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नूंह हिंसा: पुलिस बेगुनाह मुस्लिमों को भी पकड़ रही है ?

31 जुलाई को नूंह हिंसा के बाद कई स्थानीय लोगों ने एकतरफ़ा कार्रवाई का आरोप लगाया। हाईकोर्ट के दख़ल के बाद बुलडोज़र तो थम गया लेकिन गांव में हो रही दबिश लोगों को अब भी डरा रही है।
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''जो मुल्ज़िम हैं पुलिस उनको पकड़ें, लोगों को क्यों परेशान किया जा रहा है गांव में रेड डाली जा रही है, डर से हम गांव में नहीं रहते। ऐसा लगता है कि पुलिस हमें उठा न ले।'' ये कहना है नगीना गांव के एक युवक का।

नगीना गांव में लोगों से बातचीत करते हुए शाम हो गई। हम गांव से निकल ही रहे थे कि देखा पुलिस की गाड़ी और एक बस गांव में दाख़िल हो रही थी।

जिस लड़के से हम बातचीत कर रहे थे उससे पूछा कि अगर किसी ने ग़लत नहीं किया तो उसे डर कर भागने की क्या ज़रूरत है? इसके जवाब में युवक ने कहा कि ''डर तो है, हमारे गांव के लोगों को उठाया है। सात को उठाया था जिनमें से पांच को बाद में पुलिस ने छोड़ दिया''।

गांव में बुलडोज़र कार्रवाई और पुलिस की दबिश की वजह से मुसलमानों में डर का माहौल है जिस पर एक बुजुर्ग कहते हैं कि ''रात में यहां कोई आदमी (पुरुष) नहीं रहता है, डर की वजह से नहीं रहते।'' हमने उनसे पूछा किस बात का डर तो उनका जवाब था, ''प्रशासन का डर, प्रशासन उठाकर ले जाती है बच्चों को, मारती है वहां ले जा कर।'' हमने सवाल किया कि जब कुछ नहीं किया तो भागना क्यों? वे कहते हैं कि ''हमने कुछ नहीं किया लेकिन वे तो इस बात को नहीं पहचान (समझ) रहे, हमारे दो बच्चे गायब हैं यहां से, वे पता नहीं जेल में हैं या थाने में। उनका अभी कोई पता नहीं हैं, उनकी उम्र मेरे ख़्याल से एक की 15-16 साल और दूसरे की 17-18 साल की होगी, हमने उनके बारे में पता करने की कोशिश की लेकिन वे कुछ बताते ही नहीं''।

हमने बुज़ुर्ग से जानने की कोशिश की कि उनके गांव/ मोहल्ले से क्या कोई पत्थरबाजी में शामिल था तो उनका जवाब था ''पत्थरबाजी में इस मोहल्ले से कोई शामिल नहीं था, दूसरे मोहल्ले के बारे में हम नहीं कह सकते।'' वे आगे कहते हैं कि ''इस गांव में इससे पहले ऐसा कुछ नहीं हुआ था। मान लीजिए अगर किसी का झगड़ा हुआ भी तो बैठकर निपटा लेते हैं, ऐसा कुछ नहीं हुआ था जो अब हुआ है''।

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31 जुलाई की घटना के बाद पुलिस-प्रशासन पर एकतरफा कार्रवाई के आरोप लग रहे हैं। हमने उनसे इसकी सच्चाई जानने की कोशिश की जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि ''पहचान कर तो हुई ही है, हिंदू-मुसलमान का जो मामला आया तो मुसलमानों पर ही तो मार पड़ रही है ये। हिंदू समाज के लोग तो सारे अपने घर में रहते हैं, मुसलमान लोग रात को बाहर भाग जाते हैं डर की वजह से, जंगलों में रहते हैं।''

हमारी प्रशासन से अपील है कि हम प्यार से रहना चाहते हैं। हम झगड़े में शामिल नहीं थे और न ही झगड़ा चाहते हैं, प्यार से मिलकर रहें तो अच्छी बात है।

हिंसा के बाद मेवात में धरपकड़ का आरोप लगा। चूंकि दोनों तरफ से हुए पथराव में भीड़ शामिल थी। ऐसे में पुलिस के सामने भी असली आरोपियों की तलाश एक चुनौती बन गई लेकिन कार्रवाई के नाम पर बेगुनाहों को निशाना बनाना कई सवाल खड़ा करता है।

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हमें कुछ लोगों ने बताया कि उनके परिवार के किसी न किसी को उठा लिया गया है, जबकि उनका हिंसा से कोई लेना देना नहीं था। इनमें कई ऐसे लोग भी थे जो उस दिन नूंह में मौजूद नहीं थे या सिर्फ उस दिन नूंह से होकर गुज़र रहे थे।

मोहम्मद सलीम

हिंसा के बाद उठाए गए लोगों में मोहम्मद सलीम भी हैं, जिनके साथ दो और लोगों को उठाया गया। इनमें से एक नाबालिग बताया जा रहा है। सलीम के भाई मोहम्मद अरशद ने हमें बताया कि मो.सलीम ट्रक चलाता है। उसका ट्रक नूंह के तावडू में खड़ा था जिसे लेकर उसे आगे बैंगलोर (बेंगलुरु) जाना था।

31 जुलाई की सुबह 10 बजे के क़रीब सलीम तावडू के लिए निकला लेकिन जैसे ही वे खेड़ा गांव के करीब पहुंचा तो उसे पता चला कि नूंह में हिंसा भड़की हुई है। क़रीब के एक और गांव अड़बर में उनके कुछ रिश्तेदार रहते हैं तो वह उनके पास चला गया।

सलीम के भाई अरशद बताते हैं कि अगले दिन (1 अगस्त) सुबह सलीम अड़बर से निकल गया। उसके साथ बाकी के दोनों लड़के भी, जिन्हें खेड़ा गांव के पास पुलिस ने पकड़ लिया।

हमने अरशद से पूछा कि उन्हें कैसे पता चला कि उनके भाई को उठाया गया है? इसके बारे में वे बताते हैं कि ''हमने जानकारी की, काफी जगह पूछा, अपने पहाड़ी थाने (भरतपुर) में भी एप्लीकेशन लगाई कि हमारे बच्चे गायब हैं, उनका फोन नहीं लग रहा है। किसी ने कुछ नहीं बताया। दो दिन बाद पेट्रोल पंप पर एक लड़के ने बताया और तीन दिन बाद पुलिस ने भी फोन करके बताया।''

अरशद बताते हैं कि उनका भाई लंबे रूट की गाड़ी (ट्रक) चलाता है, वो तो तावडू सिर्फ अपनी गाड़ी (ट्रक) लेकर आगे जाने के लिए आया था लेकिन उसे उठा लिया गया। अब उनका भाई अरशद अपने भाई को छुड़ाने के लिए भरतपुर से नूंह के चक्कर लगा रहा है। मोहम्मद सलीम के साथ उठाए गए दो लड़कों में से एक अशफाक नाबालिग बताया जा रहा है।

दरअसल अशफाक के सभी सर्टिफिकेट में उसका नाम असपाक (Aspak) लिखा हुआ है। इसलिए हम भी उसका नाम असपाक ही लिखेंगे।

असपाक

असपाक को छुड़ाने की कोशिश कर रहे स्थानीय वकील युसूफ ख़ान से हमने बात की। उन्होंने बताया कि असपाक पहाड़ी (भरतपुर) का रहने वाला एक ग़रीब परिवार का 15-16 साल का लड़का है। पहाड़ी से गुड़गांव और वहां से आगे मुंबई जाने के लिए एक परिचित ट्रक चालक के साथ घर से निकला था लेकिन उसे नूंह (खेड़ा गांव के पास) से उठा लिया गया। हमने युसूफ ख़ान से पूछा कि क्या उनके पास इस बात के सबूत हैं कि असपाक नाबालिग है? उन्होंने असपाक के स्कूल के डॉक्यूमेंट हमारे साथ शेयर किए जिसमें असपाक की डेट ऑफ बर्थ 06-06-2007 लिखी थी।

हमने युसूफ ख़ान से पूछा कि क्या वे ये डाक्यूमेंट लेकर पुलिस के पास गए थे? तो उनका जवाब था ''हमने पुलिस को बताया कि असपाक माइनर है, जबकि पुलिस ने कहा नहीं।'' वे बताते हैं कि ''इस वक़्त असपाक डिस्ट्रिक्ट जेल में है जबकि जो उसे बाल सुधार गृह में रखा जाना चाहिए।''

फिलहाल वकील युसूफ ख़ान सीजेएम कोर्ट में डॉक्यूमेंट के साथ एप्लीकेशन फाइल करने की तैयारी कर रहे हैं।

सद्दाम

नूंह के सद्दाम और उनके भाई इमरान को गिरफ़्तार कर लिया गया, जबकि उनके परिवार का दावा है कि 31 जुलाई के दिन सद्दाम शहर में ही नहीं था, उसकी दुकान बंद थी। वो परिवार के साथ एक दोस्त की गाड़ी में ताजमहल देखने गया था। जिसके तमाम सबूत वे पेश करते हैं। वे 31 जुलाई को ताजमहल की टिकट दिखाते हैं, उस दिन ताजमहल में खींची गई तस्वीरों के साथ ही रास्ते में पड़ने वाले तमाम टोल प्लाजा पर पेटीएम से किए गए भुगतान दिखाते हैं।

सद्दाम की 31 जुलाई की ताजमहल की तस्वीर

परिवार वाले अपनी तरफ से तमाम सबूत पेश कर रहे हैं लेकिन देखना होगा उनकी सुनवाई होती है कि नहीं?

31 जुलाई के बाद पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई ने मेवात के नूंह के युवाओं को डरा दिया है। लोग आरोप लगा रहे हैं कि कार्रवाई एकतरफा हो रही है। हालांकि ये भी बताया जा रहा है कि पुलिस जिन लोगों को उठा रही है उनमें से कई को पूछताछ के बाद छोड़ भी रही है, लेकिन कुछ लोगों ने पकड़े गए लोगों को बुरी तरह से पीटने का भी आरोप लगाया।

वहीं वकील युसूफ ख़ान का कहना है कि ''धरपकड़ के दौरान उठाए गए लोगों में से क़रीब 80 से 90 फीसदी लोग इनोसेंट हैं। साथ ही लगातार हो रही गिरफ़्तारी, हिरासत और पूछताछ से इलाके में भय का माहौल है। लोगों को लग रहा है कि पुलिस पूछताछ के लिए किसी को भी उठा सकती है।'' वे आगे कहते हैं कि ''इतनी बड़ी धरपकड़ की वजह से ऐसा लगता है कि सही से इन्वेस्टिगेशन भी नहीं हो पा रही क्योंकि पुलिस के पास इतना टाइम ही नहीं है''।

भले ही पुलिस लोगों को पूछताछ के बाद छोड़ने का दावा कर रही हो लेकिन उन बेगुनाह लोगों का क्या कसूर है जिनका हिंसा से कोई लेना देना नहीं लेकिन बावजूद उन्हें इस दहशत में जीना पड़ा रहा है कि किसी को भी पूछताछ के लिए उठाया जा सकता है। 

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