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शिक्षा और परिसरों को बचाने का संघर्ष देश में लोकतंत्र की लड़ाई का अहम मोर्चा

शैक्षणिक परिसरों में व्याप्त इस गहन अंधकार के बीच उम्मीद की किरण वे बहादुर छात्र-छात्राएं ही हैं जो सत्ता और संघी ब्रिगेड के हर दमन का मुकाबला करते हुए शिक्षा और परिसरों को बचाने के लिये लड़ रहे हैं।
IIT
फ़ोटो : PTI

देश की युवा पीढ़ी आज गहरे संकट में है। एक नकारा सरकार ने उसके सारे सपने छीन लिए हैं, उन्हें बाजार की तबाही, राज्य की निरंकुशता तथा बर्बर अपराधियों के आगे पूरी तरह असुरक्षित छोड़ दिया है। 

हाल ही में BHU परिसर में IIT की छात्रा के साथ गैंग-रेप की खौफनाक वारदात के 10 दिन बाद भी अपराधी कानून की गिरफ्त से बाहर हैं। बताया जा रहा है कि ये BHU के एक सदी से ऊपर के इतिहास की पहली ऐसी घटना है। 

यह सचमुच बेहद चौंकाने वाला है। बनारस पिछले 10 साल से मोदी जी का संसदीय क्षेत्र है और BHU उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश के सर्वप्रमुख केंद्रों में है। कहते हैं यह एशिया का सबसे बड़ा रेजिडेंशियल यूनिवर्सिटी कैंपस है।

उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का जो ढोल पीटा जाता है, उस पर इससे बड़ी दूसरी टिप्पणी हो नहीं सकती। इसने योगी सरकार के बहुप्रचारित सुशासन की धज्जियां उड़ा दी हैं। प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में, जहाँ अभी चंद महीनों में वे फिर जनादेश मांगने उतरेंगे, अगर कानून व्यवस्था का यह हाल है तो प्रदेश के अन्य इलाकों में क्या हो रहा है, समझा जा सकता है।

मजेदार यह है कि कानून-व्यवस्था को ही मोदी-योगी की डबल इंजन सरकार का USP बताया जाता है, जिसके नाम पर उसने 2022 में दुबारा जनादेश भी हासिल कर लिया।

बुलडोजर कानून व्यवस्था के क्षेत्र में योगी का मौलिक योगदान माना जाता है जो अब भाजपा की दूसरी निरंकुश सरकारों के लिए भी अनुकरणीय रोल मॉडल बन गया है। बहरहाल UP में कानून व्यवस्था के ये खौफनाक सच दिखाते हैं कि बुलडोजर न्याय महज एक बहाना है-अल्पसंख्यकों, राजनीतिक विरोधियों, गरीबों-दलितों के दमन के लिए। इसका असल उद्देश्य साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करना तथा अपने समर्थक प्रभुत्वशाली वर्गों-वर्णों के प्रति अपनी पक्षधरता का सन्देश देना  है।

प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में इतनी खौफनाक वारदात का घटित होना और अपराधियों का अब तक गिरफ्तार न होना स्तब्ध करने वाला है तथा तरह तरह के सवालों को जन्म दे रहा है। इसका एक ही अर्थ है या तो कानून-व्यवस्था पूरी तरह फेल है या अपराधियों को बचाया जा रहा है।

यह भी बेहद पीड़ादायी और हैरतअंगेज़ है कि वाराणसी के सांसद, देश के प्रधानमंत्री मोदी जी की ओर से इस अभूतपूर्व वारदात पर कोई प्रतिक्रिया, बेटी को न्याय का कोई आश्वासन तथा अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई का कोई कदम सामने नहीं आया। 

वैसे तो मणिपुर  की  कई महीनों से जारी बेमिसाल हिंसा और बर्बरता के तांडव पर मोदी की चुप्पी और चरम संवेदनहीनता देख चुके लोग ऐसे मामलों में अब उनसे बोलने की बहुत उम्मीद नहीं करते, पर शायद कुछ लोगों को उम्मीद रही हो कि अपने संसदीय क्षेत्र के इस प्रकरण पर वे बोलेंगे और पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए  कदम उठायेंगे- नैतिकता और इंसाफ के लिए न भी सही, अपने चुनावी नफा-नुकसान के ही दबाव में- पर मोदी ने उन्हें भी निराश किया है। यह सचमुच संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है।

ज्ञातव्य है कि 2017 में जब BHU में एक छात्रा के साथ molestation के ऐसे ही एक मामले पर प्रशासन की संवेदनहीनता के खिलाफ छात्रों का आक्रोश फूट पड़ा था और उन्हें पुलिस के बर्बर दमन का शिकार होना पड़ा था,  तब भी उस दिन वहां शहर में मौजूद मोदी जी न्याय की गुहार लगाती छात्राओं से मिलने की बजाय दूसरे रास्ते से निकल गए थे।

तब भी  पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए लड़ रहे 11 नेतृत्वकारी छात्र-छात्राओं को प्रशासन की दंडात्मक कार्रवाई झेलनी पड़ी थी। कहा गया था कि छात्रों का प्रोटेस्ट "political and sponsored" था और आंदोलन के दौरान वे पिज़्ज़ा खा रहे थे और सोडा पी रहे थे! 

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इस बार भी जब आक्रोशित छात्र-छात्राएं हजारों की तादाद में स्वतःस्फूर्त ढंग से सड़क पर उतरीं तो उन्हीं के ऊपर दमन शुरू हो गया। AISA नेता रोशन को detain किया गया, प्रतिवाद कर रहे students के साथ मारपीट की गई और उल्टे उन्हीं के खिलाफ फर्जी धाराएं लगा दी गयीं।  सबसे शर्मनाक भूमिका आरएसएस से जुड़े छात्रसंगठन ABVP की रही, जिसके कार्यकर्ता  न्याय की गुहार लगा रही छात्राओं-छात्रों के खिलाफ ही लड़ने उतर पड़े। पुलिस-प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। ABVP ने आरोप लगाया कि आन्दोलनरत छात्र हिन्दुत्व विरोधी नारे लगा रहे थे  और छात्राओं से अभद्रता कर रहे थे!

उधर प्रशासन छात्रों के तीखे आक्रोश को शांत करने के लिए एक तुगलकी फरमान लेकर आया कि IIT और शेष परिसर के बीच दीवाल खड़ी की जायेगी। बहरहाल छात्रों तथा विश्वविद्यालय परिवार से जुड़े तमाम नए-पुराने लोगों के भारी विरोध के बाद इसे वापस ले लिया गया है। जाहिर है यह एक diversionary tactics थी। छात्रों ने बिल्कुल सही सवाल उठाया कि बाड़ेबंदी कोई समाधान नहीं है। सवाल पूरे BHU में सुरक्षा के स्वस्थ वातावरण के निर्माण के लिए ऐसे जरूरी कदम उठाने का है, जहाँ ऐसे अपराध असम्भव हो जाएं। 

आज सबसे चिंताजनक सवाल यही है कि आखिर तरह तरह की आपराधिक घटनाएं बार बार BHU में या EFLU से लेकर JNU तक क्यों घटित हो रही हैं?

सरकार और प्रशासन तथा संघी moral brigade की नजर में अपने प्रति यौन-हिंसा के लिए छात्राएं स्वयं जिम्मेदार हैं। दरअसल  प्रशासन का यह बहुत पसंदीदा तर्क है कि  सारे खुराफात की जड़ छात्र-राजनीति है, यही परिसर में अपराधीकरण का स्रोत है। लेकिन BHU में तो 1997 के बाद से ही चुनाव नहीं हो रहे हैं। छात्रसंघ भंग करके वहाँ 2011 में नखदन्त विहीन छात्र परिषद बना दी गयी थी।

छात्रसंघ-विहीन BHU पिछले पूरे दशक में वहां यौन-हिंसा की घटनाओं की पूरी श्रृंखला है- कभी अपराधियों द्वारा कभी किसी faculty member द्वारा। यहां तक कि इसी दौर में एक छात्र के साथ सामूहिक दुष्कर्म की खबर भी सुर्खियों में थी। 

फिर इन खौफनाक वारदातों की जवाबदेही किसकी है ? 

तमाम परिसरों के अनुभव से साफ है कि छात्रों की लोकतान्त्रिक गतिविधियों पर रोक लगने से प्रशासन तो बेलगाम हो ही गया है, अपराध की भयावहता भी चरम पर पहुंच गई है।

सच्चाई यह है कि लोकतान्त्रिक गतिविधियों से वंचित परिसरों की श्मशान की शांति में ही निरंकुश प्रशासन, अपराध और भ्रष्टाचार का संश्रय फलता-फूलता है। शैक्षिक गुणवत्ता तो प्रभावित होती ही है, छात्र-छात्राओं की सुरक्षा भी खतरे में पड़ जाती है।

पिछले दस साल से संघ-भाजपा के नेतृत्व में समाज में पितृसत्तात्मक मर्दवादी विचारों का पुनरूत्थान हुआ है व उनकी वाहक लम्पट/दबंग ताकतों का हौसला बढ़ा है, यौन-हिंसा के अपराधियों की impunity का माहौल है। NEP-2020 के नाम पर तमाम परिसरों को संघी विचारधारा और राजनीति के अभयारण्य में बदला जा रहा है। कुलपति समेत सभी महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों व फैकल्टी में उन्हें भरा जा रहा है। पिछले दिनों JNU जैसे कैम्पस में कुलपति महोदया ने RSS से अपने सम्बंध पर गर्व का इजहार किया!                                           

सत्ता-संरक्षण में ABVP जैसे संगठन परिसरों को रौंद रहे हैं। पूरा प्रशासन और संघी eco-system हिंदुत्व के प्रोजेक्ट को पूरा करने में लगा है। जाहिर है शिक्षा की गुणवत्ता अथवा छात्र-छात्राओं की सुरक्षा दूर-दूर तक उसकी प्राथमिकता में नहीं है। 

इस ' politically committed ' प्रशासन की आम छात्रों-अध्यापकों-शिक्षा के प्रति जवाबदेही तय करने का न कोई संस्थागत मैकेनिज्म है, न इस पर अंकुश लगाने वाला कोई लोकतांत्रिक फोरम बचा है।

सत्ता से जुड़े लोगों के सौ खून माफ हैं और लम्पट-संस्कृति के खिलाफ स्वस्थ, सुरक्षित लोकतान्त्रिक माहौल के लिए लड़ने वाले तमाम छात्र-संगठन, अध्यापक -सब सरकार व प्रशासन के निशाने पर हैं। 

यही परिसरों में बढ़ते अपराधीकरण का मूल स्रोत है।

शैक्षणिक परिसरों में व्याप्त इस गहन अंधकार के बीच उम्मीद की किरण वे बहादुर छात्र-छात्राएं ही हैं जो सत्ता और संघी ब्रिगेड के हर दमन का मुकाबला करते हुए शिक्षा और परिसरों को बचाने के लिये लड़ रहे हैं। उनकी यह लड़ाई देश में लोकतंत्र को बचाने की लड़ाई का अहम मोर्चा है। जरूरत इस बात की है कि स्वतंत्र-चेता अध्यापक समुदाय, नागरिक समाज तथा तमाम जनतांत्रिक संगठन उनके साथ मजबूती से खड़े हों।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। विचार व्यक्तिगत हैं।)

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