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राजस्थान: राइट टू हेल्थ बिल सही लेकिन कमज़ोर

जन स्वास्थ्य अभियान ने इस विधेयक का स्वागत ज़रूर किया है लेकिन इसे संशोधनों के चलते कमज़ोर भी बताया है।
Rajasthan

राजस्थान की गहलोत सरकार का राइट टू हेल्थ बिल लगातार सुर्खियों में है। वजह कुछ निज़ी डॉक्टरों द्वारा इस बिल का विरोध और सड़क पर तेज़ होता आंदोलन है। आम लोगों के स्वास्थ्य अधिकार से जुड़े इस बिल को एक ओर जहां जन स्वास्थ्य से जुड़े लोग स्वागत योग्य मान रहे हैं, तो वहीं राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बीजेपी इसे सियासी रंग देने की कोशिश में जुटी है। हालांकि इन तमाम वाद-विवाद के बीच राजस्थान के ग्राउंड लेवल पर स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों का क्या कहना है, और वो इस बिल को कैसे देखते हैं, इस रिपोर्ट में न्यूज़क्लिक ने ये जानने की कोशिश की...

स्वास्थ्य अधिकारों के लिए काम करने वाले जन स्वास्थ्य अभियान, राजस्थान से जुड़े नरेंद्र प्रेयस इस बिल का स्वागत करते हुए इसे जनता के लिए हितकारी तो मानते हैं, लेकिन वे अभी इसकी और मज़बूती की उम्मीद करते हैं। नरेंद्र के मुताबिक ये बिल राजस्थान के बीते विधानसभा चुनावों में एक जरूरी मुद्दा था, जिसे जन स्वास्थ्य अभियान के ज़ोर देने पर ही कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में शामिल किया था। अब जब राज्य में कांग्रेस की सरकार है, तो उन्होंने अपने वादे को पूरा करने की कोशिश की है, जिसका स्वागत होना चाहिए।

हालांकि नरेंद्र यहां प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टरों के विरोध को बेबुनियाद बताते हुए कहते हैं कि इस बिल का पूरा उद्देश्य स्वास्थ्य सुविधाओं को जनता के लिए सुलभ करवाना है, जिसमें सरकारी और प्राइवेट दोनों अस्पताल शामिल हैं। प्राइवेट अस्पतालों के पास कोई कारण नहीं है विरोध का क्योंकि सरकार पहले ही उनकी मांगें मान कर इस बिल को कमज़ोर कर चुकी है। ऐसे में इस बिल के खिलाफ जाना ये समझ के परे है। नरेंद्र के अनुसार प्राइवेट अस्पतालों का इस बिल से कोई बहुत लेना-देना नहीं है। उन पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं बढ़ने जा रहा, न ही उन्हें कोई नुकसान हो रहा है, हां उनपर निगरानी जरूर बढ़ जाएगी जो सही मायनों में जरूरी भी है।

जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़ी छाया पचौली साफ शब्दों में कहती हैं कि ये बिल लोगों की जरूरत है, जिस पर सरकार ने अब जाकर अमल किया है। हालांकि छाया ऐसे कई कारण बताती हैं, जिसके चलते ये बिल आने वाले समय में अपने मकसद में कमज़ोर साबित होगा और लोगों को कुछ दिक्कतों का भी सामना करना पड़ेगा।

संशोधन के बाद बिल हुआ कमज़ोर

छाया के मुताबिक इस बिल का वास्तविक रूप काफी हद तक सही था, जो संशोधन के बाद आम लोगों के लिए कुछ चिंताएं जरूर दे गया है। छाया बताती हैं कि इस बिल में कानून के तहत जवाबदेही और शिकायत निवारण प्रणाली को बहुत हद तक ध्वस्त कर दिया गया है। जिला और राज्य स्तर पर प्राधिकरण में केवल सरकारी अधिकारियों और आईएमए के चिकित्सकों का प्रतिनिधित्व है, जो एक अलोकतांत्रिक ढ़ांचे की तरह प्रतीत होता है। क्योंकि इसमें किसी भी जन प्रतिनिधि, जन स्वास्थ्य प्रतिनिधि, नागरिक समाज के लोगों को शामिल नहीं किया गया, जो लोगों के मुद्दे सही तरीके से उठा सकें।

इसके अलावा छाया बताती हैं कि पहले सरकार ने किसी भी अस्पताल या डॉक्टर के खिलाफ शिकायत के लिए वेब पोर्टल और हेल्पलाइन संबंधी व्यवस्था का प्रावधान किया था, लेकिन अब केवल लिखित में शिकायत दी जा सकती है और वो भी केवल उसी चिकित्सालय के प्रभारी को जहां की शिकायत है। ऐसे में लोग कितनी कंप्लेंट दर्ज करवा पाएंगे और उन पर क्या एक्शन होगा ये चिंता का विषय है।

छाया एक और जरूरी मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहती हैं कि इस बिल में केवल राजस्थान के निवासियों के इलाज का प्रावधान है यानी अगर कोई कहीं और से आकर यहां रह रहा है, या बंजारा, घुमंतू अन्य समुदाय से जिसके पास रेजिडेंस प्रूफ नहीं है, तो उसका इलाज इसमें कवर नहीं होगा। इस तरह का प्रावधान इस बिल को भेदभाव पूर्ण बनाता है,जो इसे सभी नागरिकों की पहुंच से दूर करता है।

बता दें कि इस बिल के खिलाफ जयपुर समेत कई इलाकों में निजी डॉक्टरों का विरोध लगातार जारी है। विधेयक में स्पष्टता की कमी और प्राइवेट अस्पतालों पर सरकारी योजनाओं के बढ़ते बोझ के चलते कुछ अस्पताल और डॉक्टर इसे वापस लेने की मांग कर रहे हैं। हालांकि, स्वास्थ्य मंत्री सदन में पहले ही कह चुके हैं कि मूल बिल में जीन बातों को लेकर विरोध था, उसमें से ज्यादातर बातों को मान लिया गया है। इमरजेंसी को डिफाइन करने के साथ ही इस इलाज का खर्च भी सरकार उठाने जा रही है। इसके साथ ही राज्य स्तर और जिला स्तर की कमेटियों में जनप्रतिनिधियों को शामिल नहीं किया गया, जो डॉक्टरों की मुख्य मांगें थी, सब मान ली गई हैं, ऐसे में अब चिकित्सक डरा-धमकाकर सरकार को दबाने की कोशिश कर रहे हैं।

क्या है इस बिल में?

राजस्थान की विधानसभा ने मंगलवार, 21 मार्च को राइट टू हेल्थ बिल भारी हंगामे के बीच सदन में पास कर दिया। इसके साथ ही राजस्थान ऐसा पहला राज्य बन गया, जहां स्वास्थ्य अधिकार से जुड़ा ऐसा विधेयक पारित हुआ है। इस विधेयक के तहत राज्य के हर व्यक्ति को अब इलाज की गारंटी मिलेगी। सरकारी हो या प्राइवेट कोई भी अस्पताल इमरजेंसी हालात में मरीज़ को असहाय नहीं छोड़ पाएगा, न ही मनमानी पैसों की कोई वसूली होगी।

ये विधेयक राज्य के प्रत्येक निवासी को सभी सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में बाह्य रोगी विभाग (ओपीडी) सेवाओं और रोगी विभाग (आईपीडी) सेवाओं का मुफ्त लाभ उठाने का अधिकार देता है। प्रदेश के प्रत्येक व्यक्ति का हेल्थ इंश्योरेंस सरकार अपने स्तर पर करवाएगी। इसके साथ ही, चुनिंदा प्राइवेट अस्पतालों में समान स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त में मुहैया कराई जाएंगी।

इमरजेंसी की हालत में प्राइवेट हॉस्पिटल को भी फ्री इलाज करना होगा। प्राइवेट हॉस्पिटल में इमरजेंसी में फ्री इलाज के लिए अलग से फंड बनेगा। ऐसे मामलों में किसी भी तरह की हॉस्पिटल स्तर की लापरवाही के लिए जिला और राज्य स्तर पर प्राधिकरण बनेगा। इसमें सुनवाई होगी। दोषी पाए जाने पर 10 से 25 हजार रुपए जुर्माना लगाया जा सकता है।

गौरतलब है कि सिर्फ राजस्थान ही नहीं देश के ज्यादातर हिस्सों में प्राइवेट अस्पतालों की लूट मची हुई है। इमरजेंसी के नाम पर मोटी रकम की वसूली, पैसों के चलते जरूरी इलाज़ को बीच में रोक देना, मनमानी फीस और गैर जरूरी टेस्ट इन सब से आम जनता त्रस्त है। कोरोना की महामारी में भी कई अस्पतालों पर एक्शन लिया गया था। ऐसे में राजस्थान सरकार की ये कोशिश चुनावों से पहले आम लोगों के हित में एक अच्छा कदम साबित हो सकती है।

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