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शिक्षा: बीच में ही स्कूल ड्रॉपआउट करने को मज़बूर बच्चे, 7 राज्यों में हालात बहुत ख़राब

परियोजना मंजूरी बोर्ड(पीएबी) की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि देश में पढ़ने वाले ज़्यादातर बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने को मज़बूर हैं, ये समस्या 7 राज्यों में बहुत गंभीर है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर। PTI

हिंदुस्तान की शिक्षा व्यवस्था अक्सर सवालों के घेरे में रही है, चाहे वो स्कूली इमारतों की खस्ता हालत हो, चाहे शिक्षकों के अभावों का सवाल हो या फिर ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा का गिरता स्तर हो। इन्हें वजह मानते हुए जो परिणाम उभर कर सामने आता है, वो ये कि देश के कई राज्यों में पढ़ाई बीच में छोड़ने वाले बच्चों की संख्या में भारी इज़ाफा हो रहा है। यह न सिर्फ स्कूल प्रबंधन पर सवाल उठाता है बल्कि सरकार की लचर शिक्षा नीति को भी कटघरे में लाकर खड़ा कर देता है।

दरअसल समग्र शिक्षा कार्यक्रम के दौरान शिक्षा मंत्रालय के तहत परियोजना मंजूरी बोर्ड यानी पीएबी की साल 2023-24 की रिपोर्ट में लिखे गए  दस्तावेजों(मिनट्स) में से ये जानकारी शामिल है। ये बैठकें अलग-अलग राज्यों के साथ मार्च से मई 2023 के दौरान हुईं। सरकार नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में लक्षित साल 2030 तक स्कूली शिक्षा के स्तर पर 100 प्रतिशत सकल नामांकन दर हासिल करना चाहती है और बच्चों के बीच में पढ़ाई छोड़ने को इसमें बाधा मान रही है।

दस्तावेज़ों के अनुसार ड्रॉपआउट करने वालों की राष्ट्रीय दर 12.6 प्रतिशत है, जो पिछले बार की गण से ज़्यादा है। इसमें भी सात राज्य प्रमुख हैं, जैसे बिहार, आंध्र प्रदेश, असम, गुजरात, कर्नाटक, मेघालय, पंजाब में ड्रॉपआउट करने वालों की संख्या ज़्यादा है।

पीएबी की बैठक के दस्तावेज के अनुसार, साल 2021-22 में बिहार में स्कूलों में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 20.46 प्रतिशत, गुजरात में 17.85 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश में 16.7 प्रतिशत, असम में 20.3 प्रतिशत, कर्नाटक 14.6 प्रतिशत, पंजाब में 17.2 प्रतिशत, मेघालय में 21.7 प्रतिशत दर्ज की गई।

वहीं, इस अवधि में मध्य प्रदेश में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 10.1 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में 12.5 प्रतिशत और त्रिपुरा में 8.34 प्रतिशत दर्ज की गई ।

दस्तावेज के मुताबिक, संबंधित अवधि में दिल्ली के स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर नामांकन में तीन प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई जबकि माध्यमिक स्तर पर नामांकन में करीब पांच प्रतिशत की गिरावट आई। इसमें कहा गया कि दिल्ली में स्कूली शिक्षा के दायरे से बाहर काफी संख्या में छात्र हैं, ऐसे में शिक्षा की मुख्यधारा में वापस लाए गए छात्रों की संख्या के बारे में प्रदेश को ‘प्रबंध पोर्टल’ पर जानकारी अपलोड करनी चाहिए।

बैठक में मंत्रालय ने कहा कि पश्चिम बंगाल में माध्यमिक स्कूली स्तर पर साल 2020-21 की तुलना में 2021-22 में ड्राप आउट दर में काफी सुधार दर्ज किया गया, हालांकि राज्य को छात्रों के बीच में पढ़ाई छोड़ने की दर को और कम करने के लिए पर्याप्त कदम उठाने चाहिए। दस्तावेजों के अनुसार, महाराष्ट्र में माध्यमिक स्तर पर ड्राप आउट दर साल 2020-21 के 11.2 प्रतिशत से बेहतर होकर साल 2021-22 में 10.7 प्रतिशत दर्ज की गई। हालांकि ये ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि राज्य के पांच जिलों में ड्राप आउट दर 15 प्रतिशत या उससे अधिक है।

दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश के कई जिलों में वार्षिक औसत ड्रापआउट दर 15 प्रतिशत से अधिक रही जिसमें बस्ती में 23.3 प्रतिशत, बदायूं (19.1) , इटावा (16.9), गाजीपुर (16.6) , एटा (16.2), महोबा (15.6), हरदोई (15.6) और आजमगढ़ में यह 15 प्रतिशत दर्ज की गई।

दस्तावेज के अनुसार, राजस्थान में ड्राप आउट दर में गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, अनुसूचित जनजाति से संबंधित ड्राप आउट दर नौ प्रतिशत और मुस्लिम बच्चों में 18 प्रतिशत माध्यमिक स्कूली स्तर पर ये अभी भी ज़्यादा है।

संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के पिछले साल के एक सर्वेक्षण में लड़कियों के बीच में स्कूल छोड़ने के कारणों में कहा गया था कि 33 प्रतिशत लड़कियों की पढ़ाई घरेलू काम करने के कारण छूट गई। इसके अनुसार, कई जगहों पर ये भी पाया गया कि बच्चों ने स्कूल छोड़ने के बाद परिजनों के साथ मजदूरी या लोगों के घरों में सफाई करने का काम शुरू कर दिया।

पूर्व प्रोफेसर और ईएमआईएस विभाग के प्रमुख अरुण सी मेहता ने हिंदुस्तान में स्कूल ड्रॉप करने वाले बच्चों पर एक लेख लिखा है, इसमें उन्होंने यूडीआईएसई+ के डेटा का सहारा लेकर गणना की है।

अरुण सी मेहता के आंकड़ों पर अगर गौर करेंगे तो जिन सात राज्यों में ड्रॉप आउट का आंकड़ा बढ़ा है वो कुछ इस प्रकार है :

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इसके बाद आप अरुण सी मेहता का ये डेटा भी देख सकते हैं जिसमें उन्होंने 15 राज्यों के बारे में ज़िक्र किया है :

ड्रॉप-आउट बच्चों की राज्य-विशिष्ट संख्या बताती है कि शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर लक्षद्वीप में सबसे कम 26 छात्रों ने पढ़ाई छोड़ दी, जिसके मुकाबले सबसे ज़्यादा 7,33,692 छात्रों ने पश्चिम बंगाल में पढ़ाई छोड़ दी, इसके बाद उत्तर प्रदेश में 51,408 ने पढ़ाई छोड़ दी। कम से कम सात राज्यों के मामले में ड्रॉप आउट छात्रों की संख्या 50,000 से ज़्यादा है।  

प्राथमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने वाले बच्चों के अलावा बड़ी संख्या में बच्चे उच्च प्राथमिक कक्षाओं में भी पढ़ाई छोड़ देते हैं। कुछ राज्यों में प्राथमिक कक्षाओं की तुलना में ऐसे छात्रों की संख्या बहुत ज़्यादा है। लक्षद्वीप में उच्च प्राथमिक कक्षाओं में सबसे कम 64 ड्रॉप-आउट बच्चे हैं, हालांकि, उच्च प्राथमिक कक्षाओं में मध्य प्रदेश में सबसे ज़्यादा 3,76,206 बच्चे ड्रॉप आउट हैं। दूसरी ओर, कम से कम आठ राज्यों ने बताया कि 2020-21 और 2021-22 के बीच शिक्षा के इस स्तर पर कोई भी छात्र ड्रॉप आउट नहीं हुआ। मध्य प्रदेश के बाद बिहार (3,23,289 छात्र), उत्तर प्रदेश (3,22,617 छात्र), राजस्थान (1,81,757 छात्र), असम (1,71,921 छात्र), ओडिशा (1,56,407 छात्र) आदि हैं।

प्राथमिक कक्षाओं में कुल 24,50,633 ड्रॉप-आउट छात्रों के अलावा, ये आगे देखा गया है कि उच्च प्राथमिक कक्षाओं में कुल 22,50,364 छात्र ड्रॉप-आउट हुए, जिसके परिणामस्वरूप कुल 47,00,997 छात्र (4.7 मिलियन) 2020-21 की तुलना में 2021-22 में प्रारंभिक कक्षाओं में ड्राप आउट हो गए। कुल 47,00,997 ड्रॉप-आउट बच्चे 1.45 प्रतिशत, यानी 37,58,106 की अखिल भारतीय ड्रॉपआउट दर के आधार पर गणना की तुलना में काफी ज़्यादा हैं।

अब सवाल ये उठता है कि आख़िर इतनी बड़ी संख्या में बच्चे अपनी पढ़ाई छोड़ने के लिए क्यों मजबूर हैं... तो जवाब निकलकर आता है कि शिक्षा महंगी होती जा रही है, निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना बहुत मुश्किल है। कुछ परिवार कलेजा मज़बूत कर बच्चों को निजी स्कूलों दाख़िला दिला भी देते हैं, तो विवश होकर बीच में ही उन्हें बच्चों की पढ़ाई रुकवा देनी पड़ती है। छात्रों के फेल होने, शरारत या फीस जमा नहीं होने पर कार्रवाई के चलते बच्चों को स्कूल छोड़ने पर भी विवश होना पड़ता है। इसके अलावा बहुत से ऐसे कारण हैं जिसके तहत देश के बच्चे बीच में ही अपनी शिक्षा छोड़ देने पर मजबूर हैं।विशेष तौर पर आदिवासी, दलित एवं अन्य पिछड़ी जाति के बच्चों को स्कूली शिक्षा बीच में छोड़ने की स्थितियां बढ़ती जा रही है, जो आजादी के अमृतकाल में चिन्ता का एक बड़ा कारण है। 

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