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ज्ञानवापी केसः "झूठ और प्रपंच के ज़रिए मुस्लिम समुदाय के जज़्बात से खेल रहा मीडिया"

"मीडिया अगर एक दिन के लिए सुधर जाए और सही ख़बरें देना शुरू कर दे तो बीजेपी की सरकार गिर जाएगी। यह सरकार मीडिया के खंभे पर टिकी हुई है। मीडिया अब मीडिया नहीं रह गया है। वो तो सरकार के इशारों पर नाचने वाला अदाकार हो गया है।"
gyanvapi
फ़ोटो : PTI

ज्ञानवापी मस्जिद के ASI सर्वे के बीच बनारस के मुस्लिम तंजीमों ने मीडिया पर आरोपों की झड़ी लगा दी है। खबरिया चैनलों को कटघरे में खड़ा करते हुए खुलेआम कहा गया कि वो झूठ फैलाकर मुस्लिम समुदाय के जज्बातों से खेल रहे हैं। हिंदू पक्ष की ओर से दावा किया जा रहा है कि मस्जिद के तहखाने में चार फीट की मूर्ति, दो फीट का त्रिशूल, कलाकृतियां, दीवारों पर कमल और कलश के निशान पाए गए हैं, जबकि ये सभी बातें निराधार और झूठी हैं। सच यह है कि अब अल्पसंख्यकों के इंसाफ पर बहुसंख्यकों की आस्था भारी पड़ने लगी है। जिस तरह वजुखाने में फव्वारे को शिवलिंग बता दिया गया, ASI सर्वे के बीच कुछ ऐसा ही झूठ और प्रपंच गढ़ने की कोशिश हो गई है। सर्वे पर अनावश्यक बयानबाजी से एएसआई के अफसर भी नाराज है और उन्होंने दोनों पक्ष को संयम बरतने की सलाह दी है।

अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के अधिवक्ता मुमताज अहमद ने कहा है कि ASI सर्वे के बाबत अफवाह फैलाने से बाज आना चाहिए। ऐसा नहीं हुआ तो मुस्लिम पक्ष सर्वे से दूरी बना लेगा। ज्ञानवापी में मूर्ति और त्रिशूल मिलने का झूठा दावा किया जा रहा है। इसका अच्छा संदेश नहीं जा रहा है। पुलिस प्रशासन को इस पर ध्यान देना चाहिए। कानून व्यवस्था बनाए रखना उनका काम है। इस बीच, मस्जिद कमेटी के ज्वाइंट सेक्रेटरी एमएम यासीन ने कहा है कि अदालत के आदेश का सम्मान करते हुए हम सर्वे में एएसआई का सहयोग कर रहे हैं। मामला अदालत में विचाराधीन है। इसके बावजूद अनावश्यक बयानबाजी करके महौल को खराब करने की कोशिश की जा रही है। हम यह महसूस कर रहे हैं कि बनारस की पुलिस और प्रशासनिक अफसर झूठी खबरें परोसने वाली मीडिया और वादी पक्ष के आगे नतमस्तक हो गए हैं। हमने प्रशासनिक अफसरों से अनावश्यक बयानबाजी पर आपत्ति जताई है। हमारी शिकायत के बावजूद मीडिया और वादी पक्ष का बेरोक-टोक प्रलाप जारी है। खबरिया चैनल एकतरफा और झूठी खबरें प्रसारित कर रहे हैं। अखबारों में भी सर्वे की फर्जी खबरें छापी जा रही हैं। मीडिया की मनमानी पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई तो मुस्लिम पक्ष सर्वे का बहिष्कार करते हुए डिस्ट्रिक कोर्ट में नई याचिका दायर करेगा।

ज्ञानवापी मस्जिद में ASI सर्वे का आज चौथा दिन है। डिस्ट्रिक कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को निर्देश दिया है कि वह सितंबर के पहले हफ्ते में बंद लिफाफे में अपनी रिपोर्ट पेश करें। सर्वे रिपोर्ट किसी भी दशा में लीक नहीं होनी चाहिए। मुस्लिम पक्ष की कड़ी आपत्ति के बावजूद हिंदू पक्ष के अधिवक्ता हरिशंकर जैन और वादी पक्ष की महिलाएं-सीता साहू, रेखा पाठक, लक्ष्मी और मंजू व्यास मीडिया के समक्ष लगातार दावा कर रही हैं, "मस्जिद के तहख़ाने में एक चार फ़ीट की मूर्ति मिली है, जिस पर कलाकृतियां बनी हैं। वहां एक दो फीट का त्रिशूल और दीवारों पर पांच कलश व कमल निशान वाली आकृतियां मिली हैं। ASI की सर्वे टीम बरामद मूर्ति के कालखंड का पता लगाने की कोशिश कर रही हैं।"

हिंदू पक्ष की ओर से की जा रही विवादित बयानबाजी और मीडिया के मनमाने रवैये से नाराज बनारस के मुस्लिम तंजीमों की 06 अगस्त 2023 को मदरसा मतहरुलउलूम स्थित मस्जिद की छत पर आपात बैठक बुलाई गई। बैठक में मुफ्ती-ए-बनारस मौलाना बातिन नोमानी, मौलाना जकीउल्लाह कादरी, मौलाना हारून रशीद नक्शेबंदी, मौलाना अब्दुल्लाह नासिर समेत दो सौ से अधिक मुस्लिम तंजीमों के प्रतिनिधि और उलेमा-ए-कराम शामिल हुए। ज्ञानवापी ASI सर्वे के मामले में मीडिया की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़ा करते हुए मुस्लिम तंजीमों ने रोष व्यक्त किया और कहा, "मीडिया झूठ फैलाकर हमारे जज्बातों से खेल रहा है। मुल्क के लिए हमने बहुत कुर्बानियां दी हैं। हमारे पुरखों ने अपना खून देकर देश को आजादी दिलाई है। मीडिया हमें हाशिये पर रखने की कोशिश कर रहा है और झूठ की बुनियाद पर नफरत फैला रहा है। हमारे सब्र का इम्तिहान लिया जा रहा है। मंचों पर खड़े होकर ‘गोली मारो जैसे नारे’ लगाए जा रहे हैं। हमारे पुरखों ने भी आजादी की बारात निकाली है और आज हमें मीडिया 'पत्थरबाज' कहकर बदनाम कर रहा है। हम अदालत में इंसाफ मांगने जाते हैं, तो वहां कानून पर आस्था भारी पड़ जाती है। ज्ञानवापी मामले में प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 का खुला उल्लंघन हुआ। हम कानून का हवाला देकर चिल्लाते रहे, लेकिन अदालतों में हमारी दलीलों पर आस्था भारी पड़ गई और सर्वे का आदेश जारी कर दिया गया।"

ज्ञानवापी में मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाए जाने के आरोपों को झूठ का पुलिंदा बताते हुए मुफ्ती-ए-शहर मौलाना अब्दुल बातिन नोमानी ने कहा, "मुगल शासक औरंगजेब धार्मिक इंसान थे। इस्लाम में किसी गैर धर्म के इबादतगाह तो क्या किसी के मकान पर भी कब्जा करके मस्जिद नहीं बनाई जा सकती है। औरंगजेब ने किसी मंदिर को ढहाकर मस्जिद नहीं बनाई होगी। उन्होंने तो मठों और मंदिरों को भी दान में जमीन दी थी। औरंगजेब के खिलाफ दुष्प्रचार करना उचित नहीं है। मुल्क के लिए मुस्लिम समुदाय के लोगों ने कुर्बानी दी है। अब अफवाहें फैलाकर मनोबल तोड़ा जा रहा है। इससे नुकसान होगा।"

ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली संस्था अंजुमन इंतेजामिया मसाजिद कमेटी के संयुक्त सचिव एमएम यासीन ने कहा, "हमारे अधिवक्ताओं ने कोर्ट में बार-बार संविधान और पूजा स्थल कानून की दुहाई दी, लेकिन कुछ नहीं हुआ। अदालत के फैसले से हम बेचैन हैं। बेचैनी इसलिए नहीं कि फैसला हमारे खिलाफ हुआ, बल्कि इसलिए कि आज न्याय पर आस्था भारी पड़ रही है। हमने इस मामले को इंसाफ की कुर्सी पर बैठने वालों के विवेक पर छोड़ दिया है। अभी बहुत कुछ देखना बाकी है। इस फैसले के बाद हम मुश्किल से हालात को समझ पाए कि अब हर गली, हर मोहल्ला, हर गांव और हर शहर में सर्वे के आदेश पारित होंगे। इसका श्रेय सर्वोच्च संस्था को होगा। आज खुश होने वालों की खुशी तब काबिल-ए-दीद होगी। मुस्लिम तंजीमों को संयमित रहने की बात कहते हुए यह कहना चाहता हूं कि हमें सिर्फ अल्लाह पर भरोसा रखना है। यकीन कीजिए, उसका फैसला सब पर भारी पड़ेगा।"

मुस्लिम तंजीमों की बैठक के बाद "न्यूजक्लिक" ने एमएम यासीन से बात की तो उन्होंने कहा, "सर्वे में शामिल कुछ अधिवक्ता और वादी पक्ष के लोग बिकी हुई मीडिया के साथ मिलकर झूठी और भ्रामक अफवाहें फैला रहे हैं। डिस्ट्रिक कोर्ट की सख्त पाबंदी के बावजूद फर्जी किस्से-कहानियां प्रसारित किए जा रहे हैं। कुछ उसी तरह का खेल इस बार भी शुरू हो गया है जैसे पिछले साल अधिवक्ता कमीशन के समय हुआ था। हमारे वजुखाने में फव्वारे को शिवलिंग बताकर उसे सील करा दिया गया था। मीडिया और जनमानस में फैलाए जा रहे झूठ से मुस्लिम समाज काफी आहत है। अगर इस तरह की हरकतों पर लगाम नहीं लगी, तो मुस्लिम पक्ष दोबारा सर्वे का बहिष्कार कर सकता है।"

यासीन बताते हैं, "हिंदू पक्ष की एक वादी सीता साहू ने 05 अगस्त को मस्जिद परिसर से बाहर आने के बाद दावा किया था कि ज्ञानवापी परिसर के पश्चिमी दीवार पर आधी पशु, आधी देव की प्रतिमा दिखी। तहखाने में भी खंडित प्रतिमाएं और खंभे देखे गए हैं। प्रतिवादी पक्ष की ओर से मीडिया में फर्जी तस्वीरें बांटी जा रही हैं। मीडिया का एक बड़ा वर्ग मस्जिद के तहखाने में मूर्ति, त्रिशूल और कलाकृतियां पाए जाने का दुष्प्रचार कर रहा है। सबसे बड़ी चिंता खबरिया चैनल खड़े कर रहे हैं। वो एक राजनीतिक दल विशेष के प्रवक्ता की तरह सर्वे की मनगढ़ंत कहानियां सुना रहे हैं और झूठे दावे कर रहे हैं, जिससे स्थिति चिंताजनक बनती जा रही है। तहखाने के सर्वे को लेकर हिंदू पक्ष की ओर से तरह-तरह के दावे किए जा रहे हैं और मीडिया उनके दावों को बढ़ा-चढ़ाकर छाप रहा है। इनकी पक्षपाती रिपोर्ट और वादी पक्ष के अनर्गल प्रलाप के चलते कहीं भी और कभी भी कानून व्यवस्था बिगड़ सकती है। "

जारी है मस्जिद की पड़ताल

बनारस में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की टीम लगातार चौथे दिन सोमवार को वैज्ञानिक तरीके से मस्जिद के अंदरूनी हिस्सों की पड़ताल कर रही है। सर्वे में जीपीआर तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। केंद्रीय गुंबद हॉल का सर्वे पूरा हो चुका है। सर्वे टीम मस्जिद के अंदरूनी हिस्सों की फोटोग्राफी और मैपिंग लगातार कर रही है। सर्वे रविवार को व्यास परिवार के कब्जे वाले तहखाने में उतरी और सर्वेक्षण किया। सुप्रीम कोर्ट की हरी झंडी मिलने के बाद 04 अगस्त 2023 को ASI सर्वे शुरू हुआ था। सर्वे टीम ने पहले दिन परिसर का डिजाइन तैयार किया और दीवारों एवं आसपास के क्षेत्र से साक्ष्य जुटाए। मस्जिद के गुंबदों के और तहखानों की मैपिंग की गई। साथ ही दीवारों की फोटोग्राफी कराई गई। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर के विशेषज्ञों की एक टीम ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की सहायता कर रही है। संस्थान के निदेशक अभय करंदीकर ने पुष्टि की है कि संस्थान के पृथ्वी विज्ञान विभाग के विशेषज्ञ ज्ञानवापी मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने में एएसआई की मदद कर रहे हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के एडिशनल डायरेक्टर राकेश त्रिपाठी ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ-पत्र देते हुए कहा है कि वह ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार तकनीक से सर्वे करेंगे। सर्वे टीम न खुदाई करेगी और न ही किसी वस्तु को नुकसान पहुंचाएगी। सर्वे रिपोर्ट को पूरी तरह गोपनीय रखा जाएगा। न कोई बयानबाजी होगी, न तस्वीरें लीक की जाएंगी।

एएसआई की सर्वे टीम में 51 सदस्य शामिल हैं। इनके अलावा अन्य 16 लोगों को सर्वे के वक्त मौजूद रहने की छूट दी गई है, जिसमें मुस्लिम पक्ष के नौ और हिंदू पक्ष सात लोग शामिल हैं। हालांकि पहले दिन मुस्लिम पक्ष सर्वे में शामिल नहीं हुआ। इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रीतिंकर दिवाकर की बेंच ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में सर्वे की इजाजत दी है। मुस्लिम पक्ष ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन मुस्लिम पक्ष को वहां भी झटका लगा और कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

बनारस के ज़िला जज डॉ. अजय कृष्णा विश्वेश ने ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार के जरिये आधुनिक तरीक़े से सर्वे करने का आदेश दिया है। ज्ञानवापी मस्जिद का ढांचा ज्ञानवापी परिसर के प्लॉट नंबर 9130 पर स्थित है। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट के मई 2022 के आदेश से सील किए गए वज़ूखाने का सर्वे नहीं किया जाएगा। हिंदू पक्ष का दावा है कि वज़ूखाने में एक शिवलिंग मिला है, लेकिन मुस्लिम पक्ष उसे फव्वारा बता रहा है।

क्या कहता है हिंदू पक्ष

हिंदू पक्ष का कहना है कि प्लाॉट नंबर 9130 पर आदि विश्वेश्वर मंदिर है जिसे अकबर के नवरत्न टोडरमल ने बनवाया था। मंदिर का वह हिस्सा अभी मौजूद है। मई 2022 में हुए वकील कमिश्नर सर्वे में कमल का फूल, त्रिशूल आदि निशान पाए गए थे, जिससे प्रमाणित होता है कि वह ज्ञानवापी मस्जिद नहीं, बल्कि मंदिर है। किसी मंदिर पर मस्जिद बनाने से वो मस्जिद नहीं कहलाएगी। मौके पर मंदिर साफ-साफ दिख रहा है तो कोर्ट ज्ञानवापी को मंदिर होने से कैसे नकार सकता है? जहां तक कानून की बात है तो उपासना स्थल अधिनियम 1991 यह नहीं करता है कि किसी मंदिर पर मस्जिद बनाई गई है तो उसकी रक्षा नहीं की जाएगी। इस विवाद को हल करने के लिए सर्वे जरूरी है। इससे इतिहास के सारे राज खुल जाएंगे।

हिंदू पक्ष का यह भी कहना है कि साइंटिफिक सर्वे में न खुदाई होगी और न ही ढांचे को कोई नुक़सान होगा। किसी विवाद को हल करने के लिए साइंटिफ़िक सर्वे की ज़रूरत है तो कोर्ट को ऐसा आदेश देने का पूरा अधिकार है। अयोध्या मामले में ASI के विशेषज्ञों की राय ली गई थी। ASI सर्वे में दूध का दूध-पानी का पानी हो जाएगा। सभी को पता चल जाएगा कि वह ज्ञानवापी मस्जिद नहीं, वह हिंदुओं का मंदिर था।

मुस्लिम समुदाय की आपत्ति

मुस्लिम पक्ष को सबसे गंभीर आपत्ति सर्वे पर है। इनका कहना है कि डिस्ट्रिक जज डॉ. अजय कृष्णा विश्वेश ने जल्दीबाज़ी दिखाई और 21 जुलाई 2023 को ASI सर्वे का आदेश देकर सुनवाई के लिए 04 अगस्त 2023 तक रिपोर्ट तलब कर ली। दूसरी बात, ASI की टीम कोर्ट का आदेश मिलते ही सर्वे करने पहुंच गई और उन्हें डिस्ट्रिक कोर्ट के आदेश को चुनौती देने का मौका नहीं दिया गया। मुस्लिम पक्ष को इस बात पर भी एतराज़ है कि पूरे वाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को उसे पार्टी नहीं बनाया गया है। बनारस की निचली अदालत ने अपना फ़ैसला बिना एएसआई को अदालत में बुलाए और उनका पक्ष जाने सर्वे का आदेश दे दिया। डिस्ट्रिक कोर्ट में ASI का पक्ष रखने के लिए कोई पेश ही नहीं हुआ। सर्वे को जायज़ ठहरने के लिए हिंदू पक्ष अयोध्या में बाबरी-राम मंदिर विवाद से जुड़े ASI सर्वे का हवाला दे रहा है, जबकि वहां की परिस्थितियां अलग थीं। अयोध्या के मामले को नजीर बनाकर ज्ञानवापी का सर्वे नहीं कराया जा सकता है।

मुस्लिम पक्ष का कहना है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण महकमा 21 जुलाई 2023 तक डिस्ट्रिक कोर्ट की सुनवाई का हिस्सा नहीं था तो वह अचानक 23 जुलाई 2023 को बनारस कैसे पहुंच गई, जो किसी को हैरत में डालने वाली है। मुस्लिम पक्ष ने सबसे बड़ी आपत्ति ASI सर्वे में खुदाई पर जताई है। इनका कहना है कि उपासना स्थल अधिनियम 1991 के तहत 15 अगस्त 1947 के पहले बने किसी भी धार्मिक स्थल को संरक्षित किया जाएगा और उसके चरित्र को बदलने की कोशिश नहीं की जाएगी। अगर सर्वे में खुदाई होती है तो इस क़ानून का उल्लंघन होगा। हिंदू पक्ष के पास कोई पुख्ता सबूत नहीं हैं। वह सरकारी एजेंसी की रिपोर्ट पर सबूत जुटाने की कोशिश कर रही है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण महमके को यह अधिकार नहीं है कि वो हिंदुओं का पक्ष मजबूत करने के लिए सबूत जुटाए। सबूत जुटाने का काम खुद हिंदू पक्ष को करना चाहिए था।"

मीडिया की भूमिका पर सवाल

ज्ञानवापी मस्जिद में जिस दिन से ASI सर्वे शुरू हुआ है उसी दिन से ज्ञानवापी मस्जिद के पास खबरिया चैनलों के पत्रकारों का जमघट लगा हुआ है। बड़ी तादाद में दिल्ली के पत्रकार ASI सर्वे की कवरेज करने के लिए कई दिन से बनारस में डेरा डाले हुए हैं। ASI सर्वे को तूल देने के लिए वो डिबेट भी करा रहे हैं और ज्ञानवापी की खबरों को बढ़-चढ़कर दिखा रहे हैं। खबरिया चैनलों की भूमिका पर सवाल खड़ा करते हुए काशी पत्रकार संघ के पूर्व अध्यक्ष प्रदीप श्रीवास्तव कहते हैं, "पत्रकारों की जिम्मेदारी है कि वह एक पक्षीय रिपोर्ट प्रस्तुत न करें। जब तक सर्वे रिपोर्ट कोर्ट से बाहर नहीं आती तब तक यह नहीं बताया जाना चाहिए कि मस्जिद में क्या मिला और क्या नहीं मिला? "

"पिछले साल कमिश्नर की गोपनीय रिपोर्ट कोर्ट में पहुंचने से पहले ब्रॉडकास्ट कर दी गई थी। इस बार भी हिंदू पक्ष के अधिवक्ता और कुछ महिला वादी ASI सर्वे पर विवादास्पद बयान दे रही हैं। मीडिया उसे हुबहू दिखा रहा है। हमें यह लगता है कि ये लोग इस लड़ाई को कोर्ट के बहार ले जाना चाहते हैं। कुछ मीडिया कर्मी तो हिंदू पक्ष के प्रवक्ता की भाषा बोलने लगे हैं। कुछ तो न्यायाधीश की तरह फैसले भी सुनाते जा रहे हैं। किसी भी सभ्य समाज में यह स्थिति ठीक नहीं है। मणिपुर हिंसा के दौर में विवादास्पद बयानबाजी ठीक नहीं है। जब तक ASI की सर्वे रिपोर्ट कोर्ट को सौंप नहीं दी जाती, तब तक इस मुद्दे पर कोई चर्चा नहीं होनी चाहिए थी। पक्ष कोई भी हो, उसे कोर्ट के आदेश का सम्मान करना चाहिए। मीडिया को ऐसी ऊल-जलूल खबर नहीं परोसनी चाहिए, जिससे समाज में विद्वेष फैले और स्थिति विस्फोटक हो जाए। ज्ञानवापी का मामला बेहद पेंचीदा और संवेदनशील है।"

प्रदीप कहते हैं, "जनहित को आधार बनाकर खबरिया चैनलों में कुछ भी दिखा देना और अखबारों में कुछ भी छाप देना ठीक नहीं है। क्या मीडिया तय करेगी कि क्या जनहित में है और क्या नहीं है? आप जनहित की बात करते हैं तो दोनों पक्ष की राय रखनी चाहिए। मीडिया अथवा कोई भी व्यक्ति ASI की रिपोर्ट आने से पहले कैसे बता देगा कि ज्ञानवापी मस्जिद है अथवा मंदिर? सर्वे हो रहा है, उसे होने दीजिए। अगर निचली अदालत का कोई फ़ैसला आएगा तब उस पर बहस कीजिए। यह सिविल कोर्ट का मामला है और वो न जाने कब तक चलता रहेगा। बड़ा सवाल यह है कि जो रिपोर्ट अदालत के सामने रखी जानी है उसे क्यों और किसके फायदे के लिए प्रकाशित और प्रसारित किया जा रहा है? ऐसे में कोई विवाद खड़ा होता है अथवा अयोध्या की तरह हिंसा भड़कती है तो जिम्मेदारी किसके माथे मढ़ी जाएगी? इस सवाल का उत्तर न प्रशासन दे रहा है, न पुलिस और न ही ASI के आला अफसर? "

खबरिया चैनलों के गैर-जिम्मेदराना रवैये से वरिष्ठ पत्रकार अतीक अंसारी बेहद नाराज नजर आते हैं। वो कहते हैं, " मीडिया अगर एक दिन के लिए सुधर जाए और सही खबरें देना शुरू कर दे तो बीजेपी की सरकार गिर जाएगी। यह सरकार मीडिया के खंभे पर टिकी हुई है। मीडिया अब मीडिया नहीं रह गया है। वो तो सरकार के इशारों पर नाचने वाला अदाकार हो गया है। उसका काम सूचना देना, शिक्षित करना और जनता का मनोरंजन करना है, लेकिन वो अपने फर्ज को भूलकर सिर्फ ठिठोली कर रहा है। वो दल विशेष के प्रवक्ता के रूप में काम रहा है और पार्टी कार्यकर्ता की तरह काम कर रहा है। ASI की जो सर्वे टीम आई है क्या मीडिया उसके रिपोर्ट का इंतजार नहीं कर सकता? वो सत्ता के पक्ष में इसलिए नया जनमानस गढ़ने की कोशिश में जुटा है क्योंकि वह सरकार के पैसों पर पल रहा है और उसकी गाइडलाइन पर काम कर रहा है। शायद इसीलिए वह एक सियासी पार्टी और एक धर्म विशेष का प्रवक्ता बन गया है।"

इस बीच ऑल इंडिया मजलिए-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के नेता सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ASI सर्वे को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा है, "हमें आशंका है कि ज्ञानवापी कहीं दूसरा बाबरी न हो जाए। एएसआई की रिपोर्ट आने के बाद बीजेपी-आरएसएस नैरेटिव सेट करेंगे। 23 दिसंबर, 1949 को जब बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखी गईं, तो नमाज बंद हो गई। हम मस्जिद से महरूम हो गए। 6 दिसंबर, 1992 को शिलान्यास की अनुमति दी गई और मस्जिद चली गई। हमें डर है कि एएसआई की रिपोर्ट के आने के बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों को नमाज अदा करने से रोका जा सकाता है। बड़ा सवाल यह है कि सर्वे के बाद क्या नमाज़ बंद होगी? ज्ञानवापी मस्जिद का रिलीजियस करेक्टर रहेगा अथवा सरकार उसे जबरिया बदल देगी? "

(लेखक बनारस के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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