपने एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ उनके कार्यकाल के दौरान प्रदेश के एक भी किसान द्वारा आत्महत्या न करने की बात कही और उसके ठीक दो महीने बाद इन दो आत्महत्याओं की खबर आती है।

हम जानते हैं की प्राकृतिक आपदा पर किसी का वश नहीं। ये जब आती है तो भारी नुकसान ही करती है लेकिन इस आपदा की मार आम जन से ज्यादा किसानों को झेलनी पड़ती है। उसकी रात दिन की कड़ी मेहनत का एक हिस्सा भी बर्बाद होने का मतलब है उसके पूरे एक साल का आर्थिक बजट का गड़बड़ा जाना। और इस एक साल का बजट गड़बड़ाने का मतलब परिवार के भरण पोषण से लेकर बच्चों की पढाई, कर्ज की किस्तें चुकाना, आदि सब कामों का गड़बड़ा जाना।

इस नुकसान की भरपाई के लिए उसे फिर अगले साल की फसल का इंतज़ार करना पड़ेगा और क्या पता वह अगला साल भी उसके लिए लाभकारी रहेगा या नुकसान भरा। सुशील ने इसलिए ही तो आत्महत्या की क्योंकि इस प्राकृतिक आपदा के चलते उसे आम की बागवानी में भारी नुकसान हुआ। उनके सामने एक बड़ा सवाल यह आया कि आख़िर वे कर्ज की अदायगी कैसे करेंगे। असवेंद्र की भी मेहनत पर असमय बारिश ने पानी फेर दिया और उसने सदमे में आकर आत्महत्या कर ली।

यह मौत केवल सुशील या असवेंद्र की नहीं हम सब की है। ये न कोई पहली, दूसरी मौतें हैं न अंतिम। आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश में हर महीने करीब 70 किसान आत्महत्या करते हैं। इनमें से तो बड़ी संख्या में होने वाली मौत का जिक्र सामने आता ही नहीं। किसान आत्महत्या में मुख्य कारण कर्ज का बोझ और मौसमी मार है। जब एक किसान मरता है तो उसके मौत से पूरा परिवार प्रभावित होता है, कर्ज की विरासत मिलती है सो अलग। एक किसान की आत्महत्या देश के लिए शर्म की बात है, तो इस शर्म का बोझ आख़िर हम कब तक ढोते रहेंगे?

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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