Skip to main content
xआप एक स्वतंत्र और सवाल पूछने वाले मीडिया के हक़दार हैं। हमें आप जैसे पाठक चाहिए। स्वतंत्र और बेबाक मीडिया का समर्थन करें।

ज्ञानवापी मामले पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का बयान उनके अयोध्या के फ़ैसले की अवमानना है : पूर्व न्यायाधीश कोलसे पाटिल

पूर्व न्यायाधीश का इस बारे में कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद मामले में उत्पन्न विवाद पर न्यायिक कार्यवाही ने क़ानूनी अदालतों से परे इसे जनता की राय वाली अदालत में ‘स्थानांतरित’ कर दिया है।
Kolse Patil
चित्र साभार: सबरंग इंडिया

भूतपूर्व न्यायाधीश बी जी कोलसे पाटिल का जन्म अत्यंत निर्धन परिवार में हुआ था। यहाँ तक कि उनका परिवार फूस की झोपड़ी में बकरियों और मुर्गियों के साथ जीवन निर्वाह करता था। अपनी पढ़ाई-लिखाई के साथ-साथ छोटे-मोटे काम करके वे अंततः बॉम्बे हाई कोर्ट में न्यायाधीश के पद तक पहुँचने में कामयाब रहे। लेकिन 1990 के दशक में जैसे-जैसे दक्षिणपंथी सांप्रदायिक शक्तियों ने अपना सिक्का जमाना शुरू किया और अपनी विनाशकारी ब्रांड की राजनीति को अंधाधुंध आगे बढ़ाने का काम शुरू किया, उसे देखते हुए पाटिल ने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। उनके विचार में न्यायपालिका के बजाय सामाजिक कार्यों के जरिये वे कहीं बेहतर तरीके से भारत की सेवा कर सकने में सक्षम हैं। ज्योतिराव फुले, शाहू महाराज और डॉ. बीआर अंबेडकर की विचारधारा से प्रेरित होकर उन्होंने हमेशा दबे-कुचले वर्गों के साथ बने रहते हुए उनके ऊपर होने वाले अन्याय के खिलाफ, न्याय की लड़ाई में उनका साथ देने का काम किया है। उनकी सार्वजनिक सभाओं में लोगों का भारी जमावड़ा जुटा करता है। 

दिल्ली में उनके कुछ दिनों के प्रवास के दौरान न्यूज़क्लिक ने उनसे संपर्क साधा और उनके साथ वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद पर सर्वोच्च न्यायालय के विवादास्पद फैसले पर कुछ जरुरी प्रश्न किये, जिसने वर्तमान दौर में विभाजनकारी राजनीति को प्रोत्साहित करने का काम किया है। उस बातचीत के कुछ संक्षिप्त अंश इस प्रकार से हैं:

वाराणसी के ज्ञानवापी मस्जिद पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बारे में आपका क्या मूल्यांकन है?

दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंश ने सांप्रदायिक शक्तियों के मनोबल को काफी बढ़ा दिया था, और उनके अंदर इस भरोसे को मजबूत कर दिया कि वे जैसे चाहें इस देश के कानून को धता बता सकते हैं, और उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। यहाँ तक कि राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान भी उनके बीच में यह नारा काफी लोकप्रिय हुआ करता था: “अयोध्या तो सिर्फ झांकी है, काशी मथुरा बाकी है।” तभी से उनका दावा हुआ करता था कि पूर्व में ऐसे तमाम मंदिरों को जमींदोज कर उनके स्थान पर मस्जिदों का निर्माण किया गया था। इस विध्वंश ने एक ऐसी राजनीति को उत्पन्न किया है जो सिर्फ देश को तबाह ही कर सकती है, जबकि हमारा ध्यान गरीबों को भोजन, आवास, वस्त्र, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा प्रदान करने पर होना चाहिए था।

मैं न्यायपालिका का उसी प्रकार से सम्मान करता हूँ जैसा कि मैं अपने माता-पिता का करता हूँ। न्यायपालिका के बगैर, हमारे लिए कोई उम्मीद, या विकल्प की कोई किरण नहीं बचती है. यदि न्यायपालिका अपनी जगह पर अडिग और सशक्त बनी रहती तो देश की दशा इतनी शोचनीय स्तर पर हर्गिज नहीं होती। मैंने कई बार इस बात को दोहरा रखा है कि वर्तमान दौर में न्यायपालिका न्याय नहीं, बल्कि फैसला सुनाती है।  

क्या आपके कहने का आशय यह है कि ज्ञानवापी मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश में न्याय नहीं किया गया है?

सर्वोच्च न्यायालय का आदेश इसे लिखित रूप में नहीं दर्शाता है, लेकिन अदालत में न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने इस बात को कहा– कि पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 किसी प्रार्थना स्थल के धार्मिक चरित्र का पता लगाने से नहीं रोकता है, ने समूचे देश भर में यह संदेश दे दिया है कि ज्ञानवापी मस्जिद में जिसे फव्वारा बताया जा रहा है, वह असल में एक शिवलिंग है।  

दूसरी बात, ज्ञानवापी परिसर के सर्वेक्षण के लिए नियुक्त किये गये आयोग के निष्कर्षों को पहले ही लीक कर दिया गया था। दुर्भाग्य की बात तो यह है कि - न्यायिक कार्यवाही, वो चाहे निचली अदालतों की रही हो या सर्वोच्च न्यायालय की, ने ज्ञानवापी मस्जिद पर चल रहे मनगढ़ंत विवाद को न्यायपालिका ने उभारने का काम किया है। मेरा कहने का आशय यह है कि ऐसा करके इस विवाद को आम लोगों की अदालत में स्थानांतरित कर दिया गया है।  इस प्रकार यह मामला अब न्यायपालिका के दायरे तक सीमित नहीं रह गया है।  

क्या आपके कहने का आशय यह है कि ज्ञानवापी मस्जिद मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश सही नहीं है?

निःसंदेह, सर्वोच्च न्यायलय ने जिस प्रकार का आदेश जारी किया है वह अपनेआप में पूरी तरह से गलत है।  न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का इरादा भले ही ऐसा न रहा हो, लेकिन इसकी धारणा को लेकर उनकी ओर से जो बयान दिया गया है, उसने निश्चित रूप से यह संदेश भेजा है, जिसके बल पर हिन्दू सांप्रदायिक तत्व अब किसी भी मस्जिद पर अपने दावे को पेश कर सकते हैं, क्योंकि ऐसा करने के लिए उन्हें अब क़ानूनी तौर पर हकदार बना दिया गया है। यह टिप्पणी नवंबर 2019 को अयोध्या फैसले पर पांच सदस्यीय पीठ ने जो कहा था, के सर्वथा उलट है। और इस बात को ध्यान में रखना होगा कि, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ खुद उन पांच न्यायाधीशों में से एक थे।  

2019 के अयोध्या फैसले में कहा गया था कि धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूलभूत विशेषताओं में से एक रही है, और यह कि पूजा स्थलों के अधिनियम ने धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को बरकरार रखा है, और हमारा संविधान गैर-प्रतिगमन को मान्यता देता है, जो कि एक ऐसा अधिकार जिसे एक बार प्रदान किया जा चुका है और उसे अब वापस नहीं लिया जा सकता या उस अधिकार में कटौती नहीं की जा सकती है।  

अन्वेषण को लेकर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का कथन न सिर्फ गलत है; बल्कि उनका बयान उनके खुद के 2019 के अयोध्या फैसले की अवमानना है।  

आपने जो कहा मैं उसे फिर से पेश करता हूँ: अन्वेषण पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ का कथन 2019 के  अयोध्या फैसले की अवमानना है। क्या मैं सही समझा हूँ?

(हंसते हुए) हाँ, वे अपने खुद के फैसले की अवमानना कर रहे हैं, भले ही वे कहें कि वे तो सिर्फ 1991 अधिनियम की विवेचना कर रहे थे। मैं हमेशा इस बात को कहता आया हूँ कि न्यायपालिका हमारे लिए माई-बाप के समान है। लेकिन यदि उसके द्वारा कुछ गलत किया जाता है तो आपको उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए। जब 2019 का फैसला सुनाया गया था तो मैंने उस दौरान भी टीवी पर कहा था कि अयोध्या में विवादित स्थल को एक राष्ट्रीय स्मारक के तौर पर निर्मित कर देना चाहिए। विवादित स्थल को न तो हिन्दू और न ही मुस्लिमों के पक्ष में फैसला दिया जाना चाहिए। मैंने यह सब टीवी पर इसलिए कहा था क्योंकि मुझे पूरा भरोसा था कि सर्वोच्च न्यायालय ऐसा ही कुछ करने जा रही है।

लेकिन आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या में विवादित स्थल को किसको दे दिया? इसे उन लोगों को दे दिया गया जिन्होंने अदालत की अवमानना की थी, जिन्होंने कानून का उल्लंघन किया था, जिन्होंने संविधान में मौजूद छिद्रों का जमकर उपयोग किया और इसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए। अनुच्छेद 51ए की शुरुआत में जो कहा गया है उसपर विचार कीजिये: “भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे इसके आदर्शों और संस्थाओं का सम्मान करे, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्र गान का सम्मान करे।

वास्तव में, आप किसे न्याय दे रहे हो? आपको इसे उसे देना चाहिए था जो अदालत के भीतर निष्कपट भाव से प्रवेश करे। जो लोग अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय से न्याय की मांग कर रहे थे, वे इससे पहले कई गैर-मुनासिब कार्यवाइयों को अंजाम दे चुके थे। असल में वे लोग अदालत की अवमानना के दोषी थे।

क्या आप इसे अवमानना इसलिए कह रहे हैं क्योंकि 1992 में सर्वोच्च न्यायालय ने सिर्फ प्रतीक के तौर पर पूजा करने की अनुमति दी थी, किंतु राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के द्वारा कार सेवकों को वहां पर लाने, जिन्होंने आगे बढ़कर बाबरी मस्जिद को ही ढहा दिया था, के कारण अदालत की अवमानना हुई थी? 

आप बिल्कुल सही कह रहे हैं। वास्तव में, अटल बिहारी वाजपेयी वो पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अवमानना का अपराध किया था। मुझे 5 दिसंबर 1992 का वो दिन याद है जब उन्होंने कहा था कि सर्वोच्च न्यायालय ने हमें प्रतीकात्मक तौर पर पूजा करने की इजाजत दे दी है। लेकिन इसी के साथ उन्होंने कहा था कि पूजा उस स्थान पर संपन्न नहीं की जा सकती है जहाँ पर मस्जिद की चट्टान, पत्थर और गुम्बद मौजूद हों। वे असल में वहां पर उपस्थित लोगों को यह संकेत दे रहे थे कि वे उस जमीन को समतल कर दें और ढाँचे को ढहा दें। 

बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने कभी भी इन पहलुओं पर गौर नहीं किया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2019 में कहा कि राम कहाँ पर जन्मे थे इस बारे में वह तय नहीं कर पा रही है। इसकी ओर से कहा गया था कि इस बात के कोई सुबूत नहीं है कि बाबरी मस्जिद को बनाने के लिए हिन्दू ढांचे को ध्वस्त किया गया था, जिसके बारे में आपको ध्यान रखना चाहिए कि यह वहां पर चार शताब्दी से भी अधिक समय से अपने वजूद में बना हुआ था। फिर भी बाबरी मस्जिद वाली भूमि को हिन्दुओं को सौंप दिया गया।

बौद्ध मतावलंबियों का दावा है कि बाबरी मस्जिद मूलतः उनके पूजा स्थल वाली जगह पर बनाई गई थी। उनका यह भी कहना है कि उनके स्तूपों और उनके बौद्ध विहारों को नष्ट किया गया था और… 

डॉ. अंबेडकर का कहना है कि भारत का इतिहास बड़े पैमाने पर बौद्ध धर्म और ब्राहमणवाद के बीच का घातक संघर्ष रहा है। बौद्ध धार्मिक स्थलों को नष्ट कर हिन्दू मन्दिरों का निर्माण किया गया था। लेकिन, सबसे बड़ी बात यह है कि मुस्लिम यहाँ पर भारत को मुस्लिम राष्ट्र बनाने के लिए नहीं आये थे। यदि ऐसा मामला होता तो आज यहाँ पर 80% हिन्दू नहीं होते। वे यहाँ पर राज करने के लिए आये थे। मुगलों के शासनकाल के तहत भारत एक महाशक्ति था, जिस शब्द को आज व्यंग्य स्वरूप इस्तेमाल किया जाता है। उस दौरान हमारी जीडीपी दुनिया में सबसे अधिक थी। फिर हम मुसलमानों से क्यों लड़ रहे हैं?

आप उस सवाल का जवाब क्यों नहीं दे देते?

उस सवाल का जवाब देने के लिए संघ की विचारधारा को डिकोड करना होगा। जब आप उनके वैचारिक आदर्शों- तिलक, सावरकर और गोलवलकर को पढ़ते हैं, तब जाकर आप प्रतिक्रियावादी ब्राह्मणों की सोच को समझ पायेंगे। उनको लगता है कि असल में वे इस देश के मालिक हैं। बाकी हम सभी लोगों के लिए दो जून का भोजन ही काफी है।  

इस तामझाम में आप ज्ञानवापी मस्जिद विवाद को कहाँ पर फिट पाते हैं?

मैं कहूँगा कि न्यायपालिका इस बारे में कुछ नहीं कर सकती है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने अप्रत्यक्ष रूप से लोगों की भावनाओं को उकसाने का काम किया है।

आपके कहने का मतलब है कि न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के बयान ने हिन्दुओं को उकसाने, और अपने दावे को पुख्ता करने के लिए प्रोत्साहित करने का काम किया है?

भले ही उन्होंने एक खुली अदालत में बोलते हुए इस बारे में विचार न किया हो, लेकिन लोग पहले ही इस अनुमान पर पहुँच गये थे कि वहां पर महादेव का एक मंदिर था, जहाँ पर आज ज्ञानवापी मस्जिद है। भले ही सर्वोच्च न्यायालय का आदेश कुछ भी होता, लोगों ने अपने खुद के निष्कर्ष निकाल लिए थे। अब जबकि यह घटित हो गया है, तो ऐसे में राजनीतिक दलों के लिए उन्हें उकसाने के लिए बहुत कुछ करने के लिए नहीं बचा है। 

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का कहना है कि हर मस्जिद के भीतर शिवलिंग खोजने की आवश्यकता नहीं है

(हसंते हुए) संघ हमेशा से दोमुहीं बातें करता आया है। वे लोग नुकीली जीभ का इस्तेमाल करते हैं। दोहरे मानदंडों के मामले में उनका कोई सानी नहीं है। जरा सोचकर बताइए कि भारत में पूजा स्थलों पर विवाद खड़ा करने की आधारशिला रखने वाले लोग कौन थे?

ऐसा क्या हुआ जिसके चलते सर्वोच्च न्यायालय को पूजा स्थल अधिनियम के लिए स्पष्ट रूप से  निर्धारित नियमों की अवहेलना को चुनने के लिए विवश होना पड़ा?

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के मन में क्या चल रहा है इस बारे में कोई कैसे बता सकता है? जब पहले दिन ही ज्ञानवापी मस्जिद का मसला सामने आया था तो सर्वोच्च न्यायालय को स्पष्ट रूप से कह देना चाहिए था कि यहाँ पर पूजा स्थल कानून है, इसलिए इस प्रकार की सभी बेहूदगियों को बंद करो। भारतीय न्यायपालिका के पास वो शक्तियाँ हैं जो इसे दुनिया की सबसे शक्तिशाली न्यायपालिका बनाती है। भारत की खुशहाली तभी तक बरकरार रहने वाली है जब तक कि भारतीय न्यायपालिका खुद में दृढ़ और सशक्त बनी रहती है। दुःख की बात यह है कि अकसर ऐसा देखने को नहीं मिलता है।

ऐसा क्यों?

जब एक मुख्यन्यायाधीश ही मी-टू का अभियुक्त पाया जाये, जब 2018 में चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों को एक पत्रकार सम्मेलन आयोजित कर बाहरी हस्तक्षेप के बारे में आरोप लगाना पड़ जाये, तब सर्वोच्च न्यायालय के मामलों को बाहरी शक्तियों के द्वारा निर्देशित किये जाने के बारे में लगने वाले आरोपों में सच्चाई का अंश दिखना स्वाभाविक है। न्यायाधीशों के द्वारा जिस दौरान प्रेस कांफ्रेंस का आयोजन किया जा रहा था, तब मैंने कहा था कि यदि मुख्य न्यायाधीश के पास यदि थोड़ी सी भी शर्म बची है तो उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए।

दूसरा, हम भारत के आम लोगों को शिक्षित कर पाने में विफल रहे हैं। मुसलमान कौन हैं? हिन्दुओं और मुसलमानों का खून एक है। यहाँ तक कि स्वामी विवेकानंद तक ने इस बात को कहा है। मैं इस बात को कहूँगा कि हमारा और पाकिस्तानियों का खून एक है। यह वह सच्चाई है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय को कायम बनाये रखना था। यह बात तो पूरी तरह से स्पष्ट है कि राजनीतिज्ञ इस काम को कभी भी नहीं करने वाले हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय का कर्तव्य था कि वह पूजा स्थलों पर चलने वाली इस राजनीति पर रोक लगाये। 

आपके विचार में यह सर्वोच्च न्यायालय का कर्तव्य था कि वह ज्ञानवापी मस्जिद पर चलने वाली राजनीति पर रोक लगाये?

बिल्कुल। जिस भानुमती के पिटारे को 2019 में खोल दिया गया था उसे 2022 में हमेशा के लिए बंद कर दिए जाने की जरूरत थी। इस बात को ध्यान में रखें कि मैं किसी के खिलाफ नहीं हूँ, न ही मैं न्यायपालिका के विरुद्ध हूँ, और न ही ब्राह्मणों के खिलाफ, जैसा कि मेरे खिलाफ आरोप लगाया जाता है। मैं मानवता के पक्ष में हूँ, जो कि भारत के हित में है। और ज्ञानवापी मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश ने भारत के हित में काम नहीं किया है।

(अजाज़ अशरफ़ एक स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

 

इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें:

Justice Chandrachud's statement on Gyanvapi is in contempt of his Ayodhya judgement: Justice Kolse Patil

अपने टेलीग्राम ऐप पर जनवादी नज़रिये से ताज़ा ख़बरें, समसामयिक मामलों की चर्चा और विश्लेषण, प्रतिरोध, आंदोलन और अन्य विश्लेषणात्मक वीडियो प्राप्त करें। न्यूज़क्लिक के टेलीग्राम चैनल की सदस्यता लें और हमारी वेबसाइट पर प्रकाशित हर न्यूज़ स्टोरी का रीयल-टाइम अपडेट प्राप्त करें।

टेलीग्राम पर न्यूज़क्लिक को सब्सक्राइब करें

Latest